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शशि थरूर पर फिर ‘पलायन’ की चर्चा? जवाब – “मैं कांग्रेस में हूँ, कहीं नहीं जा रहा”

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Shashi Tharoor not leaving Congress
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शशि थरूर ने कांग्रेस छोड़ने की चर्चा को खारिज करते हुए साफ कहा – “मैं कांग्रेस में हूँ, कहीं नहीं जा रहा।” राहुल गांधी–मल्लिकार्जुन खड़गे से मीटिंग, केरल चुनाव, कथित रिफ्ट, थरूर की महत्वाकांक्षा और पार्टी की अंदरूनी राजनीति का पूरा विश्लेषण

कांग्रेस में शशि थरूर साइडलाइन हैं या फ्रंट लाइन में? “मैं यहीं रहूंगा” बयान का अंदरूनी मतलब

शशि थरूर का साफ जवाब – “मैं कांग्रेस में हूँ और कहीं नहीं जा रहा”

इन दिनों हर दूसरे दिन यह सवाल सुर्खियों में रहता है कि अमुक नेता पार्टी छोड़ने वाले हैं या नहीं। सोशल मीडिया की रफ्तार और अंदरूनी गुटबाज़ी की खबरों के बीच अफवाहें ज़्यादा तेज़ भागती हैं, सच अक्सर पीछे रह जाता है। कांग्रेस नेता और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर के बारे में भी पिछले कुछ समय से यही माहौल बना हुआ था – क्या वो पार्टी से नाराज़ हैं? क्या वो कांग्रेस छोड़ने की सोच रहे हैं?

ताज़ा घटनाक्रम में खुद थरूर ने इन सारी अटकलों पर साफ़ लकीर खींच दी है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात के बाद उन्होंने दो टूक कहा – “मैं कांग्रेस में हूँ और कहीं नहीं जा रहा। मैं केरल कैंपेन में सबसे आगे रहकर काम करूँगा। UDF की जीत के लिए मैं पूरी ताकत से लगा रहूँगा।”

उन्होंने यह भी पूछा कि मेरी निष्ठा पर बार–बार सवाल ही क्यों उठता है, “मुझसे ही हमेशा क्यों पूछा जाता है कि क्या मैं कांग्रेस में रहूँगा? मैं मज़बूती से कांग्रेस के साथ हूँ।”

यानी, कम से कम उनके शब्दों में देखें तो पार्टी छोड़ने का सवाल फिलहाल बंद हो जाना चाहिए। लेकिन राजनीति सिर्फ़ बयानों से नहीं चलती, उसके पीछे की टाइमिंग, बैकड्रॉप और पॉलिटिकल सिग्नल भी उतने ही ज़रूरी होते हैं।

आइए इस पूरे प्रकरण को आसान भाषा में, स्टेप बाय स्टेप समझते हैं – पृष्ठभूमि क्या थी, मीटिंग में क्या संदेश गया, केरल की राजनीति पर इसका क्या असर होगा और थरूर की व्यक्तिगत पोज़िशन कहाँ खड़ी दिखती है।

थरूर पर ‘कांग्रेस छोड़ने’ की चर्चा शुरू कैसे हुई?

सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर मीडिया और राजनीतिक गलियारों में ये ‘एग्ज़िट बज़’ आया कहाँ से।

पिछले कुछ महीनों में केरल में कांग्रेस के भीतर दो–तीन तरह के संकेत दिख रहे थे:

पहला, थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में खड़गे के खिलाफ़ मुकाबला किया था। भले ही वो चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हुआ और बाद में उन्होंने रिज़ल्ट स्वीकार किया, लेकिन पार्टी के ‘हाई कमांड’ कैंप के एक हिस्से ने उन्हें एक स्वतंत्र सोच रखने वाले, कभी–कभी असहमत होने वाले नेता के रूप में देखना शुरू कर दिया।

दूसरा, केरल कांग्रेस की राज्य इकाई के कुछ धड़े हमेशा से पारंपरिक नेतृत्व के करीब रहे हैं, जबकि थरूर को कई बार ग्रासरूट पार्टी वर्कर्स से ज़्यादा अर्बन, इंटेलेक्चुअल और ‘एलीट’ इमेज वाला नेता कहा गया। इससे संगठन के भीतर उनकी भूमिका पर चर्चाएं चलती रहीं।

तीसरा, हाल की रिपोर्ट्स में कहा गया कि थरूर ने AICC की एक अहम मीटिंग – जो केरल विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर थी – अटेंड नहीं की। साथ ही, कोच्चि के एक कार्यक्रम में उन्हें साइडलाइन फील हुआ, ये खबरें भी बाहर आईं। इसी के बाद मीडिया में ये नैरेटिव और तेज़ हो गया कि थरूर और केरल कांग्रेस लीडरशिप के बीच मतभेद बढ़ गए हैं।

थरूर ने खुद कहा था कि पार्टी के साथ “कुछ मुद्दे” हैं जिन पर उन्हें नेतृत्व से बात करनी है, और वो इन्हें पब्लिक में नहीं, अंदर ही अंदर सुलझाना चाहते हैं। यहीं से शक मज़बूत हुआ कि “क्या वो किसी बड़े निर्णय की तैयारी में हैं?”

ऐसे माहौल में जब उनकी दिल्ली में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात हुई, तो स्वाभाविक था कि सबसे पहला सवाल यही उठा – “क्या आप कांग्रेस छोड़ने वाले हैं?”

मीटिंग में क्या हुआ – थरूर का खुद का बयान

थरूर ने मीडिया से बात करते हुए मीटिंग को बेहद पॉज़िटिव, कंस्ट्रक्टिव और गर्मजोशी भरी चर्चा बताया। उनका कहना था:

“हमने अपने दो शीर्ष नेताओं से – लीडर ऑफ़ अपोज़िशन राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से – मुलाक़ात की। बातचीत बहुत अच्छी रही, रचनात्मक और सकारात्मक रही। हम सब एक ही पेज पर हैं और साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं।”

इसके बाद उनसे जब सीधा पूछा गया कि क्या वह पार्टी छोड़ने वाले हैं, तो उन्होंने क्लियर लाइन खींची –

“मैं कांग्रेस में हूँ और कहीं नहीं जा रहा। मैं केरल चुनाव में कैंपेन का हिस्सा रहूँगा, UDF की जीत के लिए काम करूँगा और कांग्रेस को फ्रंटलाइन से लीड करूँगा।”

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर भी यही संदेश दोहराया और दोनों नेताओं को ‘warm and constructive discussion’ के लिए धन्यवाद दिया, साथ में मीटिंग की फोटो भी शेयर की।

यानी, पब्लिक इमेज के स्तर पर ये साफ़ दिखाने की कोशिश की गई कि:

  • थरूर और हाई कमांड के बीच मतभेद अगर थे भी, तो अब बातचीत के बाद ‘मैनेज’ हो चुके हैं
  • मीडिया और प्रतिद्वंद्वी पार्टियों को यह कहने का मौका न मिले कि कांग्रेस के अंदर एक और बड़ा चेहरा पार्टी छोड़ने की तैयारी में है

राहुल गांधी को लेकर थरूर का मजबूत समर्थन

इस पूरे प्रकरण के बीच सबसे दिलचस्प पहलु यह रहा कि थरूर ने खुलकर राहुल गांधी की लीडरशिप की तारीफ़ की। उन्होंने कहा:

“राहुल गांधी ऐसे नेता हैं जिनका पॉलिटिकल स्टैंड बिल्कुल साफ है। वो कम्यूनलिज़्म के खिलाफ़ खड़े होने वाले नेता हैं।”

थरूर ने यह भी साफ किया कि जहां पार्टी की आधिकारिक लाइन तय हो चुकी होती है, वहां वह कोई अलग राय नहीं रखते। हां, डेवलपमेंट या नीतिगत मामलों में कहीं कोई अच्छी चीज़ दिखती है, तो उसे पॉज़िटिवली पॉइंट आउट करते हैं।

ये बयान दो स्तर पर अहम है:

एक, ये उनके आलोचकों को जवाब है जो अक्सर कहते हैं कि थरूर “बहुत ज़्यादा इंडिविजुअलिस्ट” हैं और हमेशा पार्टी लाइन पर नहीं चलते। वो यह कहकर खुद को एक डिसिप्लिन्ड, लेकिन विचारशील लीडर के रूप में पेश कर रहे हैं।

दो, राहुल गांधी पर अक्सर विपक्ष और कुछ न्यूट्रल टिप्पणीकार सवाल उठाते रहे हैं कि पार्टी के भीतर भी क्या उन्हें पूरा सपोर्ट है। थरूर जैसे अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले, अंग्रेज़ी–हिंदी दोनों में मजबूत आवाज़ रखने वाले नेता का खुला समर्थन कांग्रेस के लिए इमेज वैल्यू रखता है।

केरल की राजनीति का एंगल – थरूर कहाँ फिट बैठते हैं?

अब सबसे बड़ा सवाल – ये सब केरल की पॉलिटिक्स में कहां बैठता है?

थरूर फिलहाल तिरुवनंतपुरम के सांसद हैं और लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। उनकी सीट पर कांग्रेस–UDF की पकड़ काफी हद तक उनके पर्सनल ब्रांड पर टिकी मानी जाती है – अच्छी अंग्रेज़ी, ग्लोबल इमेज, साफ–सुथरी पर्सनालिटी और सोशल मीडिया पर उनकी मज़बूत मौजूदगी।

केरल विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू होते ही कयास लगने लगे थे कि क्या थरूर किसी बड़े राज्य पद – जैसे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार – की रेस में हैं या नहीं। उन्होंने मीटिंग के बाद यह साफ किया कि:

  • “हमारी बातचीत में केरल में किसी बड़े पद या कैंडिडेचर की चर्चा नहीं हुई।”
  • “मैं पहले ही सांसद हूँ, मेरे ऊपर अपने मतदाताओं की ज़िम्मेदारी है। संसद में उनके हितों की रक्षा करना ही मेरी मुख्य ड्यूटी है।”

इससे दो मैसेज निकलते हैं –

पहला, अभी कम से कम पब्लिक रूप से वो मुख्यमंत्री या किसी और बड़े पद की रेस में खुद को नहीं दिखाना चाहते।

दूसरा, पार्टी हाई कमांड भी इस समय केरल की अंदरूनी पोज़िशनिंग को पब्लिक डोमेन में नहीं लाकर, एक संयुक्त फ्रंट की इमेज बनाना चाहता है।

क्या वाकई सब कुछ ठीक हो गया है या सिर्फ़ ‘डैमेज कंट्रोल’?

राजनीति में कोई भी बयान अंतिम सच नहीं माना जाता, बल्कि “इस वक़्त का सिग्नल” समझा जाता है। थरूर के “मैं कांग्रेस में हूँ, कहीं नहीं जा रहा” बयान को भी इसी फ्रेम में देखना होगा।

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:

  • केरल विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं। ऐसे वक्त पर अगर यह संदेश जाता कि पार्टी का एक बड़ा चेहरा, जो अर्बन–मिडिल क्लास और ‘लिबरल’ वोटर के बीच पॉपुलर है, पार्टी छोड़ने की सोच रहा है, तो कांग्रेस की इमेज को नुकसान होता।
  • विपक्ष – खासकर BJP और CPI(M) – तुरंत इसे कांग्रेस के अंदरूनी संकट के तौर पर कैश करने की कोशिश करते।
  • हाई कमांड के लिए भी यह सही समय नहीं था कि वे किसी भी प्रकार की खुली खींचतान दिखने दें।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस मीटिंग और उसके बाद आए बयानों का एक बड़ा हिस्सा ‘डैमेज कंट्रोल’ भी है – ताकि मीडिया नैरेटिव बदला जा सके और पार्टी के कैडर तक यह संदेश जाए कि सब ठीक है, सब साथ हैं।

लेकिन साथ ही, यह भी साफ है कि थरूर ने खुद भी ये संकेत दिया कि जो भी ‘issues’ हैं, वे उन्हें पब्लिक में नहीं, पार्टी के भीतर ही उठाएंगे। यह परिपक्व राजनीति का हिस्सा भी है और साथ–साथ यह दिखाता है कि वो अभी कांग्रेस के भीतर ही अपनी स्पेस और रॉल को री–नेगोशिएट करना चाहते हैं, बाहर जाकर नहीं।

थरूर की व्यक्तिगत ब्रांड वैल्यू – क्यों बार–बार उन पर नज़र रहती है?

यह भी समझना ज़रूरी है कि थरूर पर ऐसी अफवाहें क्यों तुरंत पकड़ बना लेती हैं।

  • वे करियर डिप्लोमेट रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र के अंडर–सेक्रटरी जनरल रहे हैं।
  • उनकी अंग्रेज़ी और इंटेलेक्चुअल इमेज उन्हें बाक़ी पारंपरिक नेताओं से अलग करती है।
  • सोशल मीडिया पर उनके शब्दों, ट्वीट्स और स्टैंड्स का इफेक्ट ज़्यादा होता है।
  • उन्होंने पार्टी के भीतर कई मुद्दों पर ‘मामूली, लेकिन ज़ाहिर’ असहमतियां भी जताई हैं।

इसलिए जब भी किसी मीटिंग में वे नज़र नहीं आते, या किसी कार्यक्रम में उनकी भूमिका कम दिखती है, तो तुरंत ये अनुमान लगाया जाने लगता है कि शायद वो ‘कम्फर्टेबल’ नहीं हैं।

थरूर खुद भी इसी बैकड्रॉप को समझते हैं, तभी उन्होंने सवाल उठाया – “मुझसे ही बार–बार क्यों पूछा जाता है कि मैं कांग्रेस छोड़ूँगा या नहीं?”

उनका यह तर्क अपनी जगह वाजिब है कि पार्टी के भीतर अगर दो–तीन नेता सवाल पूछते हैं, राय रखते हैं, तो यह लोकतांत्रिक पार्टी का संकेत भी हो सकता है, इसे तुरंत ‘बगावत’ के फ्रेम में रखना शायद अतिशयोक्ति होती है।

राहुल गांधी और खड़गे के लिए यह संदेश क्यों ज़रूरी था?

कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर भी यह एपिसोड मायने रखता है।

  • विपक्षी एकता और INDIA गठबंधन के संदर्भ में कांग्रेस को खुद को एक मजबूत, संगठित, ‘कमान्ड–केंद्रित लेकिन डेमोक्रेटिक’ पार्टी के रूप में पेश करना है।
  • अगर बार–बार यह दिखे कि बड़े चेहरे पार्टी छोड़ रहे हैं, गुटबाज़ी बढ़ रही है, तो इससे पार्टी की नैशनल वैल्यू पर असर पड़ता है।

थरूर जैसे नेता अगर पब्लिकली कहते हैं कि:

  • “मैं यहीं रहूँगा, कांग्रेस नहीं छोड़ूँगा।”
  • “राहुल गांधी स्पष्ट सोच वाले, कम्यूनलिज़्म के खिलाफ़ खड़े होने वाले नेता हैं।”

तो ये स्टेटमेंट्स कांग्रेस के काडर, खासकर शहरी पढ़े–लिखे समर्थकों के बीच पॉज़िटिव सिग्नल भेजते हैं।

राष्ट्रीय मुद्दों पर थरूर की प्राथमिकता

थरूर ने अपनी बात में यह भी याद दिलाया कि 2009 से वो कहते आए हैं कि उनकी प्राथमिकता “राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करना है, न कि छोटी–मोटी राजनीति पर।”

इसका मतलब यह है कि वो खुद को केवल एक क्षेत्रीय या राज्यस्तरीय खिलाड़ी के तौर पर नहीं, बल्कि एक नेशनल वॉयस के रूप में देखना चाहते हैं – विदेश नीति, लोकतंत्र, संसदीय प्रक्रिया, संविधान, अल्पसंख्यक अधिकार, इत्यादि मुद्दों पर।

ये पॉज़िशनिंग उन्हें पार्टी में एक खास जगह देती है, लेकिन साथ ही राज्य की रोज़मर्रा की गुटबाज़ी से कुछ दूरी भी बना देती है। यही कारण है कि केरल कांग्रेस के कुछ हिस्से उन्हें ‘अपनी लाइन’ से अलग मानते हैं, जबकि दिल्ली के बड़े रणनीतिकार उन्हें नैशनल फेस के तौर पर प्रोजेक्ट करते हैं।

आगे क्या?

थरूर के इस सफाई भरे बयान के बाद कम से कम निकट भविष्य में उनके ‘एग्ज़िट’ की चर्चा ठंडी पड़ने की संभावना है। मगर राजनीति में परमानेंट कुछ नहीं होता – न नाराज़गी, न साथ।

कई चीजें आगे इस नैरेटिव को तय करेंगी:

  • केरल विधानसभा चुनाव में उन्हें पार्टी किस स्तर पर फ्रंटलाइन रोल देती है
  • टिकट बंटवारे, कैंपेन लीडरशिप और स्टार कैंपेनर की लिस्ट में उनकी पोज़िशन
  • पार्टी के भीतर जो भी पॉलिसी या ऑर्गनाइज़ेशनल सुधार होंगे, उसमें उनकी राय को कितना स्पेस मिलता है

फिलहाल के लिए, उन्होंने खुद दरवाज़ा बंद कर दिया है – “मैं कहीं नहीं जा रहा।” अब गेंद ज़्यादा कांग्रेस लीडरशिप के पाले में है कि वे इस भरोसे को किस तरह ठोस पोज़िशन और ज़िम्मेदारियों में बदलते हैं।

कांग्रेस के समर्थकों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए यह घटनाक्रम एक संकेत भी है – पार्टी के भीतर मतभेद हैं, लेकिन अभी भी बातचीत की गुंजाइश है और बड़े नेता पब्लिक ब्रेक–अप से बचना चाह रहे हैं।

आख़िरी बात, थरूर जैसे नेता जिनकी व्यक्तिगत ब्रांड वैल्यू बहुत ऊँची है, वे आम तौर पर पार्टी छोड़ने जैसे बड़े कदम बिना लंबी तैयारी और ठोस वैकल्पिक रास्ते के नहीं उठाते। इसलिए जब तक वे खुद इतने साफ़ शब्दों में कह रहे हैं कि “मैं कांग्रेस में ही रहूँगा”, तब तक उनके राजनीतिक भविष्य को फिलहाल कांग्रेस के भीतर ही पढ़ना अधिक यथार्थवादी लगता है।


FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: क्या शशि थरूर कांग्रेस छोड़ रहे हैं?
उत्तर: नहीं। खुद शशि थरूर ने हालिया बयान में साफ कहा है – “मैं कांग्रेस में हूँ और कहीं नहीं जा रहा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे केरल चुनाव कैंपेन में UDF की जीत के लिए फ्रंटलाइन पर काम करेंगे।

प्रश्न 2: राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से उनकी मीटिंग में क्या हुआ?
उत्तर: थरूर के मुताबिक, मीटिंग सकारात्मक, रचनात्मक और गर्मजोशी भरी रही। तीनों नेताओं ने मिलकर वर्तमान राजनीतिक हालात, केरल की तैयारी और पार्टी के अंदर जो भी मुद्दे हैं, उन पर चर्चा की और अंत में यह मैसेज दिया गया कि सब “एक ही पेज” पर हैं।

प्रश्न 3: शशि थरूर पर पार्टी छोड़ने की चर्चा क्यों शुरू हुई थी?
उत्तर: ताज़ा दौर में उन्होंने AICC की एक प्रमुख मीटिंग (जो केरल चुनाव की तैयारी पर थी) अटेंड नहीं की, और कोच्चि के एक कार्यक्रम में खुद को साइडलाइन महसूस करने की खबरें भी आईं। इसके अलावा, उन्होंने कहा था कि कुछ मुद्दे हैं जिन्हें वे नेतृत्व से बात करके सुलझाना चाहते हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर मीडिया और राजनीतिक विरोधियों ने यह अटकलें तेज कर दीं कि वो शायद पार्टी से असंतुष्ट हैं।

प्रश्न 4: क्या थरूर ने केरल में किसी बड़े पद, जैसे मुख्यमंत्री पद, की मांग की है?
उत्तर: थरूर ने साफ कहा कि उनकी राहुल गांधी–खड़गे से बातचीत में किसी बड़े पद या कैंडिडेचर पर चर्चा नहीं हुई। उन्होंने यह भी कहा कि वे फिलहाल सांसद हैं और अपने तिरुवनंतपुरम के मतदाताओं की प्रतिनिधि के रूप में संसद में उनकी आवाज़ उठाना ही उनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है।

प्रश्न 5: राहुल गांधी को लेकर थरूर का क्या रुख है?
उत्तर: शशि थरूर ने राहुल गांधी की खुलकर तारीफ़ की है। उनके अनुसार राहुल एक ऐसे नेता हैं जिनका राजनीतिक स्टैंड साफ है और जो सांप्रदायिकता के खिलाफ़ मजबूती से खड़े रहते हैं। थरूर का कहना है कि जहां पार्टी की आधिकारिक लाइन तय होती है, वहां वे कोई अलग राय नहीं रखते, और सिर्फ़ डेवलपमेंट जैसे मुद्दों पर कभी–कभी अपना व्यक्तिगत पॉज़िटिव या क्रिटिकल व्यू रखते हैं।

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