पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी ने SIR (Special Intensive Revision) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खुद पेश होकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। बोलीं, “न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा है, मैंने ECI को छह चिट्ठियां लिखीं पर जवाब नहीं मिला।” सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को गंभीर मानते हुए EC को नोटिस जारी किया और SIR प्रक्रिया को संवेदनशील ढंग से चलाने की नसीहत दी।
SIR पर इतना हड़बड़ी क्यों? ममता ने सुप्रीम कोर्ट में EC से पूछा कड़ा सवाल
“न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा है”: सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की EC पर खुली नाराज़गी
दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक असामान्य दृश्य देखने को मिला। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया की अदालत में पहुंचीं और चुनाव आयोग के खिलाफ़ अपनी शिकायत सीधे जजों के सामने रखी। उन्होंने भावुक अंदाज़ में कहा – “सर, प्रॉब्लम यह है कि आखिर में हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा। मैंने चुनाव आयोग को छह बार लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं। न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा है।”
मामला है पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न – यानी SIR – का, जिसके तहत वोटर लिस्ट की विशेष समीक्षा हो रही है। तृणमूल कांग्रेस और ममता का आरोप है कि इस बहाने बड़े पैमाने पर नाम काटे जा रहे हैं और बंगाल को बाक़ी राज्यों से अलग टारगेट किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट इस SIR प्रक्रिया के खिलाफ दायर कई याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि SIR विवाद क्या है, ममता सुप्रीम कोर्ट में क्या कहकर आईं, चुनाव आयोग पर उनके मुख्य आरोप क्या हैं, कोर्ट ने अब तक क्या कहा, और आगे इस केस से बंगाल की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है।
SIR क्या है और विवाद किस बात पर?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी SIR दरअसल वोटर लिस्ट की एक तरह की ‘खास’ पुनरीक्षण प्रक्रिया है। आमतौर पर चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार की साधारण प्रक्रिया चलती रहती है, लेकिन SIR में ज्यादा गहन जांच की जाती है – जैसे डुप्लिकेट एंट्री, मृत मतदाता, माइग्रेटेड वोटर आदि।
चुनाव आयोग ने देश के 12 राज्यों में SIR शुरू किया है। बंगाल उन्हीं में से एक है। ममता बनर्जी और TMC का कहना है कि:
- SIR का तरीका पश्चिम बंगाल में बाकी राज्यों से ज़्यादा “टारगेटेड” और “आक्रामक” है।
- कई जगहों पर बिना ठीक–ठाक जांच के लोगों के नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के नाम पर लिस्ट में शिफ़्ट या काटे जा रहे हैं।
- ग्रामीण इलाकों में लोगों को अचानक नोटिस मिल रहे हैं, जिनमें उनसे प्रूफ और दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, जिससे गरीब और बुजुर्ग मतदाता परेशान हैं।
TMC का आरोप यह भी है कि SIR को जल्दबाज़ी में चलाकर 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले “एंटी–TMC वोट” को फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
ममता का कोर्ट में ‘सीधा’ जाना क्यों खास है?
आम तौर पर किसी राज्य की मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट में अपने वकील या सीनियर काउंसिल के जरिए दलील रखवाती हैं। लेकिन इस बार ममता खुद CJI सुर्या कांत की चेंबर कोर्ट में पहुंचीं और कहा – “सर, मुझे सिर्फ़ पाँच मिनट दीजिए, मैं अपनी बात खुद रखना चाहती हूँ।” CJI ने उन्हें 15 मिनट तक बोलने की अनुमति दी।
इस दौरान उन्होंने:
- साफ–साफ कहा कि वो अपनी पार्टी के लिए नहीं, “लोगों के अधिकारों” के लिए लड़ रही हैं।
- बताया कि उन्होंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
- भावुक लहजे में कहा – “जब न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा हो, तब हम मजबूर होकर यहां आए हैं।”
- हाथ जोड़कर बेंच से गुहार लगाई – “प्लीज़ पीपुल्स राइट्स को प्रोटेक्ट कीजिए, सर।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह अपने वकील को बीच–बीच में रोककर खुद बोलती रहीं और जजों से सीधे संवाद करती रहीं। यह नज़ारा कोर्ट में मौजूद लोगों के लिए असामान्य और काफी नाटकीय था।
चुनाव आयोग पर ममता के मुख्य आरोप
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के कामकाज पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। उनके मुख्य पॉइंट्स कुछ इस तरह हैं:
- जवाब नहीं, सिर्फ़ नोटिस
उन्होंने कहा कि उन्होंने SIR को लेकर चुनाव आयोग को छह चिट्ठियां लिखीं – लेकिन आयोग ने न तो उन्हें बुलाया, न कोई संतोषजनक जवाब दिया। “हमने बार–बार दरवाज़ा खटखटाया लेकिन दूसरी तरफ से सन्नाटा रहा।” - “बंगाल को टारगेट किया जा रहा है”
ममता का आरोप है कि SIR का नियम देश के 12 राज्यों में है, लेकिन “कठोरता” सिर्फ़ बंगाल में दिख रही है। उन्होंने reportedly सवाल पूछा – अगर SIR इतना ज़रूरी है, तो असम और दूसरे BJP शासित राज्यों में इसी तरह की सख़्ती क्यों नहीं? - बड़े–बड़े नामों को भी SIR नोटिस
उनके लिखित सबमिशन में कहा गया कि SIR नोटिस नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन, प्रसिद्ध कवि जॉय गोस्वामी, TMC सांसद दीपक अधिकारी (देव) जैसे लोगों तक को भेजे गए, जिससे यह लगा कि प्रक्रिया “ब्लाइंड” और “संवेदनहीन” है। - “WhatsApp Commission” और भरोसे की कमी
दिल्ली में अपने दूसरे बयानों में ममता ने EC को “WhatsApp Commission” कहा है – इशारा इस तरफ़ कि आयोग “किसके इशारे पर चल रहा है” या “रिमोट–कंट्रोल्ड” है। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने सीधे शब्द नहीं दोहराए, लेकिन साफ कहा कि उन्हें चुनाव आयोग से अब न्याय की उम्मीद नहीं दिख रही।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, क्या ऑर्डर दिया?
सुनवाई के दौरान CJI सुर्या कांत की बेंच (जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वीएम पंचोली भी शामिल थे) ने ममता की शिकायतों को “जेन्युइन” माना और कहा कि हर समस्या का समाधान होता है।
कोर्ट ने मुख्य तौर पर तीन बातें कीं:
- चुनाव आयोग को नोटिस
बेंच ने ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और उससे जवाब मांगा कि SIR की प्रक्रिया कैसे चल रही है और किन आधारों पर नोटिस डाले जा रहे हैं। - EC को नसीहत – “थोड़ा संवेदनशील बनिए”
कोर्ट ने EC से कहा कि SIR नोटिस भेजते समय “थोड़ा समझदारी और संवेदनशीलता” दिखाएं। खास तौर पर उन मामलों का ज़िक्र हुआ जहां नामी व्यक्तियों या बुजुर्ग नागरिकों को बिना वजह परेशान किया गया। - पारदर्शिता पर पहले ही गाइडलाइन
इससे पहले 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि SIR प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और लोगों को अनावश्यक परेशान न किया जाए। कोर्ट ने कहा था कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” लिस्ट पर जिनके नाम हैं, उनके नाम ग्राम पंचायत भवन और ब्लॉक ऑफिसों में डिस्प्ले किए जाएं, और वहीं दस्तावेज़ व आपत्तियां जमा करने की सुविधा हो।
अब कोर्ट ने नई सुनवाई सोमवार (अगली तारीख) के लिए रखी है, जिसमें EC का जवाब पढ़कर अगला कदम तय होगा।
राजनीतिक असर: बंगाल बनाम EC या सेंटर बनाम स्टेट?
यह लड़ाई सिर्फ तकनीकी इलेक्टोरल प्रोसेस की नहीं, बल्कि राजनीति की भी है। कुछ अहम पहलू:
- TMC पहले से आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार और EC मिलकर बंगाल में “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” कर रहे हैं – चाहे वो ED/CBI रेड हों या अब वोटर लिस्ट की समीक्षा।
- BJP का कहना है कि TMC फर्ज़ी वोटर, बांग्लादेशी और अवैध नामों को बचाने के लिए SIR का विरोध कर रही है, ताकि अपना वोट बैंक सुरक्षित रख सके।
- ममता का सुप्रीम कोर्ट में खुद जाकर दलील देना, हाथ जोड़कर “लोगों के अधिकार बचाइए” कहना, सीधे–सीधे बंगाल के मतदाताओं को एक संदेश भी है – कि वो खुद “मैदान में खड़ी हैं” और दिल्ली तक लड़ाई ले जा रही हैं।
ये पूरा एपिसोड आने वाले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव, दोनों के लिए नैरेटिव सेट करने में अहम हो सकता है – TMC इसे “बंगाल की अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई” बताएगी, जबकि विपक्ष इसे “फेक वोट बचाने की कवायद” कहेगा।
कानूनी रूप से आगे क्या हो सकता है?
आगे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट कुछ संभावित कदम उठा सकता है:
- SIR की टाइमलाइन और प्रोसेस पर कुछ अतिरिक्त सेफगार्ड जोड़ना – जैसे कि बिना फील्ड वेरिफिकेशन के नाम न काटना, बुजुर्ग या दिव्यांग मतदाताओं के लिए आसान प्रक्रिया आदि।
- EC से कहना कि वो सभी 12 राज्यों के लिए एक समान और स्पष्ट SOP जारी करे, ताकि “बंगाल को अलग ट्रीटमेंट” का आरोप कमजोर हो।
- अगर किसी खास केस (जैसे अमर्त्य सेन या किसी प्रमुख नागरिक) में गलती साफ दिखती है तो EC को उसे दुरुस्त करने का निर्देश देना।
साथ ही, कोर्ट यह भी साफ कर चुका है कि वोटर लिस्ट की शुद्धता लोकतंत्र के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जितना हर योग्य नागरिक का वोटिंग राइट सुरक्षित रखना – दोनों के बीच संतुलन ही समाधान है।
ममता की रणनीति: कानूनी लड़ाई + पब्लिक इमोशन
ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर जिस तरह “न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा है” और “मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं, जनता के लिए लड़ रही हूँ” जैसे वाक्यों का इस्तेमाल किया, वो सिर्फ कोर्ट के लिए नहीं, बल्कि जनमानस के लिए भी था।
उनकी रणनीति के दो चेहरे साफ दिखते हैं:
- कानूनी रूप से – सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसा आदेश निकलवाना, जो SIR की प्रक्रिया को सीमित या नियंत्रित कर दे, ताकि बड़े पैमाने पर वोटर डिलीशन न हो सके।
- राजनीतिक रूप से – चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को “अन्याय की प्रतीक” के रूप में पेश करना, और खुद को “लोगों की आवाज़” के रूप में प्रोजेक्ट करना।
सोशल मीडिया पर उनके “justice is crying behind closed doors” वाले बयान ने पहले ही काफ़ी एंगेजमेंट खींचा है, और कई बंगाली–हिंदी पोर्टल्स ने इसे हेडलाइन बनाया है।
नतीजा क्या निकलेगा, कहना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना तय है कि SIR पर शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई अब सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है – और अगली कुछ सुनवाईयाँ बंगाल की राजनीति और देश की इलेक्टोरल प्रोसेस दोनों के लिए अहम संकेत देंगी।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
प्रश्न 1: ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट क्यों गईं?
उत्तर: ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने गईं। उनका आरोप है कि SIR के नाम पर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जा रहे हैं, बंगाल को टारगेट किया जा रहा है और चुनाव आयोग उनकी चिट्ठियों का जवाब नहीं दे रहा, इसलिए उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
प्रश्न 2: “न्याय दरवाज़ों के पीछे रो रहा है” वाला बयान क्या है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट में CJI की बेंच के सामने ममता ने कहा – “सर, अंत में हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा। मैंने ECI को छह बार लिखा, पर कोई जवाब नहीं मिला। Justice is crying behind closed doors.” यह बयान उनकी निराशा और EC पर आरोप दोनों को दिखाता है।
प्रश्न 3: सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक क्या कदम उठाया है?
उत्तर: कोर्ट ने ममता की याचिका को गंभीर मानते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। EC से SIR प्रक्रिया पर जवाब मांगा गया है और साथ ही कहा गया है कि SIR नोटिस भेजते समय अधिकारी “थोड़ा संवेदनशील और समझदार” रहें। अगली सुनवाई के लिए कोर्ट ने तारीख तय की है।
प्रश्न 4: SIR को लेकर ममता के मुख्य आरोप क्या हैं?
उत्तर: उनके मुताबिक SIR के नाम पर बंगाल में वोटरों को बिना पर्याप्त कारण नोटिस भेजे जा रहे हैं, बड़ी संख्या में नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के नाम पर हटाने की कोशिश है, और चुनाव आयोग ने उनकी छह चिट्ठियों का जवाब नहीं दिया। साथ ही वे कहती हैं कि 12 राज्यों में SIR है, लेकिन सबसे कठोर व्यवहार बंगाल के साथ हो रहा है, जिससे राजनीतिक बदले की आशंका बनती है।
प्रश्न 5: चुनाव आयोग और विपक्ष का क्या पक्ष है?
उत्तर: चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि SIR मतदाता सूची को शुद्ध और त्रुटि–मुक्त बनाने के लिए है, ताकि फर्ज़ी या डुप्लिकेट एंट्री हटाई जा सकें। BJP और ममता के विरोधी दलों का आरोप है कि TMC अवैध या फर्जी वोटरों को बचाने के लिए SIR का विरोध कर रही है, जबकि TMC कहती है कि यह BJP को फायदा पहुंचाने की सुनियोजित कोशिश है।
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