RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान – हिंदू संज्ञा नहीं विशेषण है। इसका मतलब क्या, भागवत ने आगे क्या कहा, हिंदू शब्द की उत्पत्ति, हिंदुत्व की परिभाषा, समर्थकों–विरोधियों के रिएक्शन, RSS की बदलती सोच और राजनीतिक असर का पूरा विश्लेषण सरल भाषा में।
RSS चीफ मोहन भागवत ने कहा हिंदू एक एडजेक्टिव है – हिंदुत्व पर बहस क्यों छिड़ी
मोहन भागवत का नया बयान: हिंदू संज्ञा नहीं बल्कि विशेषण है – इसका मतलब क्या
आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर अपनी बेबाकी से हिंदू शब्द की परिभाषा को लेकर बयान दिया है। गोरखपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं है बल्कि एक विशेषण है। उनके शब्दों में हिंदू शब्द सिंधु नदी के पार बसने वालों के लिए पश्चिमी देशों ने इस्तेमाल किया था और यह किसी जाति या धर्म का नाम नहीं बल्कि एक जीवन शैली या पहचान का वर्णन है। यह बयान सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया और समर्थकों से लेकर आलोचकों तक ने अपनी प्रतिक्रियाएँ देना शुरू कर दिया।
भागवत ने आगे कहा कि हिंदू होना एक समावेशी सोच है जो सभी को अपनाने वाली है और इसमें कोई भेदभाव नहीं है। उन्होंने हिंदुत्व को एक व्यापक संस्कृति के रूप में परिभाषित किया जो विविधताओं को एक सूत्र में बांधती है। यह बयान आरएसएस की विचारधारा को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को फिर से हवा दे गया क्योंकि कुछ लोग इसे हिंदुत्व को नरम करने की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे मूल विचारधारा की व्याख्या बता रहे हैं। भागवत का यह कथन 6 फरवरी 2026 को गोरखपुर में एक धार्मिक सभा के दौरान आया जब वे हिंदू एकता पर बोल रहे थे।
हिंदू शब्द की उत्पत्ति और ऐतिहासिक संदर्भ
भागवत के बयान को समझने के लिए सबसे पहले हिंदू शब्द की जड़ को समझना ज़रूरी है। उनके अनुसार यह शब्द मूल रूप से भौगोलिक था। प्राचीन फारसी और ग्रीक ग्रंथों में सिंधु नदी को हिंदू कहा जाता था और उसके पूर्व के इलाके को हिंदुस्तान या हिंदुओं का क्षेत्र कहा गया। यह कोई धार्मिक पहचान नहीं थी बल्कि एक क्षेत्रीय नाम था जो बाद में संस्कृति और जीवन पद्धति से जुड़ गया। भागवत ने जोर दिया कि हिंदू शब्द किसी एक ग्रंथ या संस्थापक पर आधारित नहीं है बल्कि यह एक लचीली और समावेशी पहचान है जो सभी परंपराओं को समेट लेती है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो हिंदू शब्द का इस्तेमाल मुगल काल और उसके पहले भी विदेशी यात्रियों ने भारत के निवासियों के लिए किया। भागवत का तर्क है कि यह विशेषण के रूप में काम करता है जैसे “हिंदू संस्कृति” या “हिंदू जीवन शैली”। उन्होंने कहा कि आजकल लोग इसे संज्ञा की तरह इस्तेमाल करते हैं जो गलत है क्योंकि इससे संकीर्णता आ जाती है। यह व्याख्या आरएसएस के मूल ग्रंथों और स्वामी विवेकानंद जैसे विचारकों की शिक्षाओं से मेल खाती है जो हिंदुत्व को सार्वभौमिक मानते थे। भागवत ने उदाहरण दिया कि हिंदू होना मतलब सभी को अपना मानना है न कि किसी एक रूढ़ि में बंधना।
आरएसएस की विचारधारा में हिंदुत्व की परिभाषा
आरएसएस हमेशा से हिंदुत्व को एक राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखता आया है। मोहन भागवत ने 2018 में भी इसी तरह का बयान दिया था जब उन्होंने कहा था कि हिंदू राष्ट्र में सभी धर्मों के लोग रह सकते हैं। इस बार का बयान उसी कड़ी का हिस्सा लगता है। भागवत ने स्पष्ट किया कि हिंदू शब्द किसी धर्म विशेष का नाम नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक विशेषण है जो भारत की विविधता को एकजुट करता है। आरएसएस के अनुसार हिंदुत्व का मतलब राष्ट्र प्रेम, सेवा और समन्वय है।
भागवत ने कहा कि हिंदू होना कोई क्लब जॉइन करने जैसा नहीं है बल्कि एक सहज जीवन पद्धति है। उन्होंने उदाहरण दिया कि ईसाई या मुस्लिम भी हिंदू संस्कृति के हिस्से हैं अगर वे भारत को अपना मानते हैं। यह विचार आरएसएस के संस्थापक डॉ हेडगेवार और गुरु गोलवलकर की शिक्षाओं से जुड़ता है जो हिंदू को व्यापक परिभाषा देते थे। भागवत का यह बयान वर्तमान राजनीतिक माहौल में आया जब धार्मिक ध्रुवीकरण की बहस तेज़ है। आरएसएस इसे समावेशी हिंदुत्व के रूप में पेश कर रहा है।
समर्थकों और आलोचकों के रिएक्शन
भागवत के बयान पर समर्थकों ने तुरंत तारीफ़ की। कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसे हिंदुत्व की सच्ची व्याख्या बताया और कहा कि यह संकीर्णता से ऊपर उठने का संदेश है। भाजपा समर्थक इसे आरएसएस की परिपक्व सोच का प्रतीक मान रहे हैं। कुछ ने इसे विवेकानंद और गांधी की विचारधारा से जोड़ा।
दूसरी तरफ़ आलोचकों ने इसे RSS की पुरानी रणनीति बताया। कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि यह बयान अल्पसंख्यकों को लुभाने की कोशिश है। हिंदुत्व कट्टरपंथी गुटों ने आपत्ति जताई कि हिंदू को विशेषण कहना इसकी गरिमा कम करता है। सोशल मीडिया पर #HinduAdjective ट्रेंड कर रहा। बहस तेज़ हो गई।
राजनीतिक असर: भाजपा और विपक्ष पर क्या प्रभाव
यह बयान भाजपा के लिए दोहरी तलवार है। एक तरफ़ यह समावेशी छवि देता है जो 2024 लोकसभा चुनाव के बाद ज़रूरी था। दूसरी तरफ़ हार्डलाइन समर्थक नाराज़ हो सकते हैं। विपक्ष इसे RSS का फ्लिप–फ्लॉप बताकर हमला करेगा। भागवत के बयान अक्सर भाजपा नीतियों को प्रभावित करते हैं। आने वाले राज्य चुनावों में इसका असर दिखेगा।
RSS की बदलती सोच या मूल विचारधारा की व्याख्या
कई विश्लेषक मानते हैं कि भागवत RSS को आधुनिक और समावेशी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पुराने बयानों से तुलना करें तो हिंदुत्व पर जोर कम हो रहा। लेकिन RSS का कहना है कि यह मूल विचारधारा ही है। भागवत ने कहा हिंदू राष्ट्र में सभी सुरक्षित। यह बयान भारत की बहुलता को मान्यता देता है।
5 FAQs
प्रश्न 1: मोहन भागवत ने हिंदू को विशेषण क्यों कहा?
उत्तर: भागवत ने कहा हिंदू शब्द सिंधु नदी के पार बसने वालों के लिए पश्चिम ने इस्तेमाल किया। यह संज्ञा नहीं विशेषण है जो संस्कृति जीवन शैली बताता है। कोई संस्थापक या ग्रंथ पर आधारित नहीं।
प्रश्न 2: भागवत ने हिंदुत्व को कैसे परिभाषित किया?
उत्तर: हिंदुत्व समावेशी सोच है जो विविधता को एकजुट करती। सभी को अपनाने वाली। राष्ट्र प्रेम सेवा का नाम। सभी धर्मों वाले हिंदू संस्कृति का हिस्सा।
प्रश्न 3: समर्थकों ने बयान पर क्या रिएक्शन दिया?
उत्तर: समर्थकों ने तारीफ़ की। कहा सच्ची व्याख्या। विवेकानंद गांधी से जुड़ा। संकीर्णता से ऊपर। आरएसएस की परिपक्व सोच।
प्रश्न 4: आलोचकों ने क्या आपत्ति जताई?
उत्तर: आलोचकों ने कहा RSS फ्लिप–फ्लॉप। अल्पसंख्यक लुभावना। हिंदू गरिमा कम। विपक्ष ने राजनीतिक चाल बताया।
प्रश्न 5: राजनीतिक असर क्या होगा?
उत्तर: भाजपा को समावेशी इमेज मिलेगी। हार्डलाइन नाराज़। विपक्ष हमला करेगा। राज्य चुनाव प्रभावित। RSS सोच पर बहस।
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