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मोहन भागवत ने फिर खोला राज़ – आरएसएस न सत्ता चाहता है न विरोध, फिर इसका असली मकसद क्या

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Mohan Bhagwat RSS not against anyone
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा – संगठन किसी के खिलाफ़ नहीं है, सत्ता की इच्छा भी नहीं रखता। नागपुर तीन दिवसीय कार्यक्रम में बयान, आरएसएस की विचारधारा, राजनीति से दूरी, हिंदुत्व, समाज सेवा, विपक्ष के आरोपों का जवाब। पूरा संदर्भ, मतलब व राजनीतिक असर सरल भाषा में।

आरएसएस की राजनीति पर मोहन भागवत का साफ़ संदेश: हम न किसी के खिलाफ़ हैं न सत्ता के पीछे भागते

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का साफ़ संदेश – संगठन न किसी के खिलाफ़ है न सत्ता के पीछे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस को लेकर देश भर में बहस हमेशा गर्म रहती है। कोई इसे हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक मानता है तो कोई सत्ता के पीछे का छिपा हाथ। ऐसे में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में चल रहे तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान एक बार फिर संगठन की विचारधारा और मकसद पर साफ़ बात कही। उन्होंने कहा कि आरएसएस किसी भी व्यक्ति या समूह के खिलाफ़ नहीं है और न ही सत्ता प्राप्त करने की कोई इच्छा रखता है। ये बयान विपक्ष के उन आरोपों का सीधा जवाब था जो आरएसएस को राजनीतिक साजिशों का केंद्र बताते हैं। भागवत ने संगठन को समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बताया जो सत्ता से दूर रहकर अपना काम करता रहता है। ये बयान न सिर्फ़ आंतरिक स्वयंसेवकों के बीच उत्साह बढ़ाने वाला था बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर भी नज़रें टिकाने वाला।

मोहन भागवत का बयान: आरएसएस की विचारधारा और सत्ता से दूरी

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में आरएसएस की स्थापना से ही मौजूद मूल विचारधारा पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि संगठन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना राष्ट्र को मज़बूत बनाना और सेवा कार्यों के ज़रिए समाज के हर वर्ग तक पहुँचना है। सत्ता की भूख या किसी के खिलाफ़ वैमनस्य आरएसएस की DNA में कहीं नहीं है। भागवत ने उदाहरण देते हुए बताया कि आरएसएस स्वयंसेवक प्राकृतिक आपदाओं में सबसे आगे रहते हैं चाहे वो बाढ़ हो भूकंप हो या महामारी। उन्होंने विपक्ष के उन दावों को खारिज किया जो आरएसएस को भाजपा का बी-टीम बताते हैं। भागवत ने स्पष्ट किया कि भाजपा एक राजनीतिक दल है जो चुनाव लड़ता है जबकि आरएसएस विचार संगठन है जो सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में काम करता है। ये बयान आरएसएस की 100 वर्ष पूर्ण होने की ओर बढ़ते कदमों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

नागपुर कार्यक्रम का महत्व: तीन दिवसीय आयोजन में क्या हुआ

ये बयान नागपुर के आरएसएस मुख्यालय में चल रहे तीन दिवसीय विशेष कार्यक्रम के दौरान आया। इस आयोजन में देश भर से हजारों स्वयंसेवक शिरकत कर रहे थे। कार्यक्रम का थीम था संगठन की विचारधारा को नए दौर की चुनौतियों से जोड़ना। भागवत ने शाखा प्रथा पर जोर दिया जो आरएसएस का मूल आधार है। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि शाखा में खेल गान चरित्र निर्माण के ज़रिए राष्ट्रभक्ति का बीज बोया जाता है। कार्यक्रम में सेवा भारती जैसे संगठनों के कार्यों का भी ज़िक्र किया गया जो शिक्षा स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में सक्रिय हैं। ये आयोजन फरवरी 2026 के पहले हफ्ते में हुआ जब विपक्षी दल संसद में आरएसएस पर हमले कर रहे थे। भागवत का बयान इन हमलों का अप्रत्यक्ष जवाब था।

आरएसएस और भाजपा का रिश्ता: भागवत ने क्या सीमा खींची

आरएसएस और भाजपा के रिश्ते को लेकर सबसे ज़्यादा बहस होती है। विपक्ष अक्सर कहता है कि आरएसएस भाजपा को कंट्रोल करता है। मोहन भागवत ने इस पर साफ़ लकीर खींची। उन्होंने कहा कि भाजपा का गठन आरएसएस के विचार से प्रेरित होकर हुआ लेकिन आज दोनों अलग संगठन हैं। आरएसएस कभी चुनाव नहीं लड़ता सत्ता में भागीदारी नहीं मांगता। भाजपा के नेता भी स्वयंसेवक हो सकते हैं लेकिन संगठन की प्राथमिकता राजनीति से ऊपर है। भागवत ने उदाहरण दिया कि आरएसएस ने कभी किसी को सत्ता के लिए समर्थन या विरोध का एलान नहीं किया। ये बयान भाजपा के लिए भी राहत था क्योंकि विपक्ष अक्सर दोनों को एक ही सिक्के का दो पहलू बताता है। भागवत ने कहा कि संगठन का काम राष्ट्र को मजबूत बनाना है न कि सत्ता हासिल करना।

विपक्ष के आरोपों का जवाब: आरएसएस नफरत फैलाने वाला नहीं

भागवत ने विपक्ष के उन आरोपों का भी जवाब दिया जो आरएसएस को नफरत या ध्रुवीकरण का प्रतीक बताते हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस हिंदू शब्द को व्यापक अर्थ में लेता है जिसमें सभी भारतीय आते हैं। संगठन का लक्ष्य समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में बांधना है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय को भी संदेश दिया कि आरएसएस उनके साथ सद्भावना रखता है। भागवत ने कहा कि आरएसएस कभी किसी के खिलाफ़ हिंसा या वैमनस्य नहीं सिखाता। ये बयान उस समय आया जब संसद में आरएसएस पर बहस हो रही थी। विपक्ष के नेता इसे हिंदुत्व का उग्र रूप बताते रहे हैं लेकिन भागवत ने इसे सेवा और एकता का माध्यम बताया।

आरएसएस के सेवा कार्य: भागवत ने गिनाई उपलब्धियाँ

भागवत ने आरएसएस के सेवा कार्यों पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि संगठन के सहयोगी जैसे सेवा भारती ने कोविड महामारी में लाखों लोगों की मदद की। बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री पहुँचाई। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्र चलाए। भागवत ने कहा कि ये कार्य बिना किसी प्रचार के किए जाते हैं क्योंकि मकसद सेवा है न कि नाम। उन्होंने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे स्थानीय स्तर पर सेवा को बढ़ाएँ। ये बयान आरएसएस को सिर्फ़ राजनीतिक संगठन बताने वालों के लिए जवाब था। भागवत ने कहा कि संगठन की ताकत शाखाओं में है जहाँ रोज़ाना लाखों स्वयंसेवक इकट्ठा होते हैं।

भविष्य की दिशा: युवाओं पर ज़ोर और 100 वर्ष का सफर

भागवत ने आरएसएस के 100 वर्ष पूर्ण होने की ओर इशारा करते हुए युवाओं को बुलावा दिया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को शाखा प्रथा से जोड़ना ज़रूरी है। डिजिटल दौर में भी चरित्र निर्माण और राष्ट्रभक्ति के मूल्य बरकरार रखने हैं। भागवत ने वैश्विक चुनौतियों का ज़िक्र किया और कहा कि भारत को मज़बूत समाज से ही विश्व गुरु बनेगा। ये बयान संगठन को लंबे सफर के लिए तैयार करने वाला था। विपक्ष इसे राजनीतिक मॉडल बताता रहा लेकिन भागवत ने इसे सामाजिक आंदोलन कहा।

राजनीतिक असर: विपक्ष भाजपा दोनों पर नज़रें

भागवत का ये बयान विपक्ष के लिए चुनौती है क्योंकि ये आरएसएस को नफरत का प्रतीक बताने वाले नैरेटिव को कमज़ोर करता है। भाजपा के लिए ये राहत है क्योंकि ये पार्टी को स्वतंत्र पहचान देता है। संगठन की तटस्थता का दावा विपक्ष के आरोपों को हवा देता है। ये बयान 2026 के राजनीतिक माहौल में अहम है जब लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं। भागवत ने साफ़ किया कि आरएसएस सत्ता से दूर रहकर अपना काम करेगा।

5 FAQs

प्रश्न 1: मोहन भागवत ने आरएसएस के बारे में क्या कहा?
उत्तर: मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस किसी व्यक्ति या समूह के खिलाफ़ नहीं है और सत्ता प्राप्त करने की कोई इच्छा भी नहीं रखता। संगठन समाज सेवा राष्ट्र निर्माण और हिंदू समाज को संगठित करने पर केंद्रित है। नागपुर तीन दिवसीय कार्यक्रम में ये बयान दिया।

प्रश्न 2: आरएसएस और भाजपा के रिश्ते पर भागवत का क्या स्टैंड है?
उत्तर: भागवत ने कहा भाजपा राजनीतिक दल है जो चुनाव लड़ता है जबकि आरएसएस विचार संगठन है। भाजपा आरएसएस विचार से प्रेरित हुई लेकिन दोनों अलग हैं। आरएसएस कभी सत्ता में भागीदारी नहीं मांगता।

प्रश्न 3: विपक्ष के आरोपों का भागवत ने क्या जवाब दिया?
उत्तर: भागवत ने कहा आरएसएस नफरत नहीं फैलाता। हिंदू शब्द व्यापक है सभी भारतीय इसमें आते हैं। संगठन सद्भावना रखता है और सेवा कार्य करता है। विपक्ष के राजनीतिक साजिश वाले दावों को खारिज किया।

प्रश्न 4: नागपुर कार्यक्रम का क्या महत्व था?
उत्तर: तीन दिवसीय कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को विचारधारा से जोड़ा गया। शाखा प्रथा सेवा कार्य और युवाओं पर ज़ोर। आरएसएस 100 वर्ष पूर्ण होने की तैयारी।

प्रश्न 5: भागवत के बयान का राजनीतिक असर क्या?
उत्तर: विपक्ष के नैरेटिव कमज़ोर हुआ। भाजपा को राहत। आरएसएस को सेवा संगठन के रूप में पोजिशन मिली। 2026 चुनावी माहौल में अहम।

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