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क्या भारत–अमेरिका ट्रेड डील से महंगे आयात सस्ते होंगे? अगला हफ्ता वॉशिंगटन में फाइनल राउंड

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India US trade deal March
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कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने बताया कि भारत का डेलिगेशन अगले हफ्ते US जाकर ट्रेड डील का टेक्स्ट फाइनल करेगा। US 50% टैरिफ घटाकर 18% करने और 25% अतिरिक्त पेनल ड्यूटी हटाने पर सहमत है।

50% से 18% तक: क्या नई ट्रेड डील भारत के निर्यातकों की सांसें लौटाएगी?

भारत–अमेरिका ट्रेड डील: अगला राउंड वॉशिंगटन में, मार्च में साइन का लक्ष्य

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही ट्रेड डील बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने 16 फरवरी को बताया कि अगले हफ्ते भारत का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका जाएगा, जहां समझौते के टेक्स्ट को अंतिम रूप देने की कोशिश की जाएगी। इस टीम का नेतृत्व वाणिज्य मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी और चीफ नेगोशिएटर दर्पण जैन करेंगे, जो पिछले कई राउंड में अमेरिका के साथ बातचीत कर चुके हैं। दोनों पक्षों का लक्ष्य है कि मार्च में इस प्रस्तावित व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर हो जाएं, ताकि टैैरिफ कटौती और बाकी प्रावधान जल्द लागू हो सकें।

ट्रंप–युग टैरिफ से बड़ी राहत: 50% से 18% पर आने की तैयारी

समझौते के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में अमेरिकी टैैरिफ कटौती शामिल है, जिसने पिछले साल से भारतीय निर्यातकों पर बड़ा दबाव डाला हुआ था। अगस्त 2025 में उस समय की ट्रंप सरकार ने भारतीय सामानों पर कुल 50 प्रतिशत तक टोटल ड्यूटी लगा दी थी, जिसमें बेस 25 प्रतिशत और अतिरिक्त 25 प्रतिशत पेनल टैैरिफ शामिल था। अब प्रस्तावित डील के तहत अमेरिका ने प्रतिबद्धता जताई है कि वह बेस रेसिप्रोकल टैैरिफ रेट 25 से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा और साथ ही रूस से भारत के तेल आयात के कारण लगाई गई 25 प्रतिशत की पेनल ड्यूटी को पूरी तरह खत्म करेगा। फिलहाल प्रभावी टैैरिफ 25 प्रतिशत पर आ चुका है, और डील साइन होते ही इसे और घटाकर 18 प्रतिशत किया जाना है।

व्हाइट हाउस के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर नज़र

वाणिज्य सचिव ने बताया कि व्हाइट हाउस जल्द ही एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करने वाला है, जिसके जरिए अमेरिकी पक्ष इन रेसिप्रोकल टैैरिफ में कटौती की कानूनी प्रक्रिया पूरी करेगा। यदि किसी वजह से यह एग्जीक्यूटिव ऑर्डर समय पर जारी नहीं होता, तो भारतीय प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे को अगले हफ्ते वॉशिंगटन में होने वाली बैठकों के दौरान सीधे अमेरिकी अधिकारियों के सामने उठाएगा। भारत की प्राथमिकता है कि डील पर साइन होते ही तत्परता से टैैरिफ में कमी लागू हो, ताकि निर्यातकों को स्पष्ट सिग्नल मिल सके और वे अपने कॉन्ट्रैक्ट, प्राइसिंग और शिपमेंट प्लानिंग को नए टैैरिफ स्ट्रक्चर के हिसाब से एडजस्ट कर सकें।

जनवरी का व्यापार घाटा: टैैरिफ का दर्द आँकड़ों में साफ

भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट जनवरी में काफी बढ़ गया, जिसने सरकार को भी सतर्क कर दिया है। जनवरी 2026 में भारत का माल व्यापार घाटा बढ़कर 34.68 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि दिसंबर 2025 में यह 25.04 अरब डॉलर था। इस दौरान वस्तु निर्यात 38.51 अरब डॉलर से घटकर 36.56 अरब डॉलर रह गया, यानी एक्सपोर्ट में गिरावट आई। दूसरी ओर, इम्पोर्ट्स 63.55 अरब डॉलर से बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गए, यानी आयात तेज़ी से बढ़ा। सरकार का कहना है कि जनवरी के ये आंकड़े ट्रंप द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के पूरे प्रभाव को दिखाते हैं, क्योंकि अब ही जाकर यह पूरी तरह आंकड़ों में परिलक्षित हुआ है।

कैसे यह डील भारत के निर्यातकों के लिए ‘राहत पैकेज’ बन सकती है

टैरिफ घटने से भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में ज्यादा कॉम्पिटिटिव हो जाता है, क्योंकि वहां के खरीदारों को अब कम ड्यूटी देनी होगी। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, केमिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और कुछ एग्री प्रोडक्ट्स जैसे सेक्टर इस राहत से सीधे लाभान्वित हो सकते हैं, जो हाल के महीनों में उच्च टैैरिफ के कारण प्राइस में पिछड़ रहे थे। 50 प्रतिशत टैरिफ के समय कई ऑर्डर वियतनाम, मैक्सिको, बांग्लादेश जैसे देशों की ओर शिफ्ट होने लगे थे, जहाँ ड्यूटी कम थी। अब 18 प्रतिशत पर आने से भारत फिर से प्रतिस्पर्धा में बेहतर स्थिति में आ सकता है। सरकार को उम्मीद है कि इससे अगले कुछ क्वॉर्टर में एक्सपोर्ट ग्रोथ में सुधार दिखेगा।

रूसी तेल आयात पर अतिरिक्त 25% ड्यूटी हटना क्यों अहम है

ट्रंप प्रशासन ने रूस से भारत के कच्चे तेल आयात को लेकर अपनी असहमति जताते हुए भारतीय सामान पर 25 प्रतिशत की अतिरिक्त पेनल टैरिफ लगा दी थी। इससे न सिर्फ़ कुछ विशेष उत्पादों पर, बल्कि समग्र रूप से भारत के निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ा, क्योंकि खरीदारों की कॉस्ट बढ़ गई। प्रस्तावित डील के तहत इस पेनल ड्यूटी को हटाने का अमेरिकी वादा भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल पर निर्भरता के साथ-साथ निर्यात बाज़ार को भी सुरक्षित रखना चाहता है। डील लागू होते ही तेल से जुड़ी इस ‘सज़ा’ के बावजूद भारत को अब दंडात्मक टैरिफ नहीं झेलने पड़ेंगे, जो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति के लिए भी सकारात्मक संकेत माना जाएगा।

भारत–अमेरिका आर्थिक रिश्तों के लिए यह डील क्या मायने रखती है

भारत और अमेरिका के आर्थिक रिश्ते पिछले एक दशक में काफी गहराए हैं, लेकिन ट्रेड फ्रंट पर टैैरिफ विवाद समय–समय पर सामने आते रहे हैं। यह डील दोनों देशों के लिए एक तरह से ‘रीसेट’ का काम कर सकती है, जिसमें व्यापार बाधाओं को कम करके निवेश और टेक्नोलॉजी सहयोग के लिए बेहतर माहौल बनाया जाएगा। जैसे ही टैैरिफ कम होंगे, दोनों तरफ़ की कंपनियां लॉन्ग–टर्म कॉन्ट्रैक्ट और सप्लाई चेन निवेश के फैसले ज्यादा आत्मविश्वास के साथ ले सकेंगी। इससे न सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग बल्कि सर्विसेज और डिजिटल ट्रेड जैसे नए क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ने की संभावना है।

EU के साथ ट्रेड पैक्ट: भारत की मल्टी–फ्रंट स्ट्रेटेजी

कमर्स सेक्रेटरी ने यह भी बताया कि भारत ने यूरोपीय संघ के साथ भी एक ट्रेड पैक्ट साइन कर लिया है, जो अगले एक साल के भीतर लागू हो सकता है। इसका मतलब है कि भारत एक साथ दो बड़े बाज़ारों – अमेरिका और EU – में अपने निर्यात के लिए बेहतर टैैरिफ एक्सेस सुरक्षित करने की दिशा में काम कर रहा है। यह मल्टी–फ्रंट स्ट्रेटेजी भारत की ‘चाइना+1’ सप्लाई चेन विकल्प के रूप में पोजिशनिंग को मजबूत कर सकती है, क्योंकि पश्चिमी कंपनियां डाइवर्सिफिकेशन के लिए नए बेस ढूंढ रही हैं। अगर दोनों डील समय पर लागू हो जाती हैं, तो अगले कुछ सालों में भारतीय उद्योग के लिए बड़ा निर्यात अवसर बन सकता है।

आगे क्या: वॉशिंगटन दौऱे से क्या उम्मीदें?

अगले हफ्ते वॉशिंगटन जा रहा भारतीय डेलिगेशन डील के टेक्स्ट, शेड्यूल ऑफ टैरिफ कट्स, सेंसेटिव लिस्ट और डिस्प्यूट सैटलमेंट जैसे मुद्दों पर आखिरी बातचीत करेगा। अगर दोनों पक्ष समय सीमा पर सहमत रहे, तो मार्च में किसी हाइ–लेवल विज़िट या वर्चुअल सेरेमनी के दौरान डील पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। इसके बाद भारतीय सरकार को घरेलू स्तर पर इंडस्ट्री से कंसल्टेशन कर, उनको नए टैैरिफ स्ट्रक्चर का फायदा उठाने के लिए गाइडेंस देनी होगी। ट्रेड बॉडीज़ पहले से ही संकेत दे रही हैं कि डील फाइनल होते ही वे अमेरिकी खरीदारों के साथ नए कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू कर देंगी।

FAQs (Hindi)

  1. प्रश्न: भारतीय डेलिगेशन US कब और किसलिए जा रहा है?
    उत्तर: वाणिज्य सचिव के अनुसार अगले हफ्ते डेलिगेशन वॉशिंगटन जाएगा, जहाँ प्रस्तावित भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के टेक्स्ट और कंटूर को फाइनल किया जाएगा, ताकि मार्च में डील साइन हो सके।
  2. प्रश्न: नई ट्रेड डील में अमेरिका कौन–से टैैरिफ घटाएगा?
    उत्तर: अमेरिका ने प्रतिबद्धता जताई है कि भारतीय सामान पर रेसिप्रोकल बेस टैैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा और रूस से तेल आयात के चलते लगाई गई 25 प्रतिशत अतिरिक्त पेनल टैरिफ पूरी तरह खत्म करेगा।
  3. प्रश्न: ट्रंप–युग 50% टैरिफ का असर क्या रहा?
    उत्तर: अगस्त 2025 से लगे कुल 50 प्रतिशत टैरिफ (25 बेस + 25 पेनल) की वजह से भारत के निर्यात महंगे हो गए, कई ऑर्डर दूसरे देशों की ओर चले गए और जनवरी 2026 में ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 34.68 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
  4. प्रश्न: जनवरी 2026 के व्यापार आंकड़े क्या बताते हैं?
    उत्तर: जनवरी में एक्सपोर्ट 38.51 से घटकर 36.56 अरब डॉलर हो गए, जबकि इम्पोर्ट 63.55 से बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हुए, जिससे मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट 34.68 अरब डॉलर तक चौड़ा हो गया।
  5. प्रश्न: EU के साथ भारत की ट्रेड डील का क्या स्टेटस है?
    उत्तर: भारत ने यूरोपीय संघ के साथ भी एक व्यापार समझौता साइन कर लिया है, जो अगले करीब एक साल के भीतर लागू होने की उम्मीद है, जिससे भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाज़ार में बेहतर टैैरिफ एक्सेस मिल सकता है।

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