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मणिशंकर अय्यर का कांग्रेस पर नया हमला: “इमरजेंसी जैसा असहमति-कुचलना पार्टी को डुबो देगा”

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Mani Shankar Aiyar Congress criticism
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मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस पर फिर निशाना साधते हुए इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का जिक्र किया और चेताया कि पार्टी के भीतर असहमति को दबाना “doom” यानी विनाश का रास्ता है। उन्होंने नेतृत्व से आंतरिक लोकतंत्र और आलोचना को स्वीकार करने की सलाह दी।

कांग्रेस में ‘डिसेंट’ पर बहस तेज: मणिशंकर अय्यर बोले—“इमरजेंसी वाली गलती दोहराई तो खत्म हो जाओगे”

मणिशंकर अय्यर का कांग्रेस पर नया हमला: “असहमति को कुचलना विनाश का रास्ता”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे मणिशंकर अय्यर ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी पर तीखा हमला बोला है। इस बार उन्होंने इंदिरा गांधी के दौर की इमरजेंसी का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी के भीतर असहमति (dissent) को दबाना या कुचलना कांग्रेस के लिए “doom” यानी तबाही का रास्ता साबित होगा। अय्यर का संदेश साफ था—जो पार्टी आलोचना सुनने की क्षमता खो देती है, वह धीरे-धीरे खुद को ही कमजोर कर देती है।

अय्यर ने अपने बयान में इमरजेंसी को एक “सबक” की तरह पेश किया। उनका तर्क यह रहा कि जब किसी व्यवस्था में अलग राय रखने वालों की आवाज दबाई जाती है, तो पार्टी और लोकतंत्र दोनों को नुकसान होता है। उन्होंने संकेत दिया कि कांग्रेस अगर अपनी अंदरूनी कार्यप्रणाली में लोकतांत्रिक स्पेस नहीं बचाएगी तो संगठनात्मक गिरावट और तेज हो सकती है।

क्यों चर्चा में हैं मणिशंकर अय्यर?

मणिशंकर अय्यर बीते कुछ समय से कांग्रेस नेतृत्व और पार्टी के अंदर के फैसलों पर बार-बार टिप्पणी करते रहे हैं। उनकी शैली अक्सर तीखी और सीधे शब्दों वाली रहती है, जिससे पार्टी के भीतर भी असहजता बनती है और बाहर विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है। इस बार भी उनके बयान का केंद्र “आंतरिक लोकतंत्र” और “असहमति” रहा, जिसे उन्होंने पार्टी की सेहत के लिए जरूरी बताया।

उनकी दलील यह है कि कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी ने अगर इमरजेंसी जैसी घटनाओं से सबक नहीं लिया, और आज भी dissent को दबाने की प्रवृत्ति रही, तो यह पार्टी के भविष्य के लिए खतरनाक होगा। यानी, यह बयान केवल इतिहास याद दिलाने के लिए नहीं, बल्कि आज के नेतृत्व और निर्णय-प्रक्रिया पर सीधी टिप्पणी है।

इमरजेंसी का संदर्भ: अय्यर कहना क्या चाह रहे हैं?

अय्यर ने इमरजेंसी के संदर्भ से यह संदेश देने की कोशिश की कि सत्ता या संगठन के भीतर आलोचना को “अनुशासनहीनता” कहकर दबाने का तरीका लंबे समय में उलटा पड़ता है। उनका मानना है कि पार्टी के भीतर बहस, सवाल और अलग विचार बने रहेंगे तो ही नेतृत्व भी बेहतर फैसले ले पाएगा और जमीनी स्तर पर भरोसा मजबूत होगा।

उनका यह भी संकेत है कि कांग्रेस को केवल चुनावी रणनीति पर नहीं, बल्कि संगठन की संस्कृति पर भी ध्यान देना होगा—कैसे फैसले होते हैं, किसे सुना जाता है, और असहमति रखने वालों के साथ व्यवहार कैसा होता है। क्योंकि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता है तो कार्यकर्ता हतोत्साहित होते हैं और संगठन टूटने लगता है।

कांग्रेस के लिए इसका राजनीतिक मतलब क्या है?

ऐसे बयान कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती बनाते हैं। एक तरफ पार्टी को अपने भीतर उठ रही आलोचनाओं और असंतोष को संभालना होता है, दूसरी तरफ सार्वजनिक मंच पर ऐसी टिप्पणियों से पार्टी की छवि और संदेश-एकरूपता प्रभावित हो सकती है। अय्यर की टिप्पणी उस बहस को फिर सामने लाती है कि कांग्रेस में निर्णय प्रक्रिया कितनी सहभागी है और आलोचना की जगह कितनी है।

विपक्ष आमतौर पर ऐसे बयानों को कांग्रेस की “अंदरूनी फूट” के सबूत के रूप में पेश करता है, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे “सुधार की सलाह” भी कह सकते हैं। लेकिन इतना तय है कि “इमरजेंसी” जैसे संदर्भों के साथ दिया गया बयान राजनीतिक तौर पर भारी होता है और लंबे समय तक चर्चा में रहता है।

असहमति और अनुशासन: संतुलन कैसे बने?

राजनीतिक पार्टियों में अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन का मतलब यह नहीं कि हर सवाल बंद कर दिया जाए। असहमति अगर नीति और संगठन को बेहतर बनाने के लिए हो, तो वह पार्टी के लिए ताकत बन सकती है। अय्यर का मुख्य तर्क यही है कि dissent को “दुश्मनी” मानने के बजाय “फीडबैक” की तरह लेना चाहिए।

अगर कांग्रेस अपने अंदर लोकतांत्रिक संवाद की जगह बढ़ाती है, नियमित बैठकों में विभिन्न नेताओं और कार्यकर्ताओं को सुने, और आलोचना के लिए स्पष्ट मंच दे, तो अंदरूनी तनाव कम हो सकता है। वहीं, अगर असहमति को कुचलने की प्रवृत्ति रही तो असंतोष बाहर निकलेगा और नुकसान भी सार्वजनिक होगा—यही अय्यर की चेतावनी का सार है।

FAQs (5)

  1. मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस को लेकर क्या कहा?
    उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर असहमति को दबाना या कुचलना कांग्रेस के लिए “doom” यानी विनाश का रास्ता होगा।
  2. अय्यर ने इमरजेंसी का जिक्र क्यों किया?
    उन्होंने इंदिरा गांधी के दौर की इमरजेंसी को एक सबक की तरह बताते हुए कहा कि dissent crush करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र और पार्टी—दोनों के लिए नुकसानदेह होती है।
  3. अय्यर का मुख्य संदेश क्या है?
    उनका संदेश है कि कांग्रेस को आंतरिक लोकतंत्र और आलोचना को स्वीकार करने की क्षमता बढ़ानी चाहिए, क्योंकि असहमति संगठन को मजबूत भी कर सकती है।
  4. ऐसे बयानों का कांग्रेस पर क्या असर हो सकता है?
    इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व और फैसलों पर बहस तेज होती है, और बाहर विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिलता है।
  5. “दिसेंट” और “अनुशासन” में संतुलन कैसे बने?
    अनुशासन जरूरी है, लेकिन आलोचना/असहमति को फीडबैक की तरह लेकर संवाद के मंच बनाए जाएं, ताकि संगठन मजबूत रहे—यही इस बहस का व्यावहारिक निष्कर्ष है।

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