बिहार में 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी पर NDA सहयोगियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से समीक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि नीति का उद्देश्य सही हो सकता है, लेकिन लागू करने में खामियां हैं, enforcement में भ्रष्टाचार के आरोप और राज्य को बढ़ते राजस्व नुकसान चिंता का विषय हैं।
बिहार शराबबंदी पर NDA सहयोगियों का दबाव: “नीति नहीं, लागू करने में खामी” – नीतीश से समीक्षा की मांग
बिहार शराबबंदी पर NDA सहयोगियों की नाराज़गी: “नीति नहीं, लागू करने में खामी” – समीक्षा की मांग
बिहार में 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी (Total Prohibition) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। इस बार सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि NDA के ही सहयोगी उठा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक NDA सहयोगियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से शराबबंदी नीति की समीक्षा करने की मांग की है और कहा है कि “इम्प्लीमेंटेशन flawed है”, यानी जमीन पर इसे लागू करने का तरीका बिगड़ा हुआ है।
खास बात यह है कि सहयोगियों का तर्क यह नहीं है कि शराबबंदी का उद्देश्य ही गलत है, बल्कि यह है कि लागू करने वाली मशीनरी में खामियां, भ्रष्टाचार की आशंका और परिणामस्वरूप बढ़ता फिस्कल लॉस (राजस्व नुकसान) राज्य के लिए बड़ी परेशानी बन रहा है। इसी वजह से वे नीति और उसके क्रियान्वयन दोनों पर दोबारा नजर डालने की बात कर रहे हैं।
2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी: पॉलिसी की पृष्ठभूमि
बिहार में 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी, जब नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। नीति का घोषित उद्देश्य समाज में शराब से जुड़ी समस्याओं—घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य नुकसान, गरीब परिवारों की आय का शराब में बहना—जैसे मुद्दों पर रोक लगाना था।
हालांकि समय के साथ कई बार यह सवाल उठता रहा कि क्या शराबबंदी ने सच में खपत कम की या सिर्फ वैध बाजार को अवैध बाजार में बदल दिया। अब NDA सहयोगियों की समीक्षा मांग यह संकेत देती है कि सरकार के भीतर भी यह माना जा रहा है कि “कागज पर पॉलिसी” और “जमीन पर व्यवस्था” में गैप पैदा हो चुका है।
NDA सहयोगियों की मुख्य आपत्तियां: क्या-क्या कहा गया?
रिपोर्ट के अनुसार, NDA सहयोगियों ने खासकर तीन मुद्दों पर चिंता जताई:
- Enforcement की खामियां: कानून तो है, लेकिन लागू करने में कमजोरियां हैं।
- बढ़ता फिस्कल लॉस: शराब से मिलने वाला वैध राजस्व बंद होने के बाद राज्य को आर्थिक नुकसान की बात उठी है।
- एजेंसियों में भ्रष्टाचार पर सख्ती: सहयोगियों ने enforcement एजेंसियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्यादा कड़े कदम उठाने की मांग की है।
इन बिंदुओं का सार यह है कि सहयोगी “बैन हटाओ” से ज्यादा “सिस्टम ठीक करो” की लाइन पर हैं—यानी या तो नीति को व्यावहारिक बनाइए, या फिर इसके लागू होने के तरीके में बड़े सुधार कीजिए।
जमीन पर चुनौती: ‘नीति’ बनाम ‘क्रियान्वयन’
शराबबंदी जैसी नीतियां सिर्फ कानून पास करने से सफल नहीं होतीं, उन्हें चलाने के लिए एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा चाहिए—सख्त निगरानी, पारदर्शी कार्रवाई, और ईमानदार enforcement। NDA सहयोगियों की टिप्पणी “implementation flawed” इसी तरफ इशारा करती है कि राज्य की मशीनरी में कहीं न कहीं कमजोर कड़ी है।
जब किसी नीति के लागू करने में भ्रष्टाचार का शक आता है, तो आम लोगों का भरोसा टूटता है और अवैध नेटवर्क मजबूत होते हैं। इसलिए सहयोगी अब “एजेंसियों के भीतर की सफाई” और जवाबदेही की मांग को केंद्र में रख रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है: समीक्षा का मतलब क्या?
समीक्षा की मांग का मतलब अलग-अलग तरीके हो सकते हैं—नीति के कुछ हिस्सों में संशोधन, enforcement को मजबूत करने के लिए संरचनात्मक बदलाव, या फिर प्रक्रियाओं को मानवीय/पारदर्शी बनाना। NDA सहयोगियों की मांग के आधार पर सरकार इन कदमों पर विचार कर सकती है:
- Implementation audit: कहां-कहां कमजोरियां हैं, इसका समयबद्ध ऑडिट।
- Anti-corruption drive: enforcement एजेंसियों में भ्रष्टाचार पर स्पेशल टास्क।
- Fiscal impact review: राजस्व नुकसान और वैकल्पिक रेवेन्यू मॉडल का आकलन।
फिलहाल रिपोर्ट में यही संकेत है कि NDA के भीतर इस मुद्दे पर असहजता बढ़ रही है और अब इसे “नीति की समीक्षा” के स्तर तक ले जाया जा रहा है।
FAQs (5)
- NDA सहयोगी बिहार की शराब नीति पर क्या चाहते हैं?
वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से शराबबंदी नीति की समीक्षा चाहते हैं और कहते हैं कि नीति से ज्यादा “इम्प्लीमेंटेशन flawed” है। - बिहार में पूर्ण शराबबंदी कब लागू हुई थी?
रिपोर्ट के मुताबिक बिहार ने 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी, जब नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। - सहयोगियों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार, सहयोगियों ने enforcement की खामियों और बढ़ते फिस्कल लॉस पर चिंता जताई है। - भ्रष्टाचार का मुद्दा कैसे जुड़ा है?
NDA सहयोगियों ने मांग की है कि शराबबंदी लागू करने वाली एजेंसियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ और सख्त कदम उठाए जाएं। - आगे सरकार क्या कर सकती है?
सरकार नीति और क्रियान्वयन की समीक्षा, enforcement सुधार, और fiscal impact का आकलन जैसे कदमों पर विचार कर सकती है।
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