चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (SIR) का आदेश विधायी है। पुराने वोटरों को छूट, सिर्फ दस्तावेज तब मांगे जब लिंकेज न हो। बिहार समेत कई राज्य प्रभावित।
बिहार समेत कई राज्यों में SIR पर सवाल: चुनाव आयोग का दावा- 20 साल बाद पहली साफ-सफाई
विशेष गहन संशोधन (SIR): चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- वोटर लिस्ट साफ करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (SIR) पर जोरदार बहस हुई। चुनाव आयोग ने चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमलया बाघची की बेंच को साफ कहा कि SIR का आदेश विधायी प्रकृति का है। ये पूरे देश के लिए सामान्य दिशानिर्देश हैं जो सिद्धांत बताते हैं और जरूरी दस्तावेज सूचीबद्ध करते हैं। सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने EC की तरफ से दलील दी। ये बिहार समेत कई राज्यों में चल रही प्रक्रिया पर याचिकाओं की अंतिम सुनवाई थी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स जैसी NGO ने चुनौती दी थी।
EC का कहना है कि वोटर रजिस्ट्रेशन जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62 के तहत शर्तों पर होता है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 326 और 1950 एक्ट की धारा 19 EC को संवैधानिक जिम्मेदारी देते हैं कि सिर्फ नागरिक ही वोटर बने। द्विवेदी बोले, ‘संविधान निर्माताओं का यही इरादा था।’ SIR कोई सख्ती नहीं बल्कि पुरानी वोटर लिस्ट (जून 2025 तक) में नाम वाले लोगों को प्रेजम्प्टिव वैलिडिटी मिलती है अगर माता-पिता से लिंकेज साबित हो। सिर्फ लिंकेज न होने पर 11 दस्तावेज मांगे जाते हैं जिसमें आधार शामिल।
ये प्रक्रिया सामान्य वेरिफिकेशन से अलग है। सभी वोटरों को एन्यूमरेशन फॉर्म दिए जाते हैं। जून 2025 तक के वोटरों को 2002 वाली लिस्ट तक वैल्यू दी जाती। लाइनेज साबित तो दस्तावेज जरूरी नहीं। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर प्री-फिल्ड फॉर्म लेते हैं, सिर्फ साइन चाहिए। BLO को दिन में 50 फॉर्म जमा करने की छूट। कोई पुलिस इन्वॉल्वमेंट नहीं। द्विवेदी ने कहा, ‘पश्चिम बंगाल का केस दूसरे राज्यों पर मत थोपें, तरीका अलग है।’
EC ने जोर दिया कि संसद और EC का सह-अस्तित्व है। अनुच्छेद 327 कहता है ‘संविधान के प्रावधानों के अधीन’ तो संसद और EC दोनों सीमित। अनुच्छेद 324 में एडमिनिस्ट्रेटिव, एडजुडिकेटरी और विधायी पावर हैं। फॉर्म 6 में बदलाव की शिकायत पर बोले- 20 साल से SIR नहीं हुआ, पहले सेल्फ डिक्लेरेशन पर निर्भर थे बिना जांच। कोई बड़े पैमाने पर वोटर हटाने का केस हाईकोर्ट या SC में नहीं आया। 65 लाख वोटरों में से कोई आम आदमी शिकायतकर्ता नहीं, सिर्फ पॉलिटिकल लीडर और NGO।
15 जनवरी को EC ने कहा था कि नागरिकता सिर्फ वोटिंग उद्देश्य से तय करते हैं, डिपोर्ट या वीजा डिसीजन नहीं। 13 जनवरी को बोले कि EC मूल अथॉरिटी है वोटर लिस्ट पर, दूसरे देश की नागरिकता लेने पर राष्ट्रपति को बाइंडिंग ओपिनियन। बंगाल में SC ने लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाले 1.36 करोड़ वोटरों को बचाने के निर्देश दिए- पिता का नाम मिसमैच, उम्र अंतर 50 साल से ज्यादा, 6 से ज्यादा संतान आदि। नाम पब्लिक प्लेस पर लगाएं, सुनवाई का मौका दें।
SIR का पूरा बैकग्राउंड
वोटर लिस्ट तैयार करना लोकतंत्र की बुनियाद। हर चुनाव से पहले रिवीजन होता है लेकिन SIR स्पेशल है। मृत, शिफ्ट हुए वोटर हटाने, फर्जी नाम साफ करने के लिए। 2026 चुनावों से पहले बिहार, बंगाल, केरल आदि में चल रहा। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) पर EC को पावर। रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 से बंधा। मुख्य लक्ष्य- सही वोटर लिस्ट, विदेशी वोट न दें।
5 अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- SIR क्या है?
विशेष गहन संशोधन- वोटर लिस्ट साफ करने की प्रक्रिया। मृत, शिफ्ट, फर्जी नाम हटाना। 2026 चुनावों से पहले। - SIR में दस्तावेज क्यों मांग रहे?
पुरानी लिस्ट से लिंकेज न हो तो। लिंकेज हो तो जरूरी नहीं। सिर्फ नागरिकता वोटिंग के लिए चेक। - क्या SIR से वोटर कटे?
नहीं, 65 लाख में कोई आम शिकायत कोर्ट में नहीं। मौत/माइग्रेशन सामान्य एक्सक्लूजन। - EC को इतना पावर क्यों?
अनुच्छेद 324 से। सिर्फ नागरिक वोट दें, संवैधानिक कर्तव्य। - SC ने क्या कहा?
पावर अनलिमिटेड नहीं। नेचुरल जस्टिस फॉलो। बंगाल में स्पेशल निर्देश दिए।
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