कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ट्रंप के इस बयान – कि रूस से तेल खरीद पर “PM मोदी के लिए मुझे खुश रखना जरूरी था” – पर जवाब देते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति किसी एक देश की खुशी या दबाव पर नहीं चलेगी। उन्होंने मल्टी-अलाइन फॉरेन पॉलिसी, रूस–अमेरिका–चीन–यूरोप के संतुलन और भारतीय राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता पर विस्तार से बात की।
“हमें किसी एक देश को खुश करने के लिए नहीं बनाया गया” – थरूर ने रूस ऑयल, टैरिफ और मोदी पर ट्रंप की बातों को कैसे काउंटर किया
भारत की विदेश नीति का “ऑन-डिमांड” मॉडल नहीं चलेगा: थरूर का ट्रंप को जवाब
कांग्रेस सांसद और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने साफ कहा कि भारत अपनी विदेश नीति किसी दूसरे देश के “डिमांड” या “किसी को खुश रखने” के लिए नहीं चलाएगा। उनका यह बयान उस समय आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एयर फ़ोर्स वन पर पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर “PM मोदी जानते थे कि मुझे खुश रखना कितना ज़रूरी है” और यह भी चेतावनी दी कि भारत पर टैरिफ बहुत जल्दी बढ़ाए जा सकते हैं।
ट्रंप ने कहा था कि मोदी “very good man” और “good guy” हैं, जो समझते हैं कि राष्ट्रपति रूस से तेल आयात पर खुश नहीं थे, और यह भी जोड़ा कि भारत के साथ व्यापार पर लगे टैरिफ को वह मिनटों में और बढ़ा सकते हैं। साथ ही, उन्होंने रूसी तेल खरीद को यूक्रेन–युद्ध से जोड़ते हुए भारत पर दबाव की लाइन जारी रखी।
थरूर की मुख्य बात: “नेशनल इंटरेस्ट और मल्टी-अलाइन पॉलिसी”
थरूर ने पत्रकारों से कहा कि हर देश के लिए सबसे ऊपर उसका राष्ट्रीय हित होता है और भारत के लिए इसका मतलब है कि वह खुद के लिए किसी भी मोर्चे पर “बड़े दुश्मन” या “बड़ी समस्या” नहीं बनाना चाहता। उन्होंने कहा कि भारत की कोशिश यह रहनी चाहिए कि जितना संभव हो, हर किसी के साथ संवाद के चैनल खुले रहें।
उन्होंने भारत की पारंपरिक “मल्टी-अलाइन” (multi-aligned) रणनीति को दोहराते हुए कहा कि भारत को साथ-साथ कई मोर्चों पर संतुलन रखना होगा –
– रूस के साथ अच्छे रिश्ते,
– चीन के साथ “decent relations”,
– अमेरिका के साथ अच्छे संबंध,
– यूरोप के लिए दरवाजे खुले रखना,
– अफ्रीका में नए अवसर विकसित करना,
– ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से रिश्ते बेहतर करना,
– जापान, दक्षिण कोरिया और ASEAN देशों के साथ जुड़ाव बढ़ाना।
थरूर के मुताबिक, यह सब मिलकर ऑप्शंस का मैक्सिमम सेट बनाते हैं। जीवन, राजनीति और डिप्लोमेसी में “जितने ज्यादा ऑप्शंस होते हैं, आप किसी एक देश की मनमानी से उतने ही सुरक्षित रहते हैं।”
“इंडिया ऑन-डिमांड फॉरेन पॉलिसी नहीं करेगा”
थरूर का साफ संदेश यह था कि भारत की विदेश नीति किसी “डिमांड सर्विस” की तरह नहीं है कि कोई भी देश, चाहे वह अमेरिका जैसा साझेदार ही क्यों न हो, टैरिफ या सैंक्षन की धमकी देकर दिल्ली से अपनी मनचाही लाइन लिखवा ले। उनके शब्दों में, राष्ट्रीय हित का मतलब होता है –
– किसी एक देश को नाराज़ या खुश करने की बजाय, अपने दीर्घकालिक हित देखना,
– रूस–यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना,
– और यह मानना कि विदेश नीति “मैक्सिमम ऑप्शंस” से चलती है, न कि “एक फोन कॉल, एक मांग, एक डिक्टेट” से।
ट्रंप का दबाव: टैरिफ और रूसी तेल की राजनीति
ट्रंप ने हाल के हफ्तों में कई बार इशारा किया कि भारत अगर रूसी तेल खरीद कम नहीं करेगा तो उस पर और ऊंचे टैरिफ लगाए जा सकते हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस से पेट्रोलियम उत्पाद आयात करने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ की अनुमति देने वाला नया अमेरिकन बिल भी लाया गया है, जिसमें भारत और चीन जैसे देशों का नाम चर्चा में रहा।
उन्होंने यह दावा भी किया था कि PM मोदी ने उन्हें आश्वासन दिया कि भारत रूस से तेल खरीद बंद कर देगा या तेजी से घटाएगा। लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय ने पहले ही साफ कर दिया था कि ऐसी किसी बातचीत या आश्वासन की जानकारी सरकार के पास नहीं है और भारत की ऊर्जा नीति पूरी तरह भारतीय उपभोक्ता के हितों और बाजार की वास्तविकता पर आधारित है।
भारत की आधिकारिक लाइन क्या रही है?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पहले भी कह चुके हैं कि भारत एक “सॉवरेन देश” के तौर पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा खुद तय करेगा।
– भारत का तर्क: सस्ती रूसी क्रूड से घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, जो अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों के लिए जरूरी है।
– भारत यह भी कहता रहा है कि वह किसी भी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भर नहीं रहना चाहता और इसलिए उसके ऑयल इम्पोर्ट पोर्टफोलियो में कई देश शामिल हैं।
थरूर की बात इसी लाइन के करीब है – यानी विदेश नीति ट्रंप के गुस्से या “खुशी” के हिसाब से नहीं बल्कि भारत के दीर्घकालिक हित, स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी और मल्टी-अलाइन एप्रोच से चलेगी।
थरूर का स्ट्रक्चरल मैसेज: ऑप्शंस ही सिक्योरिटी हैं
थरूर ने एक तरह से तीन–स्तरीय मैसेज दिया –
- थ्योरी: जितने ज्यादा कूटनीतिक ऑप्शंस, उतनी ज्यादा सुरक्षा।
- प्रैक्टिकल: रूस, अमेरिका, यूरोप, पड़ोसी एशियाई देशों के साथ समानांतर रिश्ते, ताकि कोई एक देश टैरिफ या सैंक्षन से भारत को घुटनों पर न ला सके।
- पॉलिटिकल: भारत को दुनिया में “संतुलन–निर्माता” (balancer) के रूप में देखा जाए, किसी एक ब्लॉक के “फॉलोअर” के रूप में नहीं।
उन्होंने संकेत दिया कि “मल्टी-अलाइन” यानी नॉन-अलाइनमेंट का आधुनिक रूप है – जहां भारत किसी भी कैंप में पूरी तरह बंधा नहीं, बल्कि मुद्दा–दर–मुद्दा अपने हित के हिसाब से फैसले करता है।
ट्रंप–थरूर एपिसोड का राजनीतिक सिग्नल
– ट्रंप का संदेश: भारत पर दबाव बनाकर रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करना, और साथ ही घरेलू अमेरिकी दर्शकों के सामने “सख्त नेता” की छवि दिखाना।
– थरूर का संदेश: चाहे विदेश नीति पर आंतरिक मतभेद हों, पर नेशनल इंटरेस्ट और स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी पर भारतीय राजनीति में व्यापक सहमति है – भारत “ट्रिगर–हैपी टैरिफ” या “keep me happy” जैसी पर्सनलाइज्ड डिप्लोमेसी पर नहीं चलेगा।
5 FAQs
- ट्रंप ने PM मोदी के बारे में क्या कहा था?
एयर फ़ोर्स वन पर ट्रंप ने कहा कि “मोदी is a good guy, he knew I was not happy, it was important to make me happy,” और चेतावनी दी कि भारत पर टैरिफ बहुत जल्दी बढ़ाए जा सकते हैं, खासकर रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर। - शशि थरूर ने इसका जवाब कैसे दिया?
थरूर ने कहा कि भारत अपनी विदेश नीति किसी एक देश को खुश करने पर नहीं चलाएगा, बल्कि राष्ट्रीय हित, मल्टी-अलाइन एप्रोच और सभी के साथ संवाद बनाए रखने की रणनीति पर कायम रहेगा। - मल्टी-अलाइन फॉरेन पॉलिसी से थरूर का क्या मतलब है?
उनके मुताबिक, भारत को रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया–NZ और ASEAN देशों के साथ समानांतर रिश्ते रखकर अपने विकल्प अधिकतम करने चाहिए, ताकि किसी एक देश के दबाव से बचा जा सके। - क्या भारत ने सच में रूस से तेल खरीद बंद करने का वादा किया था?
भारत ने ट्रंप के इस दावे को खारिज किया है कि PM मोदी ने रूस से तेल खरीद रोकने का आश्वासन दिया था, और कहा है कि ऐसी किसी बातचीत या वचन का रिकॉर्ड नहीं है; भारत की ऊर्जा नीति अपने उपभोक्ताओं के हितों से संचालित होती है। - ट्रंप भारत पर टैरिफ क्यों बढ़ाना चाहते हैं?
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि रूस से तेल खरीदकर भारत अप्रत्यक्ष रूप से रूस की युद्ध–अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है, इसलिए वे टैरिफ और सैंक्शन्स को दबाव के औज़ार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि भारत अपनी रूसी तेल–नीति बदले।
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