कर्नाटक सरकार ने 29 जनवरी के सर्कुलर से निर्देश दिया कि सभी सरकारी, सहायतित संस्थान, बोर्ड, निगम, स्वायत्त निकाय और विश्वविद्यालयों के अधिकारी–कर्मचारी हर महीने के पहले शनिवार को खादी पहनें और सरकारी कार्यक्रमों, स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर भी खादी को प्राथमिकता दें। खादी को आज़ादी के आंदोलन, राष्ट्रीय सम्मान, आत्मगौरव और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए, यह फैसला 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिया गया है। राज्य की 176 खादी संस्थाओं, बुनकरों की आजीविका, फैशन में आए बदलाव और कर्मचारियों पर इसके व्यावहारिक असर को विस्तार से समझें।
खादी, आज़ादी और सरकारी नौकरी: क्या कर्नाटक का नया नियम बाकी राज्यों के लिए मिसाल बनेगा?
कर्नाटक सरकार का खादी आदेश: हर महीने के पहले शनिवार को सरकारी कर्मचारियों के लिए नया नियम
कर्नाटक सरकार ने खादी को सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं, बल्कि आज़ादी की याद, राष्ट्रीय सम्मान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हुए एक अहम फैसला लिया है। राज्य सरकार ने सभी अधिकारियों और कर्मचारियों से अपील की है कि वे हर महीने के पहले शनिवार को दफ्तर आते समय खादी के कपड़े पहनें। साथ ही, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और दूसरे आधिकारिक सरकारी कार्यक्रमों में भी खादी को प्राथमिकता देने को कहा गया है।
यह निर्देश 29 जनवरी को मुख्य सचिव शालिनी रजनीश द्वारा जारी सर्कुलर के ज़रिए दिया गया, जो 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिया गया एक प्रतीकात्मक लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। सरकार का मानना है कि इससे न केवल खादी के प्रति सम्मान और मांग बढ़ेगी, बल्कि सरकारी सेवा का सीधा संबंध आज़ादी के आंदोलन और गांधीवादी मूल्यों से भी दोबारा जुड़ सकेगा।
निर्देश में क्या–क्या कहा गया है?
सर्कुलर के मूल बिंदु बहुत साफ और सीधे हैं।
पहला, किन–किन कर्मचारियों पर लागू?
सर्कुलर के अनुसार, यह अपील/निर्देश सिर्फ़ मंत्रालय या सचिवालय तक सीमित नहीं है, बल्कि:
- राज्य सरकार के सभी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी
- सरकारी अनुदान प्राप्त (aided) संस्थान
- निगम (corporations) और बोर्ड
- स्वायत्त संस्थान (autonomous bodies)
- विश्वविद्यालय
इन सभी श्रेणियों के कर्मचारियों को इसमें शामिल किया गया है। यानी, कर्नाटक के सरकारी इकोसिस्टम का लगभग पूरा व्हाइट–कॉलर ढांचा इस दायरे में आता है।
दूसरा, कब और कैसे पहनना है?
- हर महीने के पहले शनिवार को ड्यूटी के दौरान खादी के कपड़े पहनने की अपील की गई है।
- सभी आधिकारिक सरकारी कार्यक्रमों – खासकर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस – में भी अफसरों और स्टाफ से कहा गया है कि वे खादी पहनकर ही शामिल हों।
तीसरा, “स्वैच्छिक” या “कठोर नियम”?
सर्कुलर में शब्द प्रयोग “voluntarily” यानी “स्वैच्छिक” का किया गया है। सरकार आधिकारिक भाषा में इसे एक प्रेरक पहल के रूप में पेश कर रही है, न कि सख्त दंडात्मक ड्रेस कोड के रूप में।
हालांकि कुछ टीवी रिपोर्ट्स और बयानबाज़ी में इसे “कड़ाई से पालन करने वाला” नियम भी कहा गया है, जिससे यह बहस भी चल पड़ी है कि व्यवहार में यह कितना “स्वैच्छिक” रहेगा और कितना “डिफ़ॉल्ट अनिवार्य” माना जाएगा।
खादी को लेकर सर्कुलर की भाषा और प्रतीकवाद
सर्कुलर में खादी की चर्चा महज़ एक कपड़े के तौर पर नहीं की गई, बल्कि उसमें कई परतें जोड़ी गई हैं:
- खादी “राष्ट्र की गरिमा और स्वाभिमान” का प्रतीक है।
- यह आज़ादी के आंदोलन का अहम हिस्सा रही है और गांधीजी के स्वदेशी–स्वावलंबन के विचार का केंद्र रही।
- आज के समय में खादी बुनकर नए–नए डिज़ाइन और मॉडर्न स्टाइल में कपड़े बना रहे हैं, जिससे यह फैब्रिक युवाओं के बीच भी स्वीकार्य बन रहा है।
- खादी उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है, जो हज़ारों कतिनें (spinners) और बुनकरों को सीधा–अप्रत्यक्ष रोज़गार देता है।
सरकार का तर्क यह है कि अगर सरकारी कर्मचारी नियमित रूप से – भले ही महीने में सिर्फ़ एक दिन – खादी पहनेंगे, तो:
- खादी की पब्लिक विज़िबिलिटी बढ़ेगी
- शहरों में काम करने वाला मिडिल–क्लास भी खादी को रोज़मर्रा के पहनावे के रूप में ज्यादा अपनाएगा
- और सबसे अहम, ग्रामीण बुनकरों की आमदनी में कुछ न कुछ बढ़ोतरी होगी
77वां गणतंत्र दिवस और ‘आजादी से जुड़ाव’ की थीम
कर्नाटक सरकार ने इस फैसले को सीधे 77वें गणतंत्र दिवस से जोड़ा। सर्कुलर में कहा गया कि:
- यह निर्णय देश की आज़ादी की लड़ाई के आदर्शों से “लोक सेवा” को दोबारा जोड़ने की दिशा में उठाया गया कदम है।
- खादी पहनने से सरकारी कर्मचारी सिर्फ़ एक ड्रेस नहीं बदलेंगे, बल्कि एक तरह से यह याद भी दिलाएंगे कि उनका काम भी जनता और राष्ट्र के प्रति जवाबदेही से जुड़ा है।
विड़ियो और रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि मुख्य सचिव शालिनी रजनीश ने अधिकारियों, कर्मचारी संघों और खादी बोर्ड के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करके इस प्रस्ताव पर चर्चा की। इस बैठक में “सर्वसम्मति” से समर्थन की बात कही गई।
कुछ पर्यवेक्षकों ने यह भी टिप्पणी की कि “कपड़े में बदलाव, सोच में बदलाव की भी एक कोशिश” हो सकती है – ठीक वैसे ही जैसे विधान सौध की दीवार पर खुदा वाक्य “Government work is God’s work” सरकारी काम को सेवा के रूप में याद दिलाता है।
कर्नाटक में 176 खादी संस्थाएं: इकोनॉमी का व्यावहारिक पक्ष
सिर्फ़ भावनात्मक और प्रतीकात्मक बात नहीं, सर्कुलर में एक प्रैक्टिकल जानकारी भी दी गई है।
- कर्नाटक के खादी विभाग की वेबसाइट पर 176 खादी संगठनों और संस्थाओं की लिस्ट उपलब्ध है – उनके नाम, पते और प्रॉडक्ट्स की डीटेल्स के साथ।
- ये यूनिट्स अलग–अलग जिलों में फैली हैं और इनमें सूत कातने वालों से लेकर तैयार परिधान बनाने वाले बुनकर तक शामिल हैं।
राज्य सरकार के मुताबिक, इन संस्थाओं से खादी खरीदने पर:
- कर्मचारियों को सरकार के खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की दुकानों में पहले से चल रही स्कीमों के ऊपर अतिरिक्त डिस्काउंट भी मिलेगा, ताकि खादी को अपनाना जेब पर भारी न पड़े।
इससे एक ओर तो सरकारी कर्मचारियों को प्रोत्साहन मिलेगा, दूसरी ओर इन 176 संस्थाओं की बिक्री में स्थायी मांग बनेगी – खासकर अगर बड़े पैमाने पर सरकारी तंत्र महीने–दर–महीने खादी को अपनाता है।
क्या सच में “स्वैच्छिक” है या ड्रेस कोड जैसा दबाव बनेगा?
यह सवाल सोशल और न्यूज़ मीडिया में काफी चर्चा में है।
आधिकारिक सर्कुलर कहता है कि खादी पहनना “voluntary” यानी स्वैच्छिक है।
लेकिन:
- कुछ टीवी रिपोर्ट्स और चैनल्स ने इसे “कड़ाई से लागू होने वाला नियम” की तरह दिखाया है, जहां पहले शनिवार को “खादी अनिवार्य” जैसा नैरेटिव बना।
- सरकारी तंत्र में अक्सर “स्वैच्छिक” शब्द का मतलब होता है – ऊपर से सख्त निर्देश तो नहीं, लेकिन अगर आप नहीं मानेंगे तो आपको “अलग” या “कम सहयोगी” नज़र से देखा जा सकता है।
इसलिए ग्राउंड लेवल पर यह देखना होगा कि:
- क्या कर्मचारियों को नॉन–खादी पहनने पर कोई लिखित/मौखिक दबाव दिया जाता है
- या इसे सचमुच एक प्रेरक–प्रोत्साहन आधारित पहल के रूप में ही रहने दिया जाता है
खुद कर्नाटक स्टेट गवर्नमेंट एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन ने इस फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि वे सरकार की इस पहल का समर्थन करेंगे, खासकर जब खादी बोर्ड की दुकानों पर अतिरिक्त छूट दी जाएगी।
ग्रामीण बुनकरों के लिए संभावित फायदे
कर्नाटक में खादी और ग्रामोद्योग सेक्टर लंबे समय से रॉ–मटीरियल कॉस्ट, सीमित मार्केट और फैशन ट्रेंड्स की चुनौतियों से जूझता रहा है।
सरकार के बयान के मुताबिक:
- खादी उत्पादन हज़ारों ग्रामीण कतिनों और बुनकरों को सीधे–अप्रत्यक्ष रोज़गार देता है।
- आधुनिक डिज़ाइन और फैशन–फ्रेंडली कट्स के साथ अब युवा पीढ़ी को भी टारगेट किया जा रहा है।
अगर हर महीने के पहले शनिवार को लाखों सरकारी कर्मचारी – मान लीजिए, यहां तक कि आधे भी – खादी पहनने के लिए साल में 10–12 सेट ख़रीदना शुरू करते हैं, तो:
- वार्षिक खादी बिक्री में स्थायी बढ़ोतरी हो सकती है
- गांव–आधारित स्पिनिंग और वीविंग यूनिट्स को रेगुलर ऑर्डर मिल सकते हैं
- खादी बोर्ड की दुकानों में फुटफॉल और रेवेन्यू दोनों बढ़ेंगे
इसके साथ अगर सरकार खादी को और भी पॉपुलर बनाना चाहती है, तो:
- डिज़ाइनर्स और फैशन इंस्टीट्यूट्स के साथ पार्टनरशिप
- ऑफिस–फ्रेंडली, मॉडर्न कट्स वाले शर्ट, कुर्ते, साड़ियाँ और जैकेट
- ई–कॉमर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर राज्य खादी ब्रांड की बेहतर मौजूदगी
जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं, ताकि खादी सिर्फ एक “औपचारिक” ड्रेसकोड न बनकर सचमुच लाइफस्टाइल चॉइस बने।
इतिहास और प्रतीक: क्यों खादी आज भी भावनात्मक मुद्दा है?
कर्नाटक के इस फैसले को भारत के व्यापक राजनीतिक–सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखना ज़रूरी है।
खादी का इतिहास:
- गांधी जी ने खादी को सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक आर्थिक ढांचे के खिलाफ़ एक शांतिपूर्ण हथियार बनाया था – “विदेशी कपड़ा छोड़ो, स्वदेशी अपनाओ।”
- आज़ादी के बाद दशकों तक नेताओं की पारंपरिक ड्रेस – धोती, कुर्ता, साड़ी – खादी में ही दिखाई देती थी।
- विधान सौध और अन्य विधानसभाओं की पुरानी तस्वीरों में भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक खादी में दिखते हैं – यह बात खुद नए रिपोर्ट्स में याद दिलाई गई है।
समय के साथ–साथ खादी की पकड़ शहरों के मिडिल–क्लास में कमजोर पड़ी, और पावर–ड्रेसिंग में वेस्टर्न फॉर्मल वियर या सिंथेटिक फैब्रिक ने जगह ले ली।
ऐसे में कर्नाटक सरकार का यह आदेश/अपील एक तरह से उस दौर की याद और वापसी की कोशिश भी है – कि कम से कम महीने में एक दिन, सरकारी कर्मचारी यह महसूस करें कि वे एक ऐसी परंपरा का हिस्सा हैं जो सिर्फ़ तन ढकने के लिए नहीं, बल्कि एक विचार और संघर्ष की याद के लिए भी है।
सियासी पिच: क्या यह राजनीति भी है?
किसी भी नीति की तरह इसमें भी राजनीतिक एंगल देखे जा रहे हैं।
- अभी केंद्र और कई राज्यों में “स्वदेशी”, “मेक इन इंडिया” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे नैरेटिव जोर पकड़ रहे हैं।
- कांग्रेस–शासित कर्नाटक सरकार के इस कदम को कुछ लोग “गांधी–नेहरू परंपरा और खादी–आधारित राष्ट्रवाद” की एक तरह से पुनर्स्थापना के रूप में देख रहे हैं, जो वैचारिक स्तर पर आज के राजनीतिक माहौल को भी जवाब देता है।
फिर भी, अगर इसे वास्तविक लाभ की दृष्टि से देखा जाए, तो:
- अगर यह पहल ईमानदारी से, बिना अति–दबाव के, और सचमुच खादी–उद्योग और बुनकरों तक लाभ पहुंचाने की नीयत से लागू होती है,
- तो यह प्रतीक भर नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक–सामाजिक असर डालने वाली नीति बन सकती है।
कर्मचारियों और पब्लिक के लिए प्रैक्टिकल सवाल–जवाब
कई सरकारी कर्मचारी और आम लोग इस पहल से जुड़े कुछ व्यावहारिक सवाल पूछ रहे हैं, जैसे:
- क्या खादी महंगी नहीं होगी?
सरकार का कहना है कि खादी बोर्ड की दुकानों पर पहले से चल रहे डिस्काउंट्स के ऊपर अतिरिक्त रियायत देने की योजना है, ताकि सरकारी कर्मचारियों के लिए यह जेब–फ्रेंडली रहे। - क्या सिर्फ़ सफेद खादी या कलरफुल भी चलेगी?
सर्कुलर में किसी खास रंग का ज़िक्र नहीं है, केवल “खादी परिधान” लिखित है। इसका मतलब है – कुर्ता, शर्ट, साड़ी, सलवार, जैकेट – जो भी खादी फैब्रिक से बना हो, स्वीकार्य होगा। - क्या एक दिन से सच में फर्क पड़ेगा?
एक दिन से पूरा बदलाव नहीं आता, लेकिन अगर यही पहल आगे चलकर बढ़ती है – जैसे महीने में दो दिन, या अन्य दिनों में भी लोग अपनी मर्ज़ी से खादी चुनने लगते हैं – तो यह लंबी अवधि में महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्या यह मॉडल दूसरे राज्यों तक जा सकता है?
कर्नाटक अकेला राज्य नहीं है जिसने खादी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर कदम उठाए हैं, लेकिन इस तरह “हर महीने के पहले शनिवार” जैसा स्पष्ट ड्रेस–डे तय करने वाला यह ताज़ा, हाई–प्रोफाइल उदाहरण ज़रूर है।
अगर यह पहल:
- कर्मचारियों में अच्छी स्वीकृति पाती है
- ग्रामीण बुनकरों की आमदनी और बिक्री में दिखाई देने वाला इजाफ़ा लाती है
- और पब्लिक इमेज में पॉज़िटिव असर बनाती है
तो संभव है कि दूसरे राज्य भी कुछ इसी तरह के मॉडल अपनाने पर विचार करें – चाहे वह खादी हो, हैंडलूम हो या राज्य की किसी खास पारंपरिक वस्त्र संस्कृति का प्रमोशन।
अंत में, यह कह सकते हैं कि कर्नाटक सरकार का यह कदम कपड़े से ज़्यादा सोच बदलने की छोटी लेकिन अहम कोशिश है – कि सरकारी कर्मचारी खुद भी उस “स्वदेशी अर्थव्यवस्था” के ग्राहक बनें, जिसको नीतिगत भाषणों में अक्सर बढ़ावा देने की बात की जाती है।
अगर यह पहल सचमुच स्वैच्छिक, संवेदनशील और इकोनॉमिकली सेंसिबल तरीके से लागू होती है, तो खादी पहनने का यह एक दिन, गांव के बुनकर के पूरे महीने की रोटी पर थोड़ा–बहुत फर्क ज़रूर ला सकता है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
प्रश्न 1: कर्नाटक सरकार ने खादी पहनने को लेकर क्या नया निर्देश दिया है?
उत्तर: राज्य सरकार ने 29 जनवरी के सर्कुलर में सभी सरकारी विभागों, सहायतित संस्थाओं, निगमों, बोर्डों, स्वायत्त निकायों और विश्वविद्यालयों के अधिकारियों–कर्मचारियों से अपील की है कि वे हर महीने के पहले शनिवार को ड्यूटी के दौरान खादी के कपड़े पहनें और स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस सहित सभी आधिकारिक कार्यक्रमों में भी खादी को प्राथमिकता दें।
प्रश्न 2: क्या खादी पहनना अनिवार्य है या स्वैच्छिक?
उत्तर: सर्कुलर में साफ तौर पर “voluntarily” शब्द का प्रयोग किया गया है, यानी इसे स्वैच्छिक पहल के रूप में पेश किया गया है। सरकार का कहना है कि यह प्रेरक कदम है, हालांकि कुछ टीवी रिपोर्ट्स और बहसों में इसे “कड़ाई से लागू होने वाला ड्रेस कोड” जैसा भी दिखाया गया, जिससे ग्राउंड पर इसका व्यवहारिक रूप कैसा होगा, यह देखने की बात है।
प्रश्न 3: इस फैसले का उद्देश्य क्या बताया गया है?
उत्तर: सरकार का कहना है कि खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की गरिमा, आज़ादी की लड़ाई और गांधीवादी मूल्यों का प्रतीक है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और हज़ारों कतिनों–बुनकरों को रोज़गार देता है। इसलिए 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सार्वजनिक सेवा को स्वतंत्रता संग्राम की भावना से दोबारा जोड़ने, स्वदेशी उत्पादों के प्रति सम्मान बढ़ाने, राष्ट्रीय भावना, एकता, आत्मसम्मान और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना जगाने के लिए यह पहल की गई है।
प्रश्न 4: खादी कहाँ से खरीदने की सलाह दी गई है और इससे बुनकरों को क्या लाभ होगा?
उत्तर: सर्कुलर में राज्य के खादी विभाग की वेबसाइट का ज़िक्र है, जिस पर कर्नाटक में काम कर रही 176 खादी संस्थाओं के नाम, पते और उत्पादों की जानकारी उपलब्ध है। कर्मचारियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे इन्हीं सरकारी–समर्थित केंद्रों से खादी खरीदें, जहाँ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की दुकानों पर मौजूदा ऑफर्स के ऊपर अतिरिक्त छूट देने की बात भी बैठकों में सामने आई है। इससे इन संस्थाओं की बिक्री और ग्रामीण बुनकरों की आमदनी में स्थायी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है।
प्रश्न 5: इस पहल को कब और कैसे औपचारिक रूप से शुरू किया जाएगा?
उत्तर: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खादी–प्रमोशन की यह व्यापक पहल सरकारी कर्मचारियों के दिवस (Government Employees’ Day) पर अप्रैल 2026 के आसपास औपचारिक रूप से लॉन्च की जाएगी, जबकि सर्कुलर 29 जनवरी 2026 को जारी हो चुका है और पहले शनिवार वाली गाइडलाइन तुरंत प्रभाव से लागू मानी जा रही है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में कर्मचारी संघों ने इस निर्णय का समर्थन व्यक्त किया है।
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