Lal Bahadur Shastri की जिंदगी सादगी, त्याग और देशभक्ति की मिसाल है। चरखा दहेज वाली शादी से ताशकंद की रहस्यमयी मौत तक, जानें जय जवान जय किसान नारे के पीछे की पूरी कहानी। उनकी विरासत आज भी प्रेरणा देती है।
Lal Bahadur Shastri: सादगी के सिपाही, देशभक्ति के प्रतीक
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए आज भी दिल भर आता है। उनकी जिंदगी एक आम आदमी की तरह शुरू हुई, लेकिन संघर्ष और त्याग से भरी रही। 11 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर हम उनकी कहानी को फिर से जीवंत करते हैं – वो चरखा जो उन्होंने दहेज में लिया, वो नारा जो आज भी गूंजता है, और ताशकंद वाली वो रात जो आज तक रहस्य बनी हुई है।
शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। उनका असली नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था, लेकिन जाति के भेदभाव से नफरत करने वाले उन्होंने बचपन में ही सरनेम छोड़ दिया। महज 12 साल की उम्र में वे घर छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिली, जो उनकी विद्वता का प्रतीक बनी। आजादी की लड़ाई में कई बार जेल गए, लेकिन हार न मानी।
बचपन और शिक्षा: त्याग की पहली सीढ़ी
शास्त्री जी का परिवार साधारण था। पिता की मौत के बाद मां ने पाला। पढ़ाई के साथ-साथ वे गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुए। 1921 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया, पहली गिरफ्तारी हुई। 1930 के नमक सत्याग्रह में घर-घर जाकर लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ जगाया।
उनकी शिक्षा औपचारिक न थी, लेकिन जीवन के हर सबक ने उन्हें बड़ा बनाया। काशी विद्यापीठ से ग्रेजुएट हुए, जहां उन्हें शास्त्री कहा गया। ये नाम ही उनकी पहचान बन गया। स्वतंत्रता से पहले वे इलाहाबाद कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने।
शादी का अनोखा किस्सा: चरखा ही दहेज
शास्त्री जी की शादी ललिता देवी से 1927 में हुई। दहेज प्रथा के खिलाफ गांधीवादी वे ससुराल में कुछ न लेना चाहते थे। लेकिन जोर देने पर सिर्फ खादी का कपड़ा और एक चरखा लिया। ये चरखा स्वदेशी का प्रतीक था, आत्मनिर्भरता का संदेश।
ये कहानी आज भी लड़कियों की शादी में दहेज के खिलाफ आवाज बुलंद करती है। शास्त्री जी ने कहा था, “सादगी ही असली धन है।” उनकी पत्नी ललिता ने भी त्यागपूर्ण जीवन जिया, छह बच्चों की मां बनीं लेकिन कभी शिकायत न की।
राजनीतिक यात्रा: नेहरू कैबिनेट में कीर्तिमान
आजादी के बाद शास्त्री जी उत्तर प्रदेश में पंडित गोविंद वल्लभ पंत के संसदीय सचिव बने। फिर पुलिस और ट्रांसपोर्ट मंत्री। केंद्र में नेहरू कैबिनेट में रेल मंत्री बने। 1956 में आर्यालुर ट्रेन हादसे में 140 से ज्यादा मौतें हुईं, तो उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी ले इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने कहा, “ऐसा ईमानदार साथी दुर्लभ है।”
फिर ट्रांसपोर्ट, वाणिज्य, गृह मंत्री बने। 1961 में गृह मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार रोकने के लिए संथानम कमेटी बनाई। नेहरू की मौत 1964 में हुई, तो शास्त्री जी 9 जून को प्रधानमंत्री बने। छोटे कद लेकिन बड़ा दिल वाला ये नेता देश का भरोसा बना।
प्रधानमंत्री काल: संकटों का सामना
शास्त्री जी का कार्यकाल छोटा लेकिन स्वर्णिम रहा। 1965 में पाकिस्तान ने हमला किया। उन्होंने देश को एकजुट किया। “जय जवान जय किसान” नारा दिया, जो सैनिक और किसान दोनों को सम्मानित करता। ये नारा खाद्यान्न संकट और जंग के समय निकला।
हरित क्रांति की नींव रखी, एमएस स्वामीनाथन जैसे वैज्ञानिकों को बढ़ावा दिया। भारत का अनाज उत्पादन बढ़ा – 1965-66 में 72 मिलियन टन से 1970 तक 108 मिलियन टन। श्वेत क्रांति शुरू की, राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड 1965 में बना।
आर्थिक तंगी में भी देश को संभाला। सोने की खरीद विदेशों से कराई। ताशकंद में सोवियत मदद से शांति समझौता किया।
ताशकंद की रहस्यमयी मौत: साजिश या हार्ट अटैक?
10 जनवरी 1966 को ताशकंद में आयूब खान के साथ शांति समझौता साइन किया। रात 1:25 बजे खांसी हुई, डॉक्टर आरएन चुग को बुलाया। लेकिन 1:32 पर मौत। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक। लेकिन भारत लौटे शव पर नीले निशान, पेट पर कट के निशान, खून भरे कपड़े। पोस्टमॉर्टम न हुआ।
परिवार ने जहर का शक जताया। बेटे अनिल शास्त्री ने कहा, “शरीर नीला था, जहर ही लगता।” सीआईए, केजीबी साजिश की अफवाहें। सोवियत एजेंट्स ने फाउल प्ले का शक किया। आज तक जांच न हुई, रहस्य बरकरार।
विरासत और पुरस्कार: भारत रत्न से सम्मानित
शास्त्री जी को मरणोपरांत 1966 में भारत रत्न मिला, पहला ऐसा मामला। उनका नारा आज आत्मनिर्भर भारत का मंत्र। गांधीवादी सादगी, नेहरू की तुलना में अलग नेता। आजकल पीएम-किसान जैसी योजनाएं उसी नारे से प्रेरित।
उनके कोट्स आज भी प्रासंगिक:
- “जब तक हम अपने पैरों पर न खड़े होंगे, तब तक स्वतंत्रता का महत्व न समझेंगे।”
- “सादगी सफलता की कुंजी है।”
- “कठिन परिश्रम ही भाग्य से बड़ा होता है।”
शास्त्री जी से प्रेरणा: आज के लिए सबक
आज के लालच भरे दौर में शास्त्री जी सादगी सिखाते हैं। दहेज न लेना, इस्तीफा देना, नारा देकर देश जोड़ना – ये सब मानवीय मूल्य। युवा वर्ग उनसे सीखे कि छोटा कद बड़ा काम कर सकता है। उनकी जयंती 2 अक्टूबर को मनाई जाती, पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि।
उनकी कहानी स्कूलों में पढ़ाई जाए, फिल्म बने। चरखा आज भी खादी का प्रतीक। जय जवान जय किसान से किसान आंदोलन तक कनेक्शन।
लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े रोचक तथ्य
- 9 बार जेल गए, कुल 9 साल जेल काटी।
- रेल मंत्री रहते टिकट चेकर बने, सुधार देखने।
- नेहरू ने कहा, “शास्त्री जैसा निष्ठावान दुर्लभ।”
- ताशकंद होटल में फोन न था, मदद देरी से मिली।
- शव पर इम्बाल्मिंग से नीला रंग, लेकिन कट निशान संदेहास्पद।
5 FAQs
- लाल बहादुर शास्त्री ने दहेज में चरखा क्यों लिया?
शास्त्री जी दहेज के खिलाफ थे, लेकिन ससुर के जोर पर सिर्फ चरखा और खादी लिया, जो स्वदेशी का प्रतीक था। - जय जवान जय किसान नारा कब दिया गया?
1965 भारत-पाक युद्ध के समय, सैनिकों और किसानों को प्रेरित करने के लिए। - शास्त्री जी की मौत कैसे हुई?
ताशकंद में हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन जहर की अफवाहें हैं, पोस्टमॉर्टम न हुआ। - शास्त्री जी ने किस हादसे पर इस्तीफा दिया?
1956 आर्यालुर ट्रेन दुर्घटना में 140 मौतें, रेल मंत्री पद छोड़ा। - शास्त्री जी को कौन सा पुरस्कार मिला?
मरणोपरांत भारत रत्न, पहला ऐसा प्राप्तकर्ता।
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