सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अब देशभर के सभी स्कूलों में अलग टॉयलेट, पानी, मुफ्त बायोडिग्रेडेबल पैड, मेंस्ट्रुअल हाइजीन कॉर्नर और सेफ डिस्पोज़ल ज़रूरी होंगे। निर्णय, असर और पूरी डिटेल जानिए।
क्या आपकी बेटी के स्कूल में पीरियड्स के लिए सुविधा है? ना हो तो अब कानून क्या कहता है
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: “मासिक धर्म स्वास्थ्य भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है”
भारत में लड़कियों की पढ़ाई, इज़्ज़त और सेहत पर सबसे ज़्यादा असर डालने वाले मुद्दों में से एक है – पीरियड्स, यानी मासिक धर्म। लेकिन दुख की बात यह है कि जिस चीज़ से आधी आबादी हर महीने गुज़रती है, उसके बारे में घरों में, स्कूलों में और समाज में आज भी ज़्यादातर चुप्पी छाई रहती है। कई लड़कियां सिर्फ़ इस वजह से स्कूल छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके स्कूल में साफ़ टॉयलेट, पानी, पैड और प्राइवेसी ही नहीं होती।
ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया है जिसने पहली बार बहुत साफ़ शब्दों में कहा है कि “मासिक धर्म स्वास्थ्य, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।” यानी, पीरियड्स के वक्त साफ–सफाई, पैड और टॉयलेट जैसी सुविधाएं देना कोई “दया” या “फेवर” नहीं, बल्कि हक है – और ये हक सीधे–सीधे भारतीय संविधान से जुड़ा हुआ है।
इस फैसले में अदालत ने यह भी माना कि जब लड़कियों को स्कूलों में जेंडर–सेपरेटेड टॉयलेट, साफ पानी, सैनिटरी पैड और प्राइवेसी नहीं मिलती, तो यह न सिर्फ़ उनकी गरिमा और प्राइवेसी का उल्लंघन है, बल्कि समानता और शिक्षा के अधिकार को भी चोट पहुँचाता है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा, स्कूलों के लिए अब क्या–क्या ज़रूरी हो गया है, सरकार और राज्यों की क्या ज़िम्मेदारी है और आम लोगों और पैरेंट्स के लिए इस फैसले का क्या मतलब है।
पीरियड्स और संविधान: कोर्ट ने कौन-कौन से अधिकारों से जोड़ा?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच – जस्टिस जे.बी. पारडिवाला और जस्टिस आर. महादेवन – ने साफ तौर पर कहा कि पीरियड्स से जुड़ी सुविधाओं की कमी, कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। इनमें मुख्य रूप से ये तीन अनुच्छेद शामिल हैं:
- अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
अदालत ने कहा कि “जीवन का अधिकार” सिर्फ़ सांस लेने या ज़िंदा रहने का हक नहीं है, बल्कि गरिमा, इज़्ज़त, सम्मान और बिना बेवजह तकलीफ के जीने का अधिकार भी है। अगर एक लड़की को स्कूल में पीरियड्स के समय साफ–सुथरी जगह, प्राइवेसी, पैड और पानी नहीं मिलता, तो यह उसकी गरिमा और स्वास्थ्य पर सीधा हमला है। - अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
जब लड़कियां सिर्फ़ पीरियड्स की वजह से स्कूल मिस करती हैं, परीक्षा नहीं दे पातीं, या धीरे–धीरे पढ़ाई छोड़ देती हैं, तो वे बराबरी के मौक़ों से दूर हो जाती हैं। लड़कों और लड़कियों के बीच स्कूल अटेंडेंस और रिज़ल्ट में जो अंतर बनता है, उसमें ये एक बड़ा कारण है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह स्ट्रक्चरल असमानता है, जिसे दूर करना राज्य की ज़िम्मेदारी है। - अनुच्छेद 21A – 6 से 14 साल तक के बच्चों का शिक्षा का अधिकार
फ्री और कम्पल्सरी एजुकेशन का मतलब सिर्फ़ किताबें, फीस और टीचर नहीं है। अगर कोई एक्स्ट्रा खर्च या कमी किसी बच्चे की पढ़ाई में रुकावट बन रही है, तो उसे भी शिक्षा के अधिकार के अंदर ही माना जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पैड, टॉयलेट और हाइजीन की कमी लड़की को स्कूल से दूर करती है, तो यह शिक्षा के अधिकार के खिलाफ़ है।
यानी, अब कानूनी नजरिए से देखें तो पीरियड्स के समय साफ टॉयलेट, पानी और पैड देना –
सिर्फ़ “अच्छा काम” या “वेलफेयर” नहीं, बल्कि
सीधा–सीधा मौलिक अधिकारों से जुड़ा अनिवार्य कर्तव्य है।
जस्टिस पारडिवाला की भावनात्मक टिप्पणी: “ये फैसला सिर्फ़ क़ानून की किताबों के लिए नहीं है”
जस्टिस पारडिवाला ने जजमेंट के अंत में जो बातें कहीं, वे पूरे समाज के लिए एक तरह का मैसेज हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला सिर्फ़ वकीलों, जजों या कानून के छात्रों के लिए नहीं है, बल्कि –
- उन क्लासरूम्स के लिए है, जहां लड़कियां मदद मांगने में हिचकिचाती हैं
- उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधन नहीं हैं
- उन माता–पिता के लिए है, जो चुप्पी की वजह से अपनी बेटियों पर पड़ने वाले असर को समझ ही नहीं पाते
उन्होंने यह भी कहा कि जो भी लड़की पीरियड्स की वजह से स्कूल से दूर हुई है, या उसे बोझ समझा गया है, उसे यह मैसेज जाना चाहिए कि गलती उसके शरीर की नहीं, सिस्टम की थी – और अब सिस्टम को बदलने की बारी है।
ये लाइनें सिर्फ़ कानून नहीं, संवेदनशीलता की भी मिसाल हैं। कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि समाज की प्रगति को अब इस पैमाने से भी मापा जाएगा कि हम अपनी सबसे नाज़ुक, सबसे वल्नरेबल आबादी – यानी किशोरियों – की कितनी रक्षा कर पा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्कूलों के लिए क्या–क्या ज़रूरी किया गया?
ये फैसला सिर्फ़ थ्योरी या सलाह नहीं है, बल्कि इसमें स्कूलों और सरकारों के लिए बहुत स्पष्ट आदेश दिए गए हैं। इनका असर देश के हर कोने में, हर तरह के स्कूल पर पड़ेगा – चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, शहर में हो या गांव में।
- सभी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट अनिवार्य
कोर्ट ने आदेश दिया कि भारत के हर स्कूल में –
- अलग जेंडर–सेपरेटेड टॉयलेट होने चाहिए
- ये टॉयलेट फंक्शनल हों, यानी सिर्फ़ नाम के लिए बने न हों
- साफ पानी की कनेक्टिविटी हर समय उपलब्ध हो
इसका मतलब यह है कि अब उन स्कूलों को भी अपनी व्यवस्था बदलनी पड़ेगी, जहां आज तक लड़कियां और लड़के एक ही टॉयलेट यूज़ कर रहे थे या लड़कियों के लिए अलग साफ जगह ही नहीं थी।
- प्राइवेसी और डिसएबिलिटी–फ्रेंडली डिज़ाइन
टॉयलेट सिर्फ़ बनाना ही काफी नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि –
- टॉयलेट में पूरी प्राइवेसी हो, जैसे ठीक से बंद होने वाला दरवाज़ा, अंदर से लॉक, वेंटिलेशन और गंदगी से मुक्त माहौल
- दिव्यांग बच्चियों (जैसे व्हीलचेयर यूज़ करने वाली या अन्य शारीरिक चुनौतियों वाली) के लिए भी इन टॉयलेट्स का इस्तेमाल आसान होना चाहिए
इसका मतलब स्कूल बिल्डिंग डिज़ाइन में इनका ध्यान रखना अब कानूनी ज़िम्मेदारी बन चुका है।
- हर समय पानी और साबुन की व्यवस्था
पीरियड्स के दौरान सिर्फ़ पैड ही नहीं, हाथ और शरीर की सफाई भी उतनी ही ज़रूरी है। कोर्ट ने आदेश दिया कि –
- हर टॉयलेट में हमेशा पानी उपलब्ध रहे
- साबुन और हाथ धोने की सुविधाएं रहें
- वॉशिंग फैसिलिटी – जैसे वॉश बेसिन या टेप – ठीक हालत में हों
- मुफ्त सैनिटरी पैड – वो भी स्टैंडर्ड के अनुसार
सबसे बड़ा और सीधे असर वाला पॉइंट यह है कि अब स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना होगा।
- कोर्ट ने कहा कि ऑक्सी–बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन, जो ASDM–694 स्टैंडर्ड के अनुसार बने हों, मुफ्त दिए जाएं
- ये पैड लड़कियों को आसानी से मिल सकें, इसके लिए स्कूलों में या तो टॉयलेट के अंदर वेंडिंग मशीन लगाई जाएं या किसी साफ–साफ दिखने वाली, आसानी से पहुंच वाली जगह पर इन्हें रखा जाए
यह स्टैंडर्ड इसलिए ज़रूरी है ताकि –
- पैड की क्वॉलिटी ठीक हो
- पर्यावरण पर बहुत ज़्यादा बुरा असर न पड़े
- लड़कियों को लोकल मार्केट के सस्ते और खराब क्वालिटी वाले विकल्पों पर निर्भर न रहना पड़े
- मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट कॉर्नर
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि हर स्कूल में “मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट कॉर्नर” बनाया जाए। ये एक तरह का छोटा–सा सपोर्ट स्पेस होगा जिसमें –
- अतिरिक्त इनरवियर (अंडरगारमेंट्स)
- एक्स्ट्रा यूनिफॉर्म
- डिस्पोज़ेबल पैड
- और दूसरे ज़रूरी सामान
इमरजेंसी के लिए रखे जाएं।
सोचिए, कितनी लड़कियां पहली बार पीरियड्स आने पर या अचानक स्कूल में पीरियड्स शुरू होने पर शर्म, डर और घबराहट की वजह से घर भाग जाती हैं या पूरे दिन गीले कपड़ों, दाग़ या बदबू के डर के साथ बैठी रहती हैं। यह कॉर्नर उन लड़कियों के लिए एक ‘सेफ ज़ोन’ की तरह होगा, जहां वे टीचर या स्टाफ की मदद से तुरंत ज़रूरी चीज़ें पा सकेंगी।
- सेफ डिस्पोज़ल सिस्टम – कूड़ेदान नहीं, सही व्यवस्था
पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल किए गए पैड को कैसे फेंका जाए, ये भी उतना ही बड़ा मुद्दा है। अगर इन्हें खुले में या सामान्य कूड़े के साथ डाल दिया जाए –
- बदबू और गंदगी फैलती है
- बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है
- स्कूली माहौल असुरक्षित और अस्वास्थ्यकर हो जाता है
कोर्ट ने स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि –
- सैनिटरी वेस्ट के लिए सेफ डिस्पोज़ल सिस्टम (जैसे इन्सिनरेटर, क्लोज़्ड डस्टबिन, नियमित कलेक्शन) जरूरी है
- इस्तेमाल किए गए पैड को ऐसे सिस्टम के जरिए ही निपटाया जाए कि पर्यावरण और हेल्थ पर कम से कम असर पड़े
“फ्री एजुकेशन” का मतलब क्या सिर्फ़ फीस नहीं? कोर्ट ने सीमा बढ़ा दी
सुप्रीम कोर्ट ने एक और बहुत महत्वपूर्ण बात साफ की –
अनुच्छेद 21A और राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत जो “फ्री एजुकेशन” है, उसका मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि बच्चा बिना फीस के स्कूल जा सके।
- अगर किसी खर्च की वजह से बच्चा स्कूल नहीं जा पाता या पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता, तो उसे भी फ्री एजुकेशन के दायरे में माना जाएगा
- यानी, अगर लड़कियों के लिए पैड, टॉयलेट और हाइजीन फैसिलिटी की कमी उन्हें स्कूल से दूर कर रही है, तो इन सुविधाओं की लागत भी उसी “फ्री एजुकेशन” कॉन्सेप्ट का हिस्सा है
इसलिए कोर्ट ने साफ कहा कि –
- स्कूलों को अगर ये बेसिक सुविधाएं नहीं होंगी, तो उन्हें डे–रिकग्निशन (मान्यता रद्द) तक का सामना करना पड़ सकता है
- सरकारी स्कूलों में कमी होगी, तो उसकी जवाबदेही सीधे राज्य पर आएगी
केस की पृष्ठभूमि: 2022 की याचिका से 2025–26 के बड़े फैसले तक
यह पूरा मामला एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन से शुरू हुआ, जिसमें 2022 में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई थी कि –
- देशभर की स्कूली लड़कियों को फ्री सैनिटरी नैपकिन दिए जाएं
- स्कूलों में पर्याप्त, साफ–सुथरे टॉयलेट और पानी की व्यवस्था हो
नवंबर 2022 में तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की बेंच ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया।
अप्रैल 2023 में कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि –
- “स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए एक राष्ट्रीय मेंस्ट्रुअल हाइजीन पॉलिसी” तैयार की जाए
नवंबर 2024 में वर्तमान बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि –
- पॉलिसी बनी तो है, लेकिन उसका इंप्लीमेंटेशन प्लान क्या है
- फ्री पैड पहले से दिए जा रहे हैं या नहीं
- क्या लड़कियों को खुद मांगकर लेना पड़ता है या उन्हें सहज तरीके से उपलब्ध कराए जाते हैं
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि –
- यूनियन मिनिस्ट्री राज्यों और UTs के साथ मिलकर एक्शन प्लान बनाएगी
- स्कूलों और आंगनवाड़ियों के ज़रिए पैड बांटे जाएंगे
- हेल्थ, जल शक्ति और एजुकेशन मंत्रालय – तीनों इस दिशा में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं
दिसंबर 2024 में कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा और जनवरी 2026 में यह ऐतिहासिक जजमेंट सुनाया, जिसने साफ तौर पर मासिक धर्म स्वास्थ्य को “जीवन के अधिकार” से जोड़ दिया और पूरी पॉलिसी को ऑर्डर का दर्जा दे दिया।
लड़कियों की हकीकत: क्यों ज़रूरी था यह फैसला?
भारत के कई हिस्सों में आज भी –
- बहुत सी लड़कियां पीरियड्स आने पर 3–5 दिन तक स्कूल ही नहीं जातीं
- कई परिवारों में लड़कियों को कपड़े, राख, घास या दूसरे असुरक्षित विकल्पों से काम चलाना पड़ता है
- टॉयलेट न होने की वजह से वे पूरी छुट्टी तक पेशाब या पीरियड्स का ब्लड रोके रखती हैं, जो बेहद खतरनाक है
- लड़कियों को “गंदी”, “ अशुद्ध” या “पाप” जैसी सोच से जोड़ा जाता है, जिससे उनके आत्मविश्वास पर गहरा असर पड़ता है
जब स्कूल में सुविधाएं नहीं होतीं, तो सबसे आसान फैसला यही माना जाता है कि – “लड़की कुछ दिन स्कूल मत जाओ।” धीरे–धीरे यह “कुछ दिन” हर महीने बढ़ता–बढ़ता, कई बार “हमेशा के लिए स्कूल छोड़ दो” तक पहुंच जाता है।
यानी पीरियड्स सिर्फ़ एक बॉयोलॉजिकल प्रोसेस नहीं, बल्कि –
- एजुकेशन का
- इकोनॉमिक इंडिपेंडेंस का
- आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी का
बड़ा सवाल बन जाता है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा को “multiplier right” कहा – यानी ऐसा अधिकार, जो दूसरे अधिकारों को पाने का रास्ता खोलता है। अगर लड़की पढ़ नहीं पाएगी, तो न उसकी नौकरी की संभावना बराबर होगी, न उसकी आवाज़ घर–समाज में सुनी जाएगी।
सरकारों और स्कूलों की ज़िम्मेदारी: अब बहाने नहीं चलेंगे
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट खुद कह रहा है कि –
- मासिक धर्म स्वास्थ्य जीवन के अधिकार का हिस्सा है
- सुविधाओं की कमी समानता और शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है
तो केंद्र और राज्य सरकारों के पास बहाने की गुंजाइश बहुत कम बचती है।
केंद्र सरकार की भूमिका
- राष्ट्रीय पॉलिसी बनाना
- हेल्थ, एजुकेशन और जल शक्ति मंत्रालय के बीच तालमेल
- राज्यों के साथ फंड और टेक्निकल सपोर्ट शेयर करना
- मॉनिटरिंग और आँकड़ों के ज़रिए प्रोग्रेस को ट्रैक करना
राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका
- हर जिले, ब्लॉक और गांव के स्कूलों की रियल स्थिति का सर्वे
- टॉयलेट, पानी, पैड वेंडिंग मशीन और डिस्पोज़ल सिस्टम के लिए बजट और टाइमलाइन तय करना
- टीचर्स और स्कूल मैनेजमेंट को ट्रेन करना कि वे लड़कियों की मदद कैसे करें
- समुदाय में जागरूकता अभियान चलाना – ताकि पैरेंट्स खुद भी इस मुद्दे को समझें
स्कूलों की भूमिका
- अलग साफ–सुथरे और सुरक्षित गर्ल्स टॉयलेट बनवाना और मेंटेन रखना
- मेंस्ट्रुअल हाइजीन कॉर्नर बनाना और उसमें सामान हमेशा रेगुलर रखना
- लड़कियों को ये बताना कि वे बिना शर्म के वहां मदद लेने जा सकती हैं
- हेल्थ एजुकेशन क्लासेस या सेशन के ज़रिए पीरियड्स के बारे में बेसिक जानकारी देना
माता–पिता और समाज की भूमिका
कानून और कोर्ट अपना काम कर सकते हैं, लेकिन बदलाव पूरा तब होगा जब –
- घर में पीरियड्स पर खुलकर, सहजता से बात हो
- लड़कियों को यह महसूस न कराया जाए कि उनका शरीर बोझ या शर्म की चीज़ है
- लड़कों को भी इस बारे में पढ़ाया और बताया जाए, ताकि वो मज़ाक न उड़ाएं, बल्कि समझ सकें
स्कूल में अगर टॉयलेट और पैड हैं भी, लेकिन क्लासरूम में अगर लड़कियों को पीरियड्स के नाम पर अपमान या मज़ाक झेलना पड़े, तो असली मक़सद अधूरा रह जाएगा।
यह फैसला लड़कों के लिए क्या संदेश देता है?
कई बार पीरियड्स की चर्चा सिर्फ़ लड़कियों तक सीमित कर दी जाती है, लेकिन यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से लड़कों के लिए भी संदेश देता है।
- लड़कों को भी समझना चाहिए कि यह एक नैचुरल बॉयोलॉजिकल प्रोसेस है
- क्लास में अगर किसी लड़की के यूनिफॉर्म पर दाग लग जाए, तो उसका मज़ाक नहीं, उसकी मदद होनी चाहिए
- स्कूल्स अगर वर्कशॉप या अवेयरनेस सेशन रखें, तो लड़कों को भी उसमें शामिल किया जाना चाहिए
जब लड़के इस मुद्दे को समझेंगे, तभी स्कूल–सोसायटी का माहौल वास्तव में सुरक्षित और सम्मानजनक बन पाएगा।
आगे की चुनौतियां: फैसले से ज़मीन तक का सफर आसान नहीं
इतना सब कुछ लिखने और कहने के बाद भी सच ये है कि –
- भारत में हजारों स्कूल ऐसे हैं जहाँ अभी तक बेसिक टॉयलेट ही नहीं हैं
- कई राज्यों में बजट, मॉनिटरिंग और करप्शन की वजह से स्कीम्स कागज़ पर तो हैं, ज़मीन पर नहीं
- टीचर्स खुद कई बार इतने असहज रहते हैं कि वे इस पर खुलकर बात ही नहीं करना चाहते
इसलिए इस फैसले के बाद असली चुनौतियाँ होंगी –
- क्या राज्यों के बजट में खास एलोकेशन दिखेगा?
- क्या दो–तीन साल बाद ग्राउंड रिपोर्ट्स में वाकई बदलाव दिखने लगेगा?
- क्या मीडिया, एक्टिविस्ट्स और पेरेंट्स मिलकर इसकी निगरानी करेंगे?
फिर भी, यह मानना पड़ेगा कि सुप्रीम कोर्ट ने “नैरेटिव” बदलने का बड़ा काम कर दिया है। जो बात अब तक ‘सोशल वर्क’, ‘NGO एक्टिविटी’ या ‘कॉर्पोरेट CSR’ मानी जाती थी, उसे अब सीधे–सीधे “संवैधानिक अधिकार” का दर्जा मिल गया है।
अब किसी भी लड़की के अभिभावक के पास यह हक है कि अगर स्कूल में सुविधाएँ नहीं मिले, तो वे न सिर्फ़ स्कूल से सवाल करें, बल्कि ज़रूरत हो तो कानूनी कार्रवाई भी कर सकें।
निष्कर्ष: क्या यह फैसला सच में गेमचेंजर साबित हो सकता है?
अगर इस फैसले को सही तरह से लागू किया जाए तो यह भारत की करोड़ों लड़कियों की ज़िंदगी बदल सकता है।
- कम स्कूल ड्रॉप–आउट
- बेहतर हेल्थ
- ज्यादा आत्मविश्वास
- और लड़के–लड़कियों के बीच स्कूल अटेंडेंस और रिज़ल्ट के गैप में कमी
यह फैसला हमें यह भी याद दिलाता है कि प्रगति सिर्फ़ मेट्रो, पुल, हाईवे या GDP से नहीं मापी जाती, बल्कि इससे भी कि हमारी सबसे वल्नरेबल बच्चियां – जो पीरियड्स, गरीबी, समाज की चुप्पी और शर्म के बोझ को एक साथ ढो रही हैं – उन्हें हम कितना सम्मान और सुविधा दे पा रहे हैं।
अब बारी है सरकारों, स्कूलों, शिक्षकों, माता–पिता और पूरे समाज की, कि वे इस “क़ानूनी शब्दों” को “जमीनी हकीकत” में कैसे बदलते हैं। अगर यह काम ईमानदारी से हुआ, तो आने वाली पीढ़ी की लड़कियां शायद यह सवाल ही न पूछें कि “पीरियड्स पर इतना शोर क्यों?”, क्योंकि तब तक पीरियड्स उनके लिए सिर्फ़ शरीर का एक नॉर्मल हिस्सा होंगे, न कि पढ़ाई और सपनों के बीच दीवार।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म को किस अधिकार से जोड़ा है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में साफ कहा है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन के अधिकार” का हिस्सा है। यानी, पीरियड्स के समय लड़कियों को साफ टॉयलेट, पानी, सैनिटरी पैड और प्राइवेसी देना अब सिर्फ़ “सुविधा” नहीं, बल्कि उनका मौलिक अधिकार माना जाएगा।
प्रश्न 2: अब स्कूलों के लिए कौन–कौन सी सुविधाएँ अनिवार्य हो गई हैं?
उत्तर: हर सरकारी और प्राइवेट स्कूल, चाहे शहर में हो या गांव में, को अब फंक्शनल जेंडर–सेपरेटेड टॉयलेट, साफ पानी, साबुन, वॉशिंग फैसिलिटी, मुफ्त ऑक्सी–बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड, मेंस्ट्रुअल हाइजीन कॉर्नर (जिसमें एक्स्ट्रा इनरवियर, यूनिफॉर्म, पैड आदि हों) और सैनिटरी वेस्ट की सेफ डिस्पोज़ल व्यवस्था अनिवार्य रूप से उपलब्ध करानी होगी।
प्रश्न 3: क्या यह फैसला सिर्फ़ सरकारी स्कूलों पर लागू होता है?
उत्तर: नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि यह आदेश देशभर के सभी स्कूलों पर लागू है – चाहे वे सरकारी हों या निजी, और चाहे शहरी इलाके में हों या ग्रामीण क्षेत्रों में। मतलब, हर मान्यता प्राप्त स्कूल अब इन सुविधाओं की जिम्मेदारी से बंधा हुआ है।
प्रश्न 4: अगर किसी स्कूल में ये सुविधाएँ नहीं मिलतीं, तो क्या हो सकता है?
उत्तर: अगर कोई स्कूल बुनियादी साफ–सुथरे टॉयलेट, पानी और मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाएँ नहीं देता, तो इसे राइट टू एजुकेशन एक्ट और अन्य स्टैच्युटरी नॉर्म्स का उल्लंघन माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में स्कूलों की मान्यता तक रद्द की जा सकती है, और सरकारी स्कूल होने पर संबंधित राज्य सरकार से जवाबदेही तय की जाएगी।
प्रश्न 5: माता–पिता और लड़कियाँ इस फैसले से practically क्या कर सकती हैं?
उत्तर: अगर आपकी बेटी के स्कूल में अलग गर्ल्स टॉयलेट, पानी, पैड या प्राइवेसी की सुविधा नहीं है, तो आप अब पूरी कानूनी मजबूती के साथ स्कूल मैनेजमेंट और शिक्षा विभाग से शिकायत कर सकते हैं। आप स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की मीटिंग में यह मुद्दा उठा सकते हैं, राइट टू एजुकेशन और इस सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दे सकते हैं, और ज़रूरत पड़े तो ज़िला शिक्षा अधिकारी या राज्य स्तर तक शिकायत ले जा सकते हैं। यह फैसला आपको सिर्फ़ नैतिक नहीं, कानूनी ताकत भी देता है।
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- Article 21 right to life periods
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- India menstrual justice Supreme Court
- menstrual health Article 14 21 21A
- menstrual hygiene policy for school girls
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- right to education menstrual facilities
- school menstrual hygiene management corners
- Supreme Court girls toilets ruling
- Supreme Court menstrual health judgment
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