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किशोरी की 30 हफ्ते प्रेग्नेंसी को SC ने मंजूर किया, कहा “महिला को जबरन बच्चा पैदा करने को मजबूर नहीं कर सकते”

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Supreme Court 30 week abortion approval
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सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़ित किशोरी की 30 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म करने की इजाज़त दी। MTP एक्ट 24 हफ्ते सीमा के बावजूद “महिला के अधिकार” पर जोर। मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट, किशोरी मानसिक स्थिति, प्रीवियस केसेज, कानूनी प्रावधान और महिलाओं के अधिकारों पर गहराई से।

30 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म करने की मंजूरी: सुप्रीम कोर्ट का महिलाओं के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: किशोरी की 30 हफ्ते गर्भावस्था खत्म करने की मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में फैसला सुनाया है जो महिलाओं के प्रजनन अधिकारों, विशेषकर नाबालिग रेप पीड़ितों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। अदालत ने 30 हफ्ते की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दे दी और साफ़ शब्दों में कहा कि किसी भी महिला को जबरन बच्चा पैदा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह मामला एक नाबालिग लड़की का है जिसे रेप का शिकार बनाया गया और अब उसकी शारीरिक व मानसिक स्थिति को देखते हुए गर्भपात की अनुमति मांगी गई। MTP एक्ट 2021 के तहत सामान्य गर्भावस्था 24 हफ्ते तक समाप्त की जा सकती है, लेकिन नाबालिगों और बलात्कार पीड़ितों के मामलों में मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर अपवाद संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमा को तोड़ते हुए 30 हफ्ते की गर्भावस्था पर भी हरी झंडी दे दी।

MTP एक्ट 2021: सामान्य नियम और अपवाद क्या हैं

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 2021 भारत में गर्भपात को नियंत्रित करता है। इस कानून के अनुसार गर्भावस्था के पहले 20 हफ्तों में डॉक्टर की मंजूरी से गर्भपात हो सकता है। 20 से 24 हफ्ते के बीच दो डॉक्टरों की राय ज़रूरी होती है। लेकिन 24 हफ्ते से ऊपर केवल मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर ही संभव है। अपवाद मामलों में नाबालिग लड़कियाँ, बलात्कार या यौन शोषण की शिकार महिलाएँ, भ्रूण में गंभीर विकृति या माँ की जान को खतरा शामिल हैं। इस केस में किशोरी रेप पीड़ित थी इसलिए हाई कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड बनाया। बोर्ड ने रिपोर्ट दी कि गर्भावस्था जारी रखना लड़की के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से हानिकारक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को आधार बनाते हुए अनुमति दे दी।

किशोरी का केस: रेप, गर्भावस्था और मानसिक आघात

यह मामला एक नाबालिग लड़की का है जिसे किसी अज्ञात व्यक्ति ने रेप का शिकार बनाया। गर्भावस्था का पता चलने पर परिवार ने इलाज शुरू किया लेकिन गर्भपात की समय सीमा निकल चुकी थी। POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ। हाई कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड गठित किया जिसने 30 हफ्ते की गर्भावस्था को समाप्त करने की सिफारिश की। बोर्ड ने चेतावनी दी कि जन्म के बाद बच्चे को NICU में रखना पड़ेगा जो परिवार के लिए आर्थिक बोझ बनेगा। किशोरी की मानसिक स्थिति भी अस्थिर बताई गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में महिला के अधिकार भ्रूण के अधिकारों पर भारी पड़ते हैं। अदालत ने जोर दिया कि महिला को जबरन बच्चा पैदा करने को मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क: महिला को जबरन बच्चा पैदा करने को मजबूर नहीं कर सकते

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ़ कहा कि प्रजनन अधिकार महिलाओं के मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार इसमें शामिल है। अदालत ने कहा कि 30 हफ्ते पर भ्रूण को “जीवित” मानना विवादास्पद है लेकिन महिला की सहमति और मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिकता है। पिछले केसेज जैसे X बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला दिया गया जहाँ 26 हफ्ते पर गर्भपात मंजूर हुआ। कोर्ट ने चेतावनी दी कि असुरक्षित गर्भपात से महिलाओं की जान को खतरा होता है। इस फैसले से MTP एक्ट में अपवाद मामलों के लिए दरवाज़ा और खुल गया।

पिछले फैसले: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी 24 हफ्ते सीमा तोड़ी

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में पहली बार 24 हफ्ते से ऊपर गर्भपात की अनुमति दी। एक 25 हफ्ते गर्भवती महिला को मंजूरी मिली। 2022 में POCSO केस में 14 साल की लड़की की 26 हफ्ते प्रेग्नेंसी खत्म की गई। 2023 में एक और केस में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर 28 हफ्ते पर हरी झंडी। इन सभी में कोर्ट ने महिला की मानसिक स्थिति को प्राथमिकता दी। इस केस में भी यही पैटर्न दिखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर केस अलग है और बोर्ड रिपोर्ट पर भरोसा किया जा सकता है। इससे महिलाओं के अधिकार मजबूत हुए।

फ्रीबीज़ का मुद्दा और आगे की चुनौतियाँ

इस फैसले से महिलाओं के प्रजनन अधिकार मजबूत हुए लेकिन चुनौतियाँ बाक़ी हैं। ग्रामीण इलाकों में असुरक्षित गर्भपात अभी भी आम हैं। NCRB डेटा के अनुसार हर साल हज़ारों महिलाएँ मरती हैं। MTP एक्ट में डॉक्टरों की कमी और स्टिग्मा समस्या है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अपील की कि मेडिकल बोर्ड्स को सशक्त बनाएँ। POCSO केसेज में तेज़ सुनवाई ज़रूरी। ये फैसला महिलाओं को सशक्त बनाता है लेकिन जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है।

महिलाओं के अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि प्रजनन निर्णय महिला का है। राज्य हस्तक्षेप तभी जब माँ या बच्चे को खतरा हो। इस फैसले से POCSO पीड़ित लड़कियों को राहत मिलेगी। सरकार को MTP एक्ट लागू करने में सुधार करना होगा। ये फैसला महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कदम है।

5 FAQs

प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते गर्भावस्था खत्म क्यों करने दी?
उत्तर: रेप पीड़ित किशोरी की मानसिक स्थिति खराब थी। मेडिकल बोर्ड ने रिपोर्ट दी कि जारी रखना हानिकारक। MTP एक्ट अपवाद में बोर्ड सिफारिश पर अनुमति। कोर्ट ने कहा महिला को जबरन बच्चा पैदा करने को मजबूर नहीं कर सकते।

प्रश्न 2: MTP एक्ट में 24 हफ्ते सीमा क्यों है?
उत्तर: MTP 2021 के अनुसार 20-24 हफ्ते दो डॉक्टर राय से। उसके बाद मेडिकल बोर्ड। नाबालिग रेप पीड़ितों में अपवाद। भ्रूण viability 24 हफ्ते के बाद मानी जाती। लेकिन महिला स्वास्थ्य प्राथमिक।

प्रश्न 3: POCSO केस में गर्भपात आसान क्यों?
उत्तर: POCSO एक्ट में रेप पीड़ित नाबालिग को गर्भपात का अधिकार। सुप्रीम कोर्ट ने कई केस में 24 हफ्ते से ऊपर मंजूरी दी। मानसिक स्वास्थ्य देखा जाता।

प्रश्न 4: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे फैसले दिए हैं?
उत्तर: हाँ। 2017 में 25 हफ्ते, 2022 में 26 हफ्ते POCSO केस में। हर बार बोर्ड रिपोर्ट पर। महिला अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा।

प्रश्न 5: असुरक्षित गर्भपात से खतरा क्या?
उत्तर: NCRB के अनुसार हज़ारों महिलाएँ मरती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चेताया। MTP केंद्रों बढ़ाने बोर्ड सशक्त करने की ज़रूरत।

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