कश्मीर घाटी में J&K पुलिस ने मस्जिदों, इमामों, कमेटियों का विस्तृत डेटा मांगा। 4 पेज का फॉर्म में आधार, पासपोर्ट, बैंक, IMEI, फंडिंग डिटेल्स। व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल जांच का कनेक्शन। विवाद शुरू।
मस्जिदों के खाते-IMEI तक पुलिस की नजर: कश्मीर में नया सर्वे, धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल!
कश्मीर में मस्जिदों का मेगा डेटा सर्वे: पुलिस ने इमामों के आधार से IMEI तक जानकारी मांगी
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कश्मीर घाटी में अब तक का सबसे बड़ा डेटा कलेक्शन अभियान शुरू किया है। मस्जिदों, मदरसों और उनके संचालकों की बारीक से बारीक जानकारी मांगी जा रही। 4 पेज का फॉर्म पूरे कश्मीर में बंट गया- एक पेज मस्जिद का, बाकी तीन इमाम, मुअज्जिन, खतीब, कमेटी मेंबर्स और बैत-उल-माल के लोगों का। इसमें मस्जिद का सекта (बरेलवी, हनफी, देवबंदी, अहले हदीस), फंडिंग सोर्स, निर्माण खर्च, मासिक बजट से लेकर निजी आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट, बैंक खाता, ATM कार्ड, मोबाइल IMEI, सोशल मीडिया हैंडल तक सब मांगा।
ये अभियान नवंबर 2025 में पकड़े गए ‘व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल’ से जुड़ा बताया जा रहा। J&K, UP, हरियाणा पुलिस ने मिलकर 9 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें 3 डॉक्टर थे। 2900 किलो IED जब्त हुए। जांच में पता चला कुछ संदिग्ध मदरसों या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से रेडिकलाइज्ड। खासकर एक मौलवी इरफान अहमद वागय पर शक। अधिकारी कहते हैं मस्जिदों-मदरसों के फाइनेंशियल फ्लो ट्रैक करना जरूरी, फॉरेन फंडिंग चेक। गांव के नंबरदार फॉर्म भरवा रहे।
फॉर्म में मस्जिद का पूरा ब्योरा: कितने फ्लोर, कितनी सीटिंग, जमीन का स्टेटस (स्टेट लैंड, मिल्कियत, शमलात), मैनेजमेंट स्ट्रक्चर, बैंक अकाउंट। कमेटी मेंबर्स के फैमिली डिटेल्स, जन्मतिथि, एजुकेशन, फोन-ईमेल, विदेश यात्रा, रिश्तेदारों का विदेश स्टे। फिर आधार, PAN, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, मासिक इनकम-एक्सपेंडिचर, प्रॉपर्टी वैल्यू। मोबाइल पर कौन से ऐप्स, कोई मिलिटेंसी बैकग्राउंड? सोशल मीडिया व्हाट्सएप नंबर, हैंडल्स सब।
पुलिस ने आधिकारिक बयान नहीं दिया। सोर्स बताते हैं ये लंबे समय से प्लान था। श्रीनगर MP रुहुल्ला मेहदी ने विरोध किया। बोले, ‘धार्मिक प्रैक्टिस कंट्रोल करना, सर्विलांस, धमकी संविधान के खिलाफ।’ कुछ मस्जिद कमेटियां असहज। कहते हैं रूटीन वेरिफिकेशन हो सकता, इतना पर्सनल डेटा क्यों? प्राइवेसी, धार्मिक आजादी पर सवाल उठे।
पहले भी 2019 और 2024-25 में छोटे स्तर पर सर्वे हुए, लेकिन ये सबसे विस्तृत। कश्मीर में शांति प्रक्रिया के बीच सिक्योरिटी एजेंसियां हर कोने पर नजर रखना चाहती। टेरर फंडिंग रोकना, रेडिकलाइजेशन चेक। लेकिन कम्युनिटी में भरोसे की कमी।
फॉर्म का ब्रेकडाउन
- पेज 1: मस्जिद डिटेल्स (सекта, साइज, फंडिंग, जमीन)
- पेज 2: पर्सनल आईडी (आधार, पासपोर्ट, फैमिली)
- पेज 3: फाइनेंशियल (बैंक, PAN, प्रॉपर्टी, इनकम)
- पेज 4: डिजिटल (IMEI, सोशल मीडिया, ऐप्स, क्रिमिनल रिकॉर्ड)
डेटा क्यों जरूरी?
- फॉरेन फंडिंग ट्रेस: सऊदी, पाकिस्तान चैनल।
- रेडिकलाइजेशन मैप: कौन से सर्कल संदिग्ध।
- टेरर लॉजिस्टिक्स: हाइडआउट या सप्लाई।
- व्हाइट कॉलर नेटवर्क: डॉक्टरों-प्रोफेशनल्स का कनेक्शन।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
- MP रुहुल्ला: ‘धार्मिक आजादी का उल्लंघन।’
- हुर्रियत: ‘हैरासमेंट टूल।’
- BJP: ‘सिक्योरिटी जरूरी, ट्रांसपेरेंसी अच्छी।’
सोशल मीडिया पर डिबेट।
पिछले सर्वे की तुलना
| सर्वे | स्कोप | फोकस |
|---|---|---|
| 2019 | सीमित मस्जिदें | सिक्योरिटी ऑपरेशन |
| 2024-25 | मध्यम | स्पेसिफिक केस |
| 2026 | पूरे कश्मीर | ग्रैनुलर, फाइनेंशियल, डिजिटल |
कश्मीर के आंकड़े
- 1500+ मस्जिदें कवर।
- हजारों लोग डेटा देंगे।
- गांव नंबरदार कलेक्टर्स।
प्राइवेसी लॉ कनेक्शन: डेटा प्रोटेक्शन बिल पर बहस।
कम्युनिटी चिंताएं
इतिहास से सीख
पुलवामा, आर्टिकल 370 के बाद सिक्योरिटी बढ़ी। ऐसे ड्राइव से ट्रस्ट इश्यू। लेकिन टेरर घटे। बैलेंस जरूरी।
कश्मीर में शांति के लिए ट्रांसपेरेंसी अच्छी, लेकिन प्राइवेसी का ध्यान रखें। ये डेटा टेरर रोक सकता या कम्युनिटी डराए। वक्त बताएगा।
5 अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- J&K पुलिस ने मस्जिद सर्वे क्यों शुरू किया?
व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल जांच से। फंडिंग, रेडिकलाइजेशन ट्रैक। - फॉर्म में क्या-क्या मांगा गया?
मस्जिद डिटेल्स, आधार, पासपोर्ट, बैंक, IMEI, सोशल मीडिया। - क्या मदरसे भी कवर हैं?
हां, मस्जिदों संग। कम्पलीट मैपिंग। - विरोध क्यों हो रहा?
MP रुहुल्ला बोले- धार्मिक आजादी का उल्लंघन। प्राइवेसी चिंता। - पहले भी ऐसा हुआ?
हां, लेकिन छोटे स्तर पर। ये सबसे बड़ा।
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