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शराब नीति केस में ED पर टिप्पणी हटाने की मांग: केजरीवाल–सिसोदिया को हाईकोर्ट ने और वक्त क्यों दिया?

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Delhi High Court grants time to Arvind Kejriwal and Manish Sisodia to reply to ED plea
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक्साइज पॉलिसी केस में ट्रायल कोर्ट के फैसले से ED के खिलाफ की गई “अनावश्यक” टिप्पणियाँ हटाने की ED याचिका पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को जवाब देने के लिए 2 अप्रैल तक समय दिया। जज ने देर से जवाब पर नाराज़गी भी जताई।

ट्रायल कोर्ट ने ED को ‘स्पेक्यूलेटिव’ कहा, अब वही शब्द हटाने की लड़ाई – हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को

दिल्ली हाईकोर्ट ने ED की याचिका पर केजरीवाल–सिसोदिया को 2 अप्रैल तक का समय दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस में एक अहम प्रक्रिया–संबंधी आदेश देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी CM मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को जवाब दाखिल करने के लिए 2 अप्रैल तक का समय दिया है। ये सभी उस याचिका के प्रतिवादी हैं जिसे प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दायर कर ट्रायल कोर्ट के 27 फरवरी 2026 के आदेश में अपने खिलाफ की गई कुछ “अनावश्यक” और “बाहरी” टिप्पणियाँ हटाने की मांग की है। हाईकोर्ट की जस्टिस स्वरना कांत शर्मा ने कहा कि अगली तारीख पर, यानी 2 अप्रैल को, जवाब मिल जाने के बाद इस मामले की फाइनल सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।

जज की नाराज़गी: “आप जवाब क्यों नहीं दाखिल कर रहे?”

सुनवाई के दौरान जब केजरीवाल और अन्य आरोपियों की ओर से वकीलों ने और समय मांगा, तो जस्टिस शर्मा ने नाराज़गी जताते हुए पूछा, “I don’t know why you are not filing a reply. You should have filed a reply if you think you really needed to file a reply.” अदालत ने यह भी कहा कि ED की याचिका में सिर्फ़ इतना कहा गया है कि ट्रायल जज को कुछ बातें नहीं लिखनी चाहिए थीं, इसलिए यह जवाब देने के लिए बहुत जटिल मुद्दा नहीं है। अदालत ने साफ किया कि 2 अप्रैल तक जवाब दाखिल कर देना होगा, उसके बाद तारीख सिर्फ़ अंतिम बहस के लिए दी जाएगी।

ED की दलील: ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों से “prejudice” होगा

ED की याचिका में कहा गया है कि CBI की केस में दिए गए ट्रायल कोर्ट के discharge ऑर्डर में एजेंसी के खिलाफ जो टिप्पणियाँ की गईं, वे “पूरी तरह extraneous” हैं और सीधे–सीधे ED की कार्यप्रणाली, गिरफ्तारी और चुनावी प्रक्रिया में दखल जैसे पहलुओं पर “स्वीपिंग” कमेंट करती हैं। एजेंसी का कहना है कि वह उन CBI कार्यवाही का हिस्सा ही नहीं थी, न ही उसे सुना गया, इसलिए उसके खिलाफ ऐसे अवलोकन natural justice के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। याचिका में तर्क दिया गया कि अगर इन्हें यूँ ही रहने दिया गया तो इससे न केवल ED बल्कि “जनता के हित” पर भी गंभीर और अपूरणीय क्षति पड़ सकती है।

ट्रायल कोर्ट ने क्या कहा था? “speculative”, “conjecture and surmise”

27 फरवरी के आदेश में स्पेशल CBI कोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य सभी 23 आरोपियों को CBI के केस में डिस्चार्ज करते हुए अभियोजन की थ्योरी पर कड़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि यह केस “speculative construct resting on conjecture and surmise” है और न्यायिक जांच के कसौटी पर खरा नहीं उतरता। साथ ही, ऑर्डर में जांच एजेंसियों के राजनीतिक–चुनावी मैदान में “enter the electoral arena” जैसे वाक्य भी इस्तेमाल हुए थे, जिसमें यह चेतावनी दी गई थी कि अगर ऐसा होता रहा तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। अब ED इन्हीं अंशों को हटवाना चाहती है या कम से कम यह चाहती है कि इन पर भरोसा आगे की कार्यवाहियों में न किया जाए।

डिफेंस की दलील: “ये टिप्पणियाँ जज की तर्क–श्रृंखला का हिस्सा हैं”

केजरीवाल और अन्य आरोपियों की ओर से वकीलों ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियाँ उस 600 पन्नों के डिस्चार्ज ऑर्डर की reasoning का हिस्सा हैं, जिन्हें “चेरी-पिक” करके हटाया नहीं जा सकता। उनका तर्क था कि जज ने पूरे रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलें देखने के बाद ये observations की हैं, इसलिए इन्हें selectively डिलीट करना उचित नहीं होगा। एक वकील ने कहा कि इतना लंबा ऑर्डर होने के कारण जवाब तैयार करने के लिए समय चाहिए, जिस पर जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की कि ED की याचिका “पूरे 600 पेज” की नहीं, सिर्फ़ चुनी हुई टिप्पणियों की बात कर रही है।

ED का आग्रह: आरोपी इन observations पर आगे भरोसा न करें

सुनवाई के दौरान Additional Solicitor General एस.वी. राजू ने यह भी मांग की कि हाईकोर्ट यह निर्देश दे कि जब तक यह याचिका लंबित है या उस पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक आरोपी इन ट्रायल कोर्ट observations पर किसी भी दूसरी न्यायिक कार्यवाही या केस में भरोसा न करें। उनका कहना था कि ED की याचिका से अभियुक्तों के अधिकारों पर कोई तत्काल प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि चुनौती केवल टिप्पणियों तक सीमित है, न कि डिस्चार्ज ऑर्डर के नतीजे तक। हाईकोर्ट ने फिलहाल ऐसा कोई इंटरिम निर्देश देने से इनकार किया और कहा कि पहले सभी पक्षों का जवाब आने दें, फिर अंतिम बहस के दौरान इस पर विचार होगा।

आगे क्या होगा?

अब यह मामला 2 अप्रैल को फिर से हाईकोर्ट के सामने आएगा, तब तक केजरीवाल, सिसोदिया और बाकी प्रतिवादियों को अपना लिखित जवाब दाखिल करना होगा। उसी दिन जज यह तय करेंगे कि अंतिम सुनवाई कितने समय की होगी और किस तारीख को रखी जाएगी। अगर कोर्ट ED की याचिका स्वीकार कर लेती है तो ट्रायल कोर्ट के आदेश से कुछ हिस्से हटाए जा सकते हैं या यह स्पष्ट किया जा सकता है कि आगे की किसी कार्यवाही में उनका हवाला न दिया जाए; अगर याचिका खारिज होती है, तो वे observations जस की तस बनी रहेंगी और ED के खिलाफ आलोचनात्मक टिप्पणी न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा रहेगी।

FAQs (Hindi)

  1. प्रश्न: हाईकोर्ट ने केजरीवाल और सिसोदिया को कितना समय दिया है?
    उत्तर: दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को ED की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए 2 अप्रैल तक का समय दिया है।
  2. प्रश्न: ED की याचिका में मुख्य मांग क्या है?
    उत्तर: ED चाहती है कि 27 फरवरी 2026 के ट्रायल कोर्ट डिस्चार्ज ऑर्डर में उसके खिलाफ की गई “अनावश्यक”, “स्वीपिंग” और “extraneous” टिप्पणियाँ हटाई जाएँ या कम से कम यह स्पष्ट हो कि उन पर आगे भरोसा न किया जाए।
  3. प्रश्न: ट्रायल कोर्ट ने ED/प्रॉसिक्यूशन के केस को किस तरह बताया था?
    उत्तर: स्पेशल कोर्ट ने CBI के केस को “speculative construct resting on conjecture and surmise” बताया था और कहा था कि यह न्यायिक जांच की कसौटी पर टिक नहीं पाता; साथ ही जांच एजेंसियों को चुनावी अखाड़े में न उतरने की नसीहत भी दी थी।
  4. प्रश्न: हाईकोर्ट ने डिफेंस वकीलों से क्या कहा?
    उत्तर: जस्टिस स्वरना कांत शर्मा ने पूछा कि वे जवाब क्यों नहीं दाखिल कर रहे और कहा कि अगर उन्हें सच में reply देना है तो देना चाहिए; अदालत ने कहा कि ED की याचिका केवल चुनी हुई टिप्पणियों पर है, पूरे 600 पन्नों पर नहीं।
  5. प्रश्न: ED का कहना है कि इन टिप्पणियों से उसे क्या नुकसान होगा?
    उत्तर: ED का तर्क है कि बिना उसे सुने की गई ये अवलोकन natural justice के खिलाफ हैं और अगर ऐसे “सर्वव्यापी और बिना मार्गदर्शन वाले” remarks रिकॉर्ड पर रहे तो उससे ED की साख और भविष्य की जांचों पर गंभीर और अपूरणीय “prejudice” होगा।

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