मद्रास हाईकोर्ट ने 9 साल की मानसिक बीमार बेटी को जहर देकर मारने वाले माता-पिता को दोषी ठहराया। कहा पैरेंटिंग ड्यूटी कभी कम नहीं होती, कोई कानून हाथ में नहीं ले सकता।
मानसिक बीमार बेटी को जहर क्यों दिया? HC ने माता-पिता को लाइफ जेल से राहत क्यों न दी
मद्रास हाईकोर्ट का सख्त फैसला: माता-पिता को बेटी हत्या में राहत नहीं
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के एक कपल को उनकी 9 साल की बेटी को जहर देकर मारने के मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस जीके इलांथिरैयन और आर पूर्णिमा की बेंच ने 13 फरवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि कोई भी सर्कमस्टैंस पैरेंट को बच्चे की जान लेने का हक नहीं देता। उन्होंने जोर दिया कि पैरेंट्स कानून अपने हाथ में नहीं ले सकते और किसी की जान ‘बुझा’ नहीं सकते। कपल ने अपील में दावा किया था कि बच्ची मानसिक रूप से बीमार थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें IPC 302 (हत्या) और 342 (गलत हिरासत) के तहत लाइफ इम्प्रिजनमेंट की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा सहानुभूति है लेकिन कानून से ऊपर कुछ नहीं।
बच्ची का जन्म से मानसिक रोग: माता-पिता की कठिनाइयाँ क्या थीं?
प्रॉसीक्यूशन के मुताबिक बच्ची का जन्म से ही मानसिक विकार था। कपल को भावनात्मक और आर्थिक रूप से बहुत तंगी झेलनी पड़ी। माँ एक प्राइवेट कॉलेज में प्रोफेसर थी, लेकिन बच्ची की देखभाल के लिए जॉब छोड़ दी। परिवार ने बहुत कोशिश की लेकिन बच्ची की हालत सुधरी नहीं। कपल ने महसूस किया कि वे अब सहन नहीं कर सकते। 1 अक्टूबर 2018 को वे बच्ची को मंदिर ले गए। वहाँ उन्होंने सोफ्ट ड्रिंक में पेस्टीसाइड मिलाकर पिला दिया। मंदिर के लोग बीच में आ गए। बच्ची को हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन 6 अक्टूबर को मौत हो गई। गांव के एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर ने ही FIR दर्ज कराई।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ: पैरेंटिंग ड्यूटी कभी कम नहीं
बेंच ने साफ कहा कि पैरेंटिंग की जिम्मेदारी बच्चे की हालत से कम नहीं होती। चाहे बच्चा जन्म से मानसिक बीमार हो, शारीरिक विकलांग हो या पूरी तरह स्वस्थ – माता-पिता का फर्ज वही रहता है। उन्होंने कहा कई पैरेंट्स विकलांग बच्चों के लिए जान की बाजी लगाते हैं, त्याग करते हैं। अगर कानून विकलांग बच्चों को खत्म करने की इजाजत देता तो वे समाज में जीवित ही न रहते। बच्ची ने खुद दुनिया में कदम नहीं रखा, उसके पैरेंट्स ने ही जन्म दिया। इसलिए नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी उनकी है। कोर्ट ने कहा कठिनाइयाँ सहनशक्ति टेस्ट करती हैं, लेकिन हत्या जायज नहीं।
ट्रायल कोर्ट का फैसला: हत्या और गलत हिरासत साबित
अगस्त 2022 में प्रिंसिपल सेशन कोर्ट ने कपल को दोषी ठहराया। IPC 302 के तहत हत्या और 342 के तहत गलत हिरासत। दोनों को लाइफ इम्प्रिजनमेंट और जुर्माना। प्रॉसीक्यूशन ने साबित किया कि पैरेंट्स ने ही पॉइजन दिया। फॉरेंसिक रिपोर्ट में केमिकल कंटेनर से ऑर्गेनोफॉस्फोरस इंसेक्टिसाइड मिला, जो जहरीला है। पैरेंट्स ने कोई कंप्लेंट नहीं की, बल्कि VAO ने बताया कि कपल ने बच्ची को जहर पिलाया। डिफेंस ने भी नहीं कहा कि कोई और पॉइजन दिया। कोर्ट ने सबूतों को मजबूत माना।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज: कानून से ऊपर कोई नहीं
हाईकोर्ट ने अपील सुनने के बाद ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कहा पैरेंट्स को सिम्पैथी है लेकिन कानून सबके लिए बराबर। उन्होंने कहा अगर पैरेंट्स को हक मिला तो समाज में विकलांग बच्चे सुरक्षित नहीं रहेंगे। बेंच ने दोहराया कि कोई सर्कमस्टैंस पैरेंट को बच्चे की जान लेने का अधिकार नहीं देती। फैसले में लिखा कि ट्रायल कोर्ट ने सही दोषसिद्धि की। कपल अब सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। लेकिन हाईकोर्ट ने राहत देने से साफ मना कर दिया।
क्या ये ईयूथेनेशिया का केस था? कोर्ट ने क्यों कहा ना
कपल ने दावा किया कि बच्ची की हालत इतनी खराब थी कि वे दया से मारना चाहते थे, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज किया। भारत में एक्टिव ईयूथेनेशिया (जहर देकर मारना) कानूनी रूप से मान्य नहीं। पैसिव ईयूथेनेशिया (लाइफ सपोर्ट हटाना) में भी सुप्रीम कोर्ट की सख्त शर्तें हैं। यहां पैरेंट्स ने मंदिर में पब्लिक प्लेस पर जहर दिया। कोर्ट ने कहा पैरेंटिंग में त्याग जरूरी, हत्या नहीं। कई पैरेंट्स ऐसे बच्चों को पालते हैं। कानून जीवन की पवित्रता बचाता है।
समाज पर असर: विकलांग बच्चों के पैरेंट्स के लिए क्या संदेश?
ये फैसला समाज को साफ संदेश देता है कि बच्चे की हालत चाहे जो हो, पैरेंट्स की ड्यूटी खत्म नहीं होती। सरकार को विकलांग बच्चों के लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम, हॉस्टल, थैरेपी, फाइनेंशियल एड देना चाहिए। ताकि पैरेंट्स टूटें नहीं। NGO और काउंसलिंग बढ़ाएं। कोर्ट ने सहानुभूति दिखाई लेकिन कानून को प्राथमिकता दी। ये केस ईयूथेनेशिया बहस को फिर जगा सकता है।
कानूनी प्रावधान: IPC 302 में सजा क्या है?
IPC 302 के तहत हत्या पर डेथ या लाइफ इम्प्रिजनमेंट। 342 गलत हिरासत पर 1 साल तक। तमिलनाडु में बच्चे की हत्या पर सख्त कानून। POCSO अगर लागू होता तो और कड़ी सजा। लेकिन यहां उम्र 9 साल थी। पैरेंट्स पर नैतिक बोझ भी। सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। लेकिन हाईकोर्ट का फैसला मजबूत है। समाज सोचे कैसे ऐसे केस रोकें।
FAQs (Hindi)
- प्रश्न: मद्रास हाईकोर्ट ने माता-पिता को राहत क्यों न दी?
उत्तर: कोर्ट ने कहा पैरेंटिंग ड्यूटी कभी कम नहीं होती, कोई सर्कमस्टैंस बच्चे को मारने का हक नहीं देती, कानून हाथ में लेना जायज नहीं। - प्रश्न: हत्या कैसे हुई?
उत्तर: 1 अक्टूबर 2018 को मंदिर में सोफ्ट ड्रिंक में पेस्टीसाइड मिलाकर पिलाया; 6 अक्टूबर को मौत, VAO ने FIR की। - प्रश्न: बच्ची की हालत क्या थी?
उत्तर: जन्म से मानसिक विकार, माँ ने प्रोफेसर जॉब छोड़कर देखभाल की लेकिन कपल सहन नहीं कर सका। - प्रश्न: ट्रायल कोर्ट ने क्या सजा दी?
उत्तर: IPC 302 (हत्या) और 342 (गलत हिरासत) पर दोनों को लाइफ इम्प्रिजनमेंट और जुर्माना, अगस्त 2022 का फैसला। - प्रश्न: कोर्ट ने विकलांग बच्चों पर क्या कहा?
उत्तर: कई पैरेंट्स त्याग करते हैं, अगर कानून इजाजत देता तो ऐसे बच्चे समाज में जीवित न रहते।
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