दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि कई पढ़े-लिखे पति स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेकर या कमाई कम दिखाकर पत्नी–बच्चों के गुजारा भत्ते से बचने की रणनीति अपनाते हैं, लेकिन अदालतें उनकी वास्तविक कमाई क्षमता के आधार पर मेंटेनेंस तय कर सकती हैं।
सिर्फ़ VRS लेकर बच नहीं सकते! हाई कोर्ट बोला– पढ़े-लिखे पति भी मेंटेनेंस से भागने की कोशिश करते हैं
हाई कोर्ट का सख्त अवलोकन: नौकरी छोड़कर मेंटेनेंस से बचने की चाल
दिल्ली हाई कोर्ट ने हालिया फैसले में साफ कहा कि पत्नी–बच्चों के भरण–पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए पति का स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेना या नौकरी छोड़ना कोई वैध बहाना नहीं हो सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि जैसे कुछ मामलों में कामकाजी पत्नियाँ नौकरी छोड़कर मेंटेनेंस विवादों में बढ़त लेने की कोशिश करती हैं, वैसे ही “well-qualified husbands” भी अक्सर अपनी स्थायी नौकरी छोड़कर खुद को कम आय वाला दिखाने की रणनीति अपनाते हैं, ताकि उचित गुजारा भत्ता देने से बच सकें। कोर्ट ने कहा कि ऐसा चलन बढ़ रहा है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि मेंटेनेंस कानूनी और नैतिक दोनों तरह की सतत जिम्मेदारी है।
CRPF अधिकारी का केस: VRS का सहारा लेकर कमाई ‘कम’ बताने की कोशिश
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार यह टिप्पणी उस केस में आई, जिसमें CRPF के एक अधिकारी ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट लिया और बाद में फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई मेंटेनेंस राशि को हाई कोर्ट में चुनौती दी। पति का कहना था कि अब उसकी आय बहुत कम है, वह केवल पेंशन और थोड़ी बहुत खेती पर निर्भर है, इसलिए उससे उतना गुजारा भत्ता नहीं लिया जा सकता जितना फैमिली कोर्ट ने तय किया है। अदालत ने हालांकि यह दलील संदिग्ध मानते हुए कहा कि यह “implausible” है कि कोई सुशिक्षित, सक्षम व्यक्ति बिना कोई अन्य आय का इंतज़ाम किए अचानक स्थिर, अच्छी नौकरी छोड़ दे, खासकर तब जब उस पर पत्नी–बच्चों की जिम्मेदारी हो।
“अच्छे–भले, सक्षम पति की बेरोजगारी बहाना नहीं बन सकती”
जस्टिस अमित महाजन ने अपने आदेश में कहा कि एक “well-bodied” और योग्य पति केवल यह कहकर मेंटेनेंस से नहीं बच सकता कि उसके पास अब नौकरी नहीं है या आय बहुत कम है। कोर्ट ने साफ किया कि गुजारा भत्ता तय करते समय केवल वर्तमान घोषित सैलरी ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की “earning capacity” यानी उसकी वास्तविक कमाने की क्षमता देखी जाती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकारी कर्मचारियों में VRS के बाद प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करना आम बात है, इसलिए यह मान लेना कि रिटायरमेंट के बाद पति के पास पेंशन छोड़कर कोई कमाई नहीं, “विश्वसनीय नहीं” लगता।
कोर्ट का ‘guesswork’ वाला सिद्धांत: असली आय छिपे तो जज आंकलन कर सकते हैं
हाई कोर्ट ने माना कि matrimonial मामलों में पति–पत्नी दोनों ही कभी–कभी अपनी असली आय छिपाने की कोशिश करते हैं, इसलिए अदालतें कुछ हद तक “guesswork” कर सकती हैं। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने मामले Bharat Hegde बनाम Saroj Hegde का हवाला देते हुए कहा गया कि जब पक्षकार आय के सही आंकड़े नहीं देते, तो जज उनकी योग्यता, पिछली सैलरी, जीवन–स्तर और दस्तावेज़ों से एक “reasonable figure” निकाल सकते हैं। इसका मतलब यह है कि केवल कागज़ पर दिखाई गई कम या शून्य आय दिखाकर कोई पति अदालत को गुमराह नहीं कर सकता; कोर्ट उसके पूरे बैकग्राउंड से कमाई का यथोचित अनुमान लगा सकती है।
कानून की नजर में मेंटेनेंस ‘पवित्र जिम्मेदारी’
कोर्ट ने दोहराया कि पति पर पत्नी और बच्चों के भरण–पोषण की जिम्मेदारी “sacrosanct duty” यानी पवित्र दायित्व है, जिससे भागने के लिए स्वैच्छिक बेरोजगारी या VRS का सहारा नहीं लिया जा सकता। फैसले में कहा गया कि परिवार का जीवन–स्तर, बच्चों की पढ़ाई, पत्नी की बुनियादी ज़रूरतें और शादी के दौरान अपनाया गया standard of living भी ध्यान में रखा जाएगा, न कि केवल पति की यह दलील कि उसकी आय अचानक घट गई है। अदालत के मुताबिक, अगर पति सक्षम है तो उसे अपनी “वास्तविक कमाई क्षमता” के अनुरूप ही जिम्मेदारी उठानी होगी, चाहे वह नौकरी कर रहा हो, बिज़नेस कर रहा हो या VRS लेकर दूसरी कमाई कर रहा हो।
पत्नी की नौकरी छोड़ने वाली रणनीति पर भी टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक संतुलित टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि maintenance विवादों में सिर्फ पति ही नहीं, कुछ मामलों में पत्नियाँ भी अपनी नौकरी छोड़कर खुद को पूरी तरह निर्भर दिखाने की कोशिश करती हैं। जज ने कहा, “Just as employed wives allegedly leave their jobs to gain an upper hand in maintenance disputes, quitting of jobs is similarly a common strategy adopted by well-qualified husbands to avoid paying proper amount of maintenance as well.” यानी अदालत ने साफ संकेत दिया कि मेंटेनेंस कानून का दुरुपयोग किसी भी पक्ष द्वारा होने पर कोर्ट आँख मूँदकर विश्वास नहीं करेगी और दोनों की वास्तविक क्षमता और आचरण को देखेगी।
पीड़ित पत्नी और बच्चों के लिए फैसले का मतलब
इस फैसले का व्यावहारिक मतलब यह है कि अगर कोई पति अचानक नौकरी छोड़कर, खुद को किसान या बेरोजगार बताकर गुजारा भत्ते से बचने की कोशिश करता है, तो भी पत्नी और बच्चों का अधिकार कमजोर नहीं होगा। फैमिली कोर्ट द्वारा तय मेंटेनेंस को हाई कोर्ट ने बरकरार रखते हुए साफ किया कि मेंटेनेंस का मकसद dependent spouse और बच्चों को बेबसी या destitution से बचाना है। इसके लिए पति की “संभावित व वास्तविक आय” दोनों को देखा जाएगा और यदि ज़रूरत पड़ी तो अदालत खुद अनुमान लगाकर उचित राशि तय कर सकती है।
FAQs (Hindi)
- प्रश्न: दिल्ली हाई कोर्ट ने कौन–सी “आम रणनीति” पर टिप्पणी की?
उत्तर: कोर्ट ने कहा कि जैसे कुछ employed पत्नियाँ नौकरी छोड़कर maintenance केस में बढ़त लेने की कोशिश करती हैं, वैसे ही कई well-qualified पति भी जानबूझकर नौकरी छोड़ देते हैं या VRS ले लेते हैं ताकि अपनी आय कम दिखाकर उचित गुजारा भत्ता देने से बच सकें। - प्रश्न: क्या स्वैच्छिक रिटायरमेंट (VRS) मेंटेनेंस से बचने का वैध बहाना है?
उत्तर: नहीं, हाई कोर्ट ने साफ कहा कि पति VRS लेकर पत्नी–बच्चों के भरण–पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता; यह उसकी “पवित्र जिम्मेदारी” है जो उसकी असली earning capacity के आधार पर आँकी जाएगी। - प्रश्न: कोर्ट ‘earning capacity’ से क्या मतलब लेती है?
उत्तर: केवल मौजूदा घोषित सैलरी नहीं, बल्कि पति की योग्यता, पिछली नौकरी, उम्र, स्वास्थ्य, और दूसरे संभावित आय–स्रोत देखकर यह तय किया जाता है कि वह वास्तव में कितना कमा सकता है। - प्रश्न: अगर पति–पत्नी दोनों अपनी असली आय छिपाएँ तो क्या होगा?
उत्तर: कोर्ट ने कहा कि matrimonial केसों में पार्टियाँ अक्सर अपने सही इनकम डिटेल्स नहीं देतीं, इसलिए जज “some guesswork” कर सकते हैं और उपलब्ध रिकॉर्ड, योग्यता व लाइफस्टाइल देखकर एक वाजिब income figure तय कर सकते हैं। - प्रश्न: इस फैसले से पत्नियों और बच्चों के लिए क्या संदेश जाता है?
उत्तर: संदेश यह है कि कोई भी सक्षम पति केवल बेरोजगारी या VRS का बहाना बनाकर maintenance से नहीं बच पाएगा; अदालत उसकी वास्तविक कमाने की क्षमता देखकर पत्नी और बच्चों के लिए उचित गुजारा भत्ता सुनिश्चित करेगी।
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