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“युद्ध सिर्फ़ स्वार्थ का नतीजा” – मोहन भागवत ने दुनिया के संघर्षों की जड़ पर क्या निशाना साधा?

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नागपुर में सभा को संबोधित करते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया में संघर्षों की मूल वजह स्वार्थी हित और वर्चस्व की चाहत है और स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन से संभव है।

ईरान–अमेरिका टकराव के बीच भागवत का संदेश: क्या भारत सच में चल रही जंग ख़त्म कर सकता है?

नागपुर से संदेश: युद्धों की जड़ में स्वार्थ और वर्चस्व की भूख

नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने दुनिया भर में चल रहे युद्धों और टकरावों पर चिंता जताई। उन्होंने साफ कहा कि वैश्विक संघर्षों की मूल वजह देशों, समूहों और व्यक्तियों का स्वार्थ और दूसरों पर वर्चस्व कायम करने की इच्छा है। भागवत के मुताबिक जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी, तब तक दुनिया में स्थायी शांति की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि हर जगह ‘मैं और मेरा’ की सोच हावी रहती है।

उन्होंने याद दिलाया कि पिछले 2,000 साल में दुनिया ने संघर्ष खत्म करने के लिए कई तरह के विचारों और प्रणालियों को आजमाया है, लेकिन नतीजे सीमित रहे हैं। कभी किसी विचारधारा के नाम पर, कभी किसी सत्ता–ब्लॉक के नाम पर, तो कभी किसी धर्म या नस्ल की श्रेष्ठता के नाम पर युद्ध होते रहे हैं। उनके अनुसार यह सब इसलिए है क्योंकि मूल प्रेरणा “मेरा हित और मेरा वर्चस्व” रही, न कि “सभी का भला और संतुलन”।

धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण पर चिंता

भागवत ने अपने संबोधन में धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और ऊंच–नीच की मानसिकता को भी वर्तमान संघर्षों की बड़ी वजह बताया। उन्होंने कहा कि आज भी कई हिस्सों में यह मान लिया जाता है कि एक धर्म या विचार बाकी सब से श्रेष्ठ है और उसे किसी भी तरह फैलाना है, भले ही दूसरों की आस्था और पहचान कुचलनी पड़े। उनके मुताबिक इस तरह की सोच समाजों और देशों के बीच अविश्वास पैदा करती है, जो बाद में हिंसा और संघर्ष में बदल जाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि श्रेष्ठता–हीनता की भावना सिर्फ़ धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि जाति, नस्ल, भाषा और क्षेत्र के स्तर पर भी दिखाई देती है। जब तक इन मानसिक दीवारों को तोड़कर “हम सब इंसान हैं” की बुनियादी समझ मजबूत नहीं होगी, तब तक अलग-अलग रूप में टकराव उभरते रहेंगे।

भारत की भूमिका: “हम मानवता का मार्ग मानते हैं, संघर्ष का नहीं”

मोहान भागवत ने कहा कि भारत की प्राचीन दृष्टि यह मानती है कि समस्त सृष्टि आपस में जुड़ी हुई है और “सब एक ही चेतना के अंश हैं।” उन्होंने कहा कि भारत “मानवता के नियम” को मानता है, जबकि दुनिया के कुछ हिस्सों में अब भी “survival of the fittest” यानी ताकतवर की चलने वाली मानसिकता हावी है। उनके अनुसार भारत का कर्तव्य है कि वह दुनिया को यह दिखाए कि प्रगति का रास्ता प्रतिस्पर्धा और विनाश नहीं, बल्कि सहयोग, संतुलन और साझेदारी से होकर गुजरता है।

इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा वैश्विक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ती जंग, ऐसे मोड़ पर हैं जहां भारत अपने संतुलित और संवाद–प्रधान रुख से सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत “युद्ध रोकने और शांति स्थापित करने की दिशा में योगदान दे सकता है”, लेकिन इसके लिए दुनिया को भी अपने मूल्य तय करने होंगे कि वह क्या चाहती है – स्थायी शांति या अंतहीन संघर्ष।

धर्म का असली अर्थ: सिर्फ़ ग्रंथों में नहीं, आचरण में दिखना चाहिए

भागवत ने जोर देकर कहा कि धर्म की अवधारणा सिर्फ़ शास्त्रों और ग्रंथों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि लोगों के रोज़मर्रा के आचरण में दिखनी चाहिए। उनके अनुसार सिर्फ़ प्रवचन, नारे और बड़े-बड़े दावे काफी नहीं हैं; असली धर्म वही है जो इंसान के व्यवहार, ईमानदारी, अनुशासन, करुणा और आत्मसंयम में झलके। उन्होंने माना कि इस तरह का जीवन अपनाना आसान नहीं होता और कई बार व्यक्तिगत त्याग की मांग भी करता है, लेकिन यही स्थायी शांति और संतुलन की कीमत है।

उन्होंने कहा कि अगर धर्म केवल पहचान और पावर स्ट्रगल का औज़ार बन जाएगा, तो वह खुद संघर्ष का कारण बन जाएगा। इसलिए जरूरी है कि धर्म को मूल रूप से “कर्तव्य, संयम और सबके हित” के रूप में समझा जाए, न कि केवल “अधिकार और वर्चस्व” के रूप में।

“दुनिया को युद्ध नहीं, सद्भाव की ज़रूरत है”

भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि आज दुनिया को और युद्धों की नहीं, बल्कि ज्यादा संवाद, आपसी सम्मान और सद्भाव की जरूरत है। उन्होंने कहा कि “युद्ध सिर्फ़ स्वार्थ का नतीजा हैं” और अगर देश अपने-अपने राष्ट्रीय हित को मानवता से ऊपर रखेंगे, तो अंततः पूरी धरती अस्थिरता और विनाश की ओर बढ़ेगी। उनके अनुसार वैश्विक राजनीति में भी “मानव–केंद्रित दृष्टि” की जरूरत है, जहां निर्णय सिर्फ़ संसाधन कब्जाने या वर्चस्व के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखकर लिए जाएं।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे इस समझ की ओर बढ़ रहा है कि सब कुछ आपस में जुड़ा है – पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति। इसलिए किसी भी संघर्ष का असर सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर देता है, जैसा हम आज की जियोपॉलिटिकल हालात में देख रहे हैं।

FAQs (Hindi)

  1. प्रश्न: मोहन भागवत ने वैश्विक संघर्षों की मुख्य वजह क्या बताई?
    उत्तर: उन्होंने कहा कि दुनिया में युद्धों और संघर्षों की मूल वजह स्वार्थी हित और वर्चस्व की चाहत है, यानी लोग और देश दूसरों पर हावी होना चाहते हैं और अपने हित को सर्वोपरि रखते हैं।
  2. प्रश्न: धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण पर उन्होंने क्या कहा?
    उत्तर: भागवत ने कहा कि धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और ऊंच–नीच की भावना आज भी मौजूद हैं और ये सारे फैक्टर मिलकर समाजों और देशों के बीच टकराव को बढ़ाते हैं।
  3. प्रश्न: भारत की भूमिका पर मोहन भागवत का क्या विचार है?
    उत्तर: उन्होंने कहा कि भारत “मानवता के नियम” को मानता है और उसकी प्राचीन सभ्यता यह सिखाती है कि “सब एक हैं”; उनके मुताबिक भारत चल रही जंग जैसे वैश्विक संघर्षों को खत्म करने की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
  4. प्रश्न: धर्म और आचरण के बारे में उन्होंने क्या संदेश दिया?
    उत्तर: भागवत ने कहा कि धर्म ग्रंथों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि लोगों के आचरण में दिखना चाहिए; अनुशासन, नैतिकता और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता ही सच्चे धर्म की पहचान है।
  5. प्रश्न: उन्होंने दुनिया के लिए किस तरह के बदलाव की बात की?
    उत्तर: उन्होंने ज़ोर दिया कि दुनिया को संघर्ष और प्रतियोगिता की सोच से निकलकर सहयोग, सद्भाव और साझी प्रगति की ओर बढ़ना होगा, तभी स्थायी शांति संभव है और युद्धों का सिलसिला थमेगा।

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