पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी ने SIR (Special Intensive Revision) के दौरान कथित “अमानवीय बर्ताव” और मौतों के खिलाफ मंगलवार को अदालत जाने का ऐलान किया। चुनाव आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट रोल में 58 लाख से ज्यादा नाम हटने के बाद मतदाता संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ हो गई है।
SIR को लेकर बंगाल सियासत गरम: ममता का कोर्ट जाने का ऐलान, EC ने 7.66 करोड़ से 7.08 करोड़ कर दी मतदाता संख्या
SIR विवाद क्या है? बंगाल की मतदाता सूची पर बड़ा तूफान
पश्चिम बंगाल में चल रहे SIR यानी Special Intensive Revision of Electoral Rolls को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। दूसरे चरण के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के दौरान लोगों के साथ “अमानवीय व्यवहार” हुआ और कई लोगों की मौतें हुईं। उन्होंने घोषणा की कि उनकी सरकार मंगलवार को अदालत का दरवाजा खटखटाएगी।
चुनाव आयोग ने 16 दिसंबर को पहले चरण के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की थी। उसके मुताबिक, जनवरी 2025 की मतदाता सूची में दर्ज 7.66 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की संख्या घटकर 7.08 करोड़ रह गई, यानी 58 लाख से अधिक नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए गए।
ममता बनर्जी के आरोप: “अमानवीय बर्ताव, मौतें और डर का माहौल”
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में और मीडिया से बात करते हुए SIR प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला। सागर द्वीप (Sagar Island) की जनसभा में उन्होंने कहा कि SIR के चलते “कई लोगों की मौत हो गई और कई अस्पताल में हैं।” उनका आरोप है कि यह एक “अमानवीय” और “मनुष्य विरोधी” अभ्यास बन गया है।
ममता का सबसे गंभीर आरोप यह है कि “टर्मिनली इल (अंतिम अवस्था के बीमार) लोगों को भी वैध मतदाता साबित करने के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है।” उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी बीजेपी नेता के बुजुर्ग माता-पिता को इसी तरह लाइन में खड़ा होना पड़े, तो उन्हें कैसा लगेगा। उनका कहना है कि यह अभ्यास लोगों में भय और अपमान की भावना पैदा कर रहा है।
58 लाख से ज्यादा नाम क्यों हटे? – आधिकारिक आंकड़े
चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), पश्चिम बंगाल के आंकड़ों के अनुसार, SIR के तहत ड्राफ्ट सूची से कुल 58,20,898 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। यह हटाए गए नाम मुख्यतः पांच श्रेणियों में आते हैं:
– मृत मतदाता (Dead): 24,16,852
– स्थायी रूप से स्थानांतरित (Relocated/Shifted): 19,88,076
– लापता/ट्रेस न होने वाले (Missing/Untraceable): 12,20,038
– डुप्लिकेट एंट्री (Duplicate): 1,38,328
– अन्य कारण (Others, जिसमें ‘घोस्ट’ वोटर भी): 57,000+
इन्हीं डिलीशन के बाद मतदाता संख्या 7,66,37,529 से घटकर लगभग 7,08,16,631 के आसपास बताई गई है। आयोग का दावा है कि यह सब “ASDD” यानी Absentee, Shifted, Dead, Duplicate श्रेणी के तहत तकनीकी और फील्ड वेरिफिकेशन पर आधारित है।
ममता का कोर्ट जाने का ऐलान
ममता बनर्जी ने साफ कहा है, “हम SIR की वजह से लोगों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार और मौतों के खिलाफ कल (मंगलवार) अदालत जा रहे हैं।” उनके मुताबिक, जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनमें से कई “वैध मतदाता” हैं जिन्हें बिना उचित कारण के बाहर कर दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया 2026 विधानसभा चुनाव से पहले “वैध मतदाताओं के अधिकार छीनने” और खास समुदायों व गरीबों को डराने की कोशिश है। ममता, SIR को NRC और CAA जैसी कवायद से जोड़ती रही हैं और इसे “क्रूर राजनीतिक एक्सपेरिमेंट” तक कह चुकी हैं।
चुनाव आयोग की सफाई और प्रतिक्रिया
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और बंगाल के CEO कार्यालय ने इन आरोपों को “बेबस, आधारहीन और अधिकारियों को डराने की कोशिश” बताया है। EC ने SIR से जुड़े कुछ मामलों पर CEC और CEO के खिलाफ दर्ज शिकायतों को खारिज करते हुए कहा कि यह “पूर्व नियोजित और मनगढ़ंत आरोप” हैं।
विशेष रोल ऑब्जर्वर और EC अधिकारियों का कहना है कि:
– 2002 की मतदाता सूची और 2025 की सूची के मैपिंग के आधार पर डिलीशन और वेरिफिकेशन किया गया।
– जिन 1.3 लाख मतदाताओं के नाम 2002 की फिजिकल लिस्ट में थे लेकिन ऑनलाइन डेटाबेस में तकनीकी गड़बड़ी से नहीं दिख रहे थे, उनके लिए बाद में राहत नोटिस जारी कर सुनवाई से छूट दी गई।
– SIR का उद्देश्य 2026 चुनाव से पहले “फॉल्टलेस” वोटर रोल तैयार करना है।
SIR के दौरान मौतों और आत्महत्याओं के आरोप
कई मीडिया रिपोर्टों और विपक्षी आरोपों के मुताबिक, SIR नोटिस और सुनवाई के दबाव के बीच कुछ बुजुर्गों और कमजोर वर्ग के लोगों की मौत या कथित आत्महत्या के मामले सामने आए हैं।
– पुरुलिया और तमलुक जैसे क्षेत्रों में दो बुजुर्ग मतदाताओं की मौत के बाद उनके परिजनों ने CEC और CEO के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की, आरोप लगाते हुए कि नोटिस और सुनवाई के तनाव से उनकी तबीयत बिगड़ी।
– एक BLO (Booth Level Officer) की मौत के बाद ममता ने पहले भी ECI को पत्र लिखकर “अमानवीय वर्कलोड” और “फील्ड वर्कर्स पर बेतुका दबाव” का आरोप लगाया था।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन घटनाओं को SIR प्रक्रिया से सीधे जोड़ने से इनकार किया है और कहा कि तथ्यों की गलत व्याख्या कर अधिकारियों को “बुली” किया जा रहा है।
सियासी आरोप–प्रत्यारोप: TMC बनाम BJP–EC
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि SIR के नाम पर बंगाल के मतदाताओं, खासकर गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और बंगाली भाषी मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है। वे इसे “डर और असुरक्षा फैलाने वाला अभ्यास” बताते हैं।
BJP और EC पक्ष से तर्क दिया जा रहा है कि:
– बड़ी संख्या में मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट वोटर नाम हटाना आवश्यक है।
– SIR राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी पारदर्शिता के लिए जरूरी है।
– जिन वास्तविक मतदाताओं के नाम गलती से कट गए हैं, उनके लिए क्लेम और ऑब्जेक्शन की विंडो खुली है और वे दस्तावेज देकर नाम वापस जुड़वा सकते हैं।
SIR क्या है और कैसे चल रहा है?
Special Intensive Revision (SIR) चुनाव आयोग द्वारा समय–समय पर चलाया जाने वाला विशेष अभियान है, जिसमें:
– घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए जाते हैं।
– पुराने डेटा से तुलना कर मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट नाम हटाए जाते हैं।
– नए 18+ मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं।
बंगाल में यह प्रक्रिया 4 नवंबर से 11 दिसंबर तक चली। 16 दिसंबर को ड्राफ्ट रोल जारी हुआ, अब क्लेम–ऑब्जेक्शन का चरण चल रहा है।
मतदाताओं के लिए क्या करना जरूरी है?
- अपना नाम ड्राफ्ट रोल में चेक करें
– CEO, West Bengal की वेबसाइट या ECI पोर्टल पर जाएं।
– वोटर आईडी या नाम–जन्मतिथि से सर्च कर देखें कि नाम मौजूद है या नहीं। - नाम कट गया हो तो क्लेम/ऑब्जेक्शन दर्ज करें
– संबंधित फॉर्म (जैसे Form-6, 6B, 7, 8) भरकर ऑनलाइन या बूथ लेवल ऑफिसर के पास जमा करें।
– आधार, राशन कार्ड, बिजली बिल, जन्मतिथि और पते के प्रमाण जैसे डॉक्यूमेंट तैयार रखें। - बुजुर्ग और बीमार के लिए विशेष ध्यान
– ममता की शिकायतों को देखते हुए EC ने 2002 रोल में मौजूद लेकिन डेटाबेस से गायब 1.3 लाख लोगों को सुनवाई से छूट जैसे कदम उठाए हैं।
– परिवारजनों को चाहिए कि टर्मिनली इल या बहुत बुजुर्ग व्यक्तियों के मामलों में स्थानीय BLO और SDM से मानवीय व्यवस्था की मांग करें।
आगे की कानूनी जंग: क्या हो सकता है?
ममता बनर्जी की याचिका में संभव है कि:
– SIR प्रक्रिया के कुछ हिस्सों पर रोक या संशोधन की मांग की जाए।
– बुजुर्ग, विकलांग और टर्मिनली इल व्यक्तियों के लिए विशेष प्रोटोकॉल की मांग की जाए।
– SIR से जुड़ी मौतों/आत्महत्याओं की हाई-लेवल जांच की मांग की जाए।
कोर्ट में बहस EC के अधिकार, नागरिकों के मतदान अधिकार (Right to Vote), मानवाधिकार और प्रशासनिक प्रक्रिया की “मानवीयता” के बीच संतुलन पर केंद्रित हो सकती है। नतीजा जो भी हो, 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले SIR पूरी राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेगा।
5 FAQs
- ममता बनर्जी SIR के खिलाफ कोर्ट क्यों जा रही हैं?
उनका आरोप है कि SIR प्रक्रिया के दौरान लोगों के साथ “अमानवीय व्यवहार” हुआ, कतारों में खड़े रहने के दबाव और डर से कई मौतें व अस्पताल में भर्ती के मामले सामने आए और वैध मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से काटे गए। - SIR के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता संख्या में क्या बदलाव आया?
ड्राफ्ट रोल के अनुसार, मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ हो गई, यानी 58 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। - 58 लाख नाम किस आधार पर हटाए गए?
चुनाव आयोग के अनुसार, इनमें लगभग 24.16 लाख मृत, 19.88 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित, 12.20 लाख लापता/ट्रेस न होने वाले, 1.38 लाख डुप्लिकेट और 57,000 से अधिक अन्य कारणों वाले मतदाता शामिल हैं। - चुनाव आयोग ममता के आरोपों पर क्या कह रहा है?
EC ने इन आरोपों को “पूर्व नियोजित, आधारहीन और अधिकारियों को डराने की कोशिश” बताया है और कहा है कि SIR का मकसद 2026 चुनाव से पहले एक अधिक शुद्ध और त्रुटिरहित मतदाता सूची तैयार करना है। - जिन लोगों के नाम कट गए हैं, वे क्या कर सकते हैं?
वे वोटर लिस्ट ऑनलाइन या ऑफलाइन चेक कर क्लेम–ऑब्जेक्शन विंडो में फॉर्म और दस्तावेज जमा करके पुनः नाम जुड़वाने की कोशिश कर सकते हैं; इसके लिए चुनाव आयोग ने पोर्टल और बूथ लेवल ऑफिसर दोनों के माध्यम दिए हैं।
Leave a comment