आज पूरे देश में राधा अष्टमी का पर्व जोर-शोर से मनाया जा रहा हैं
364 दिन के इंतजार के बाद 1 दिन होंगे राधा रानी के दर्शन
वृंदावन के बाद देश में एकमात्र ऐसा मंदिर
विदिशा में भी हैं राधा रानी का ऐतिहासिक मंदिर
विदिशा (मप्र) : विदिशा के नंदवाना स्थित श्री राधा रानी का मंदिर है और आज पूरे देश में राधा अष्टमी का पर्व जोर-शोर से मनाया जा रहा है। विदिशा का ऐतिहासिक मंदिर की खासियत है कि मंदिर के पट वर्ष में सिर्फ एक बार ही खुलते हैं बाकी वर्षभर मंदिर की गुप्त पुजारी मंदिर के अंदर ही पूजा करते हैं।
राधा रानी का अनूठा मंदिर है। यह मंदिर करीब 400 साल पुराना है और इसके पट सिर्फ राधा अष्टमी को एक दिन के लिए खोले जाते हैं।अन्य दिनों में यहां पुजारी गुप्त तरीके से पूजा करते हैं।
आज राधा अष्टमी के मौके पर सुबह 5 बजे कुछ समय के लिए पट खोले गए और मंगला आरती का आयोजन हुआ।इसके बाद आज दोपहर 12 बजे श्रद्धालुओं के लिए दिनभर पट खोले जाएंगे हजारों की संख्या में श्रद्धालु राधे रानी के दर्शन करने के लिए पहुंचेंगे।
राधा अष्टमी पर जैसे वृंदावन में लाडली जी का प्राकट्योत्सव मनाया जा रहा है, वैसा ही नजारा विदिशा के इस मंदिर में भी देखने को मिल रहा है।राधा रानी का यह मंदिर करीब 400 वर्ष पुराना है इस मंदिर के पट साल में एक बार सिर्फ राधा अष्टमी के दिन खुलते हैं अन्य दिनों में यहां के पुजारी गुप्त रूप लाडली जी की पूजा करते हैं।
विदिशा शहर के इस राधे रानी के मंदिर में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, मंत्री प्रहलाद पटेल, केंद्रीय मंत्री और विदिशा सांसद शिवराज सिंह चौहान समेत कई, सरकारी अधिकारी, न्यायाधीश भी दर्शन करने आ तचके हैं।
पुजारी मनमोहन शर्मा महाराज का कहना है कि जैसे वृंदावन में राधा रानी की पूजा की जाती है, वैसे ही पूजा विदिशा के इस राधा मंदिर में भी होती है। मौसम और समय के अनुसार, उनको संपादित किया जाता है, जैसे वृंदावन में वैष्णव संप्रदाय पूजा करते हैं इस परंपरा से भी यहां भी पूजा की जाती है।
श्रीराधा जी का जो यहां मंदिर है भारतवर्ष में राधा जी के दो ही मंदिर ऐसे हैं। एक मथुरा के बरसाना धाम में है और दूसरा जो वृंदावन में स्थित है।सन् 1670 के पूर्व मुगलों ने आक्रमण कर उस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। तब वहां से स्वामी परिवार ने निधियों को लाकर यहां स्थापित कर दिया उस समय विदिशा की जो नगरीय स्थिति थी वो ऐसी नहीं थी, केवल एक छोटी सी बस्ती थी और चारों तरफ जंगल था इसके बाद स्वामी परिवार ने एक अलह झोपड़ी बनाकर यहां पूजा का क्रम जारी रखा।
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