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“मिया मज़दूर नहीं, असमिया क्यों नहीं?” हिमंत बिस्वा सरमा के विवादित बयान का सच

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असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने PWD ठेकेदारों से ‘मिया मुस्लिम’ मज़दूरों की जगह लोकल असमिया कामगार रखने की अपील की और खुलेआम कहा “मियाओं को परेशान करो”। बयान, राजनीति, रोज़गार, कानून और सामाजिक तनाव के असर को आसान भाषा में समझिए।

क्या असम में अब लोकल बनाम ‘मिया मुस्लिम’ की लड़ाई होगी? सीएम हिमंत के नए कमेंट से बवाल

असम में फिर बढ़ा विवाद: ‘मिया मज़दूर’ पर हिमंत का निशाना, लोकल मज़दूरों को तरजीह की अपील

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा एक बार फिर अपने बयान की वजह से सुर्खियों में हैं। इस बार मुद्दा है – मज़दूरी और रोज़गार, लेकिन भाषा और टारगेट की वजह से मामला सीधा–सीधा कम्युनिटी पर निशाना जैसा लग रहा है। सीएम ने पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) के ठेकेदारों से कहा कि वे धुबरी और लोअर असम के “मिया मुस्लिम” मज़दूरों की बजाय लोकल असमिया कामगारों को ज़्यादा काम दें।

सरकार की दलील है कि असम के बुनियादी ढांचे का निर्माण असमिया हाथों से होना चाहिए, इसी से लोकल कम्युनिटी की आर्थिक स्थिरता बढ़ेगी। लेकिन जब इसी तर्क के साथ “मियाओं को किसी भी तरह परेशान करो, ताकि वो असम छोड़कर चले जाएं” जैसे वाक्य जुड़ जाते हैं, तो बहस सिर्फ़ रोजगार तक सीमित नहीं रहती, सीधे नफरत और ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ जाती है।

लचित से लेकर बोगीबील ब्रिज तक – हिमंत का ‘असमिया क्षमता’ वाला नैरेटिव

हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने बयान में असम के इतिहास और गौरव की बात छेड़ते हुए कहा कि अगर अहोम सेनापति लचित बरफुकन ने सराइघाट की लड़ाई जीती थी, तो “एक असमिया मज़दूर पुल क्यों नहीं बना सकता?” उनकी दलील यह थी कि मानसिकता बदलने की ज़रूरत है, ताकि लोकल लोग खुद को बड़े–बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सक्षम मान सकें।

उन्होंने बोगीबील ब्रिज का उदाहरण दिया, जो ब्रह्मपुत्र पर बना एक अहम पुल है। सरमा के मुताबिक, “बोगीबील ब्रिज के टेक्निकल काम लोकल मिसिंग कम्युनिटी के वर्कर्स ने किया। पूरा काम हमारे लोकल मिसिंग मज़दूरों ने संभाला।” इस स्टेटमेंट के ज़रिए वे यह दिखाना चाहते हैं कि असम के अंदर ही ऐसी कम्युनिटीज़ हैं जो हाई–स्किल्ड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी बढ़िया काम कर सकती हैं।

साथ ही, उन्होंने जगIROAD में चल रहे सेमीकंडक्टर यूनिट का उदाहरण भी दिया और कहा कि वहाँ भी कई असमिया वर्कर्स काम कर रहे हैं। यानी मैसेज यह दिया जा रहा है कि असमिया युवाओं और मज़दूरों में तकनीकी क्षमता की कमी नहीं है, बस उन्हें मौका और ट्रेनिंग की ज़रूरत है।

धुबरी और लोअर असम के मज़दूरों पर निशाना

असल विवाद की जड़ तब गहरी हुई, जब सीएम ने साफ़ तौर पर यह कहा कि ठेकेदारों को धुबरी और लोअर असम के मज़दूरों की जगह लोकल वर्कर्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।

असम की ज़मीन पर “मिया मुस्लिम” शब्द आमतौर पर उन मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होता है जिनकी जड़ें बांग्लादेश से आए प्रवासियों से जोड़ी जाती हैं। इनमें से कई दशकों से असम में रह रहे हैं, वोटर लिस्ट में हैं, किसान या मज़दूर के तौर पर काम करते हैं। धुबरी, बारपेटा, गोलपारा जैसे जिलों से बड़ी संख्या में ये मजदूर पूरे असम में कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करते हैं।

इंडस्ट्री के जानकार लंबे समय से बताते आए हैं कि:

– ये मज़दूर आम तौर पर लोकल मज़दूरों के मुकाबले कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार रहते हैं
– ठेकेदारों के लिए ये सस्ता और लगातार उपलब्ध लेबर सोर्स बन गए हैं
– बहुत से लोकल युवाओं को ये लगता है कि वे कम रेट की वजह से मज़दूरी के मार्केट से बाहर हो रहे हैं

हिमंत के बयान का एक हिस्सा इसी आर्थिक हकीकत पर टिका है – वे ठेकेदारों से कह रहे हैं कि सिर्फ़ सस्ते लेबर के चक्कर में लोकल कामगारों को इग्नोर मत करो, उन्हें भी मौका दो और ट्रेनिंग देकर उन्हें तैयार करो।

सरकार की लाइन: “लोकल रोजगार” का एजेंडा

सरमा ने कहा कि वे चाहते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के ज़रिए असमिया कम्युनिटी की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो। यानी रोड–ब्रिज–बिल्डिंग जैसे प्रोजेक्ट्स में अगर ज़्यादातर मज़दूर भी लोकल होंगे, तो प्रोजेक्ट का पैसा असम के घर–परिवारों में ही घूमेगा, बाहर नहीं जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस बात पर सीरियसली काम कर रही है कि बाहर से कामगारों पर निर्भरता कम हो। इसके लिए लोकल वर्कर्स को स्किल ट्रेनिंग, अपस्किलिंग और प्रोजेक्ट में एंट्री दिलाने की कोशिश की जा रही है।

इस तरह देखें तो, “लोकल रोज़गार” की लाइन अपने आप में कोई नई नहीं है – दुनिया के कई इलाकों में लोकल बनाम माइग्रेंट लेबर की बहस चलती रहती है। लेकिन असम के सामाजिक–राजनीतिक संदर्भ में बात सिर्फ़ आर्थिक नहीं रहती, तुरंत पहचान, धर्म और बांग्लादेशी–इमिग्रेशन के पुराने मुद्दों से जुड़ जाती है।

“मियाओं को परेशान करो” – बयान से बढ़ता नफरत का एंगल

सबसे विवादित और खतरनाक हिस्सा वह है, जहाँ सीएम कहते हैं – “मिया मुसलमानों को किसी भी तरह परेशान करो। अगर उन्हें दिक्कत होगी, तो वो असम छोड़कर चले जाएंगे। अगर मुझे किसी मिया को परेशान करना हो, तो मैं रात 12 बजे चला जाता हूँ, कोई दिक्कत नहीं। हम उनके खिलाफ़ हैं और इसे छिपा भी नहीं रहे।”

ऐसे वाक्य सिर्फ़ राजनीतिक तंज नहीं रह जाते, बल्कि आम लोगों के लिए एक तरह का ‘संकेत’ बन जाते हैं कि एक खास समुदाय के साथ रोज़मर्रा के स्तर पर भी दुश्मन जैसा व्यवहार करो।

इस तरह का बयान:

– सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है
– मज़हबी या जातीय हिंसा की ज़मीन तैयार कर सकता है
– कानून–व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है
– और सबसे अहम, राज्य के मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद के अनुरूप नहीं लगता

भारत का संविधान किसी भी नागरिक के लिए बराबरी, गरिमा और कानून की नज़र में समान सुरक्षा की गारंटी देता है। किसी भी कलेक्टिव के खिलाफ़ खुलकर “परेशान करो, ताकि वो चले जाएं” कहना लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों से टकराता है।

कांग्रेस और गौरव गोगोई पर सीधा हमला

इसी प्रेस इंटरैक्शन के दौरान हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस और खासकर असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई पर भी सीधा पर्सनल अटैक किया। उन्होंने गोगोई को “पाकिस्तानी एजेंट” बताया और कांग्रेस को खुली चुनौती दी कि अगर उनमें हिम्मत है तो उनके ख़िलाफ़ केस फ़ाइल करें, वे कोर्ट में उसका सामना करेंगे।

यह बयान असम की राजनीति में चल रहे तीखे टकराव का हिस्सा है, जहाँ बीजेपी और कांग्रेस दोनों रोज़ाना एक–दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप लगा रहे हैं। लेकिन जब “पाकिस्तानी एजेंट” जैसे शब्द बार–बार दोहराए जाते हैं, तो यह सिर्फ़ एक पॉलिटिकल टैगलाइन से बढ़कर देश–विरोधी ठहराने वाली खतरनाक भाषा में बदल जाता है।

मज़दूरी का आर्थिक सच: ठेकेदार सस्ता मज़दूर क्यों चुनते हैं?

अगर राजनीति की परत थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, तो ग्राउंड रियलिटी यह है कि कंस्ट्रक्शन सेक्टर में ठेकेदार वही लेबर ग्रुप चुनते हैं जो:

– कम रेट पर काम करे
– लगातार उपलब्ध रहे
– साइट से साइट आसानी से मूव हो सके
– और काम के प्रति अनुशासन और नेटवर्क रखता हो

धुबरी और लोअर असम के बहुत से मज़दूर परिवार पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं। वे ग्रुप में आते हैं, लंबे कॉन्ट्रैक्ट्स पर रहते हैं और अक्सर लोकल युवाओं से कम दिहाड़ी पर काम कर लेते हैं। इससे उन्हें नुकसान नहीं, बल्कि लगातार काम मिलने का भरोसा मिलता है।

लोकल असमिया युवाओं के सामने दूसरी चुनौतियाँ हैं – कुछ पढ़ाई के बाद दिहाड़ी मज़दूरी से कतराते हैं, कुछ को स्किल ट्रेनिंग की कमी है, कुछ को रूटीन और जगह–बदलाव वाली जॉब पसंद नहीं आती।

अगर सरकार वाकई लोकल लेबर को बढ़ाना चाहती है, तो उसे:

– स्किल ट्रेनिंग
– मिनिमम वेज की सख़्ती से पालन
– लोकल लेबर रजिस्टर और पोर्टल
– ठेकेदारों पर लोकल हायरिंग का कुछ प्रतिशत अनिवार्य करना (कानूनी दायरे में)

जैसे कदमों पर फोकस करना होगा, सिर्फ़ किसी एक कम्युनिटी के खिलाफ़ नफरत भरे बयान काफी नहीं हैं।

लोकल बनाम माइग्रेंट – राजनीति का क्लासिक फार्मूला

दुनिया भर में नेता अकसर “लोकल बनाम बाहरी” नैरेटिव के ज़रिए वोटर को इमोशनली जकड़ने की कोशिश करते हैं। असम के मामले में “बांग्लादेशी घुसपैठिया”, “मिया मुसलमान”, “लोकल असमिया” जैसे शब्द कई दशक से राजनीति का हिस्सा रहे हैं।

हिमंत बिस्वा सरमा खुद भी पिछले कुछ सालों में अपनी पॉलिटिक्स में इस टोन को ज़्यादा आक्रामक बना चुके हैं – NRC, CAA, मिया म्यूज़ियम, बुलडोज़र ऐक्शन जैसे कई मुद्दों पर उनका स्टैंड साफ़ तौर पर पोलराइज़ेशन की तरफ जाता दिखा है।

अब जब चुनावी मौसम नज़दीक है, “मिया मज़दूर” बनाम “असमिया मजदूर” की लाइन उसी बड़े नैरेटिव का एक्सटेंशन लगती है, जहाँ एक ग्रुप को ‘आर्थिक दुश्मन’ और ‘डेमोग्राफिक थ्रेट’ दोनों रूप में प्रोजेक्ट किया जाता है।

कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी – मुख्यमंत्री की भूमिका क्या होनी चाहिए?

किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री सिर्फ़ एक पार्टी लीडर नहीं, बल्कि संवैधानिक पदधारी होता है, जो राज्य के हर नागरिक – धर्म, भाषा, जाति, इलाका चाहे कोई भी हो – का प्रतिनिधि माना जाता है।

इस लिहाज़ से देखें तो:

– लोकल रोजगार बढ़ाने की बात करना बिल्कुल जायज़ और जरूरी है
– लेकिन किसी भी कम्युनिटी के लिए “परेशान करो, रात 12 बजे जाकर तंग करता हूँ” जैसी भाषा न सिर्फ़ नैतिक तौर पर गलत है, बल्कि इसे गलत तरीके से लेने वाले लोग भी हिंसा या हेट क्राइम की तरफ उकस सकते हैं
– अगर समाज में पहले से तनाव हो और सत्ता–शीर्ष से ऐसे संकेत मिलें, तो छोटे–बड़े स्तर पर टकराव, बदज़ुबानी, बहिष्कार या हिंसा के मामले उभर सकते हैं

इसलिए एक ज़िम्मेदार पॉलिटिक्स की ज़रूरत है, जहाँ सरकार लोकल युवाओं के रोजगार, स्किल डेवलपमेंट और मज़दूरी के बेहतर मानकों पर फोकस करे, लेकिन किसी भी कम्युनिटी को टारगेट बनाकर पब्लिक शेमिंग या उकसावे वाली भाषा से बचे।

असम के लिए आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

असम की हकीकत यह है कि:

– यहां लोकल बेरोज़गारी भी एक बड़ा मुद्दा है
– और माइग्रेंट या ‘मिया’ कम्युनिटी भी अब दशकों से राज्य की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है – खेती से लेकर निर्माण तक

ऐसे में बेहतर रास्ता यही है कि:

  1. लोकल असमिया युवाओं के लिए स्किल–बेस्ड प्रोग्राम्स, इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग और ऑन–द–जॉब लर्निंग की मजबूत व्यवस्था बने, ताकि वे कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्निकल फील्ड में खुद को कॉम्पिटिटिव बना सकें।
  2. ठेकेदारों के लिए क्लियर और ट्रांसपेरेंट गाइडलाइन बने – जैसे किसी भी बड़े प्रोजेक्ट में कम से कम अमुक प्रतिशत लेबर लोकल क्षेत्र से हो, लेकिन यह सब कानून, रोजगार नीतियों और वर्कर्स के अधिकारों के दायरे में हो।
  3. किसी भी कम्युनिटी को “घुसपैठिया” या “दुश्मन” की भाषा में पब्लिकली ट्रीट करने के बजाय, अगर लीगल स्टेटस पर सवाल हैं तो वो प्रक्रियाओं – कोर्ट, ट्रिब्यूनल, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन – के ज़रिए सुलझाए जाएं, न कि भीड़ के मूड के हवाले किए जाएं।
  4. मजदूर चाहे लोकल हो या माइग्रेंट, उसके लिए सेफ वर्क कंडीशन्स, टाइम पर पेमेंट और शोषण से सुरक्षा की गारंटी दी जाए – यही असल “प्रो–वर्कर” नीति होगी।

निष्कर्ष

हिमंत बिस्वा सरमा का ताज़ा बयान दो हिस्सों में बंटा दिखता है – एक तरफ लोकल असमिया मजदूरों के लिए रोज़गार और सम्मान की बात, दूसरी तरफ “मिया मुसलमानों” के लिए खुलेआम नफरत और “परेशान करने” की अपील।

पहला हिस्सा एक वैध आर्थिक–सामाजिक बहस है, जिस पर शांत दिमाग से पॉलिसी बन सकती है: ट्रेनिंग, लोकल कोटा, बेहतर वेजेज़, इंडस्ट्री–एकेडेमिया टाई–अप्स।

लेकिन दूसरा हिस्सा – जो एक पूरी कम्युनिटी को टारगेट करता है – न सिर्फ़ संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ़ जाता है, बल्कि समाज में अविश्वास, डर और टकराव भी बढ़ा सकता है। राजनीति अगर रोज़गार के नाम पर नफरत को पैकेज कर दे, तो नुक़सान आम लोगों और वर्किंग क्लास का ही ज़्यादा होता है – चाहे वो असमिया हो या मिया।

असम जैसे संवेदनशील और विविध राज्य के लिए ज़रूरी है कि स्थानीय रोजगार की लड़ाई, नफरत की राजनीति से अलग रखी जाए। नहीं तो पुल बनाने की जगह हम सिर्फ़ दीवारें ही ऊंची करते रह जाएंगे।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: हिमंत बिस्वा सरमा ने मज़दूरों को लेकर क्या बयान दिया?
उत्तर: असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने PWD ठेकेदारों से कहा कि वे धुबरी और लोअर असम के “मिया मुस्लिम” मज़दूरों की जगह लोकल असमिया वर्कर्स को ज़्यादा काम दें। साथ ही उन्होंने कहा कि वे लोकल मज़दूरों को ट्रेनिंग देकर बड़े–बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल करना चाहते हैं।

प्रश्न 2: ‘मिया मुसलमान’ शब्द से किस कम्युनिटी की तरफ इशारा होता है?
उत्तर: असम की राजनीति और समाज में “मिया मुसलमान” शब्द आम तौर पर उन मुस्लिम कम्युनिटीज़ के लिए इस्तेमाल होता है जिनकी जड़ें बांग्लादेश से आए प्रवासियों से जोड़ी जाती हैं। इनमें से बहुत लोग असम के नागरिक हैं, वोटर हैं और खेती या मज़दूरी में काम करते हैं, लेकिन राजनीतिक भाषणों में उन्हें अक्सर “अवैध घुसपैठिया” के तौर पर भी पेश किया जाता है।

प्रश्न 3: विवादित हिस्सा कौन–सा बयान है?
उत्तर: सबसे विवादित हिस्सा वह है जिसमें हिमंत बिस्वा सरमा कहते हैं कि “मिया मुसलमानों को किसी भी तरह परेशान करो, अगर उन्हें दिक्कत होगी तो वे असम छोड़कर चले जाएंगे… हम सीधे उनके खिलाफ़ हैं।” इस तरह की भाषा को कई लोग नफरत और हिंसा के लिए उकसाने वाला बयान मान रहे हैं।

प्रश्न 4: ठेकेदार ‘मिया’ मज़दूरों को ज़्यादा क्यों रखते हैं?
उत्तर: धुबरी और लोअर असम के बहुत से मज़दूर परिवार लंबे समय से कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम कर रहे हैं। वे आम तौर पर लोकल मज़दूरों की तुलना में कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार रहते हैं, ग्रुप में काम करते हैं और लगातार उपलब्ध रहते हैं। ठेकेदारों के लिए यह सस्ता और भरोसेमंद लेबर सोर्स बन जाता है, इसी वजह से उन्हें प्राथमिकता दी जाती है।

प्रश्न 5: लोकल असमिया मज़दूरों को कैसे फायदा हो सकता है, बिना नफरत बढ़ाए?
उत्तर: अगर सरकार सच में लोकल रोजगार बढ़ाना चाहती है, तो उसे स्किल ट्रेनिंग, लोकल हायरिंग कोटा, बेहतर वेजेज़, लेबर लॉ के सख्त पालन, और पारदर्शी प्रोक्योरमेंट जैसी नीतियों पर काम करना होगा। इससे लोकल युवाओं को भी मौका मिलेगा और किसी भी कम्युनिटी के खिलाफ़ नफरत फैलाए बिना आर्थिक संतुलन हासिल किया जा सकेगा।

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