अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया एग्जीक्यूटिव ऑर्डर साइन कर उन सभी देशों पर अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी है जो सीधे या परोक्ष रूप से क्यूबा को तेल बेचते हैं। इस कदम से मेक्सिको, वेनेज़ुएला और रूस जैसे सप्लायर देशों पर दबाव, क्यूबा की पहले से खराब ऊर्जा संकट पर असर, अंतरराष्ट्रीय कानून, ट्रेड वार और भारत जैसे देशों के लिए इसके मायने – सब कुछ सरल भाषा में समझिए।
क्या क्यूबा की अर्थव्यवस्था अब सच में ‘फेल’ होगी? ट्रंप के नए टैरिफ ऑर्डर का पूरा खेल
ट्रंप का नया टैरिफ ऑर्डर: क्यूबा को तेल बेचने वाले देशों पर सीधा दबाव
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया एग्जीक्यूटिव ऑर्डर साइन करके फिर से इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में हलचल मचा दी है। इस बार निशाने पर सीधे क्यूबा नहीं, बल्कि वो सारे देश हैं जो क्यूबा को तेल बेचते या सप्लाई करते हैं। ऑर्डर के मुताबिक, ऐसे किसी भी देश से आने वाले सामान पर अमेरिका अतिरिक्त “ad valorem” ड्यूटी, यानी वैल्यू के हिसाब से एक्स्ट्रा टैरिफ लगा सकता है।
सिंपल भाषा में कहें तो मैसेज साफ है – अगर आप क्यूबा को तेल भेजेंगे, तो आपके प्रॉडक्ट्स पर अमेरिका में ज़्यादा टैक्स लगेगा। ये कदम ऐसे समय में आया है जब क्यूबा पहले से ही गंभीर फ्यूल शॉर्टेज, ब्लैकआउट्स और आर्थिक संकट से जूझ रहा है और अब वेनेज़ुएला के तेल पर भी उसकी पकड़ कमजोर हो चुकी है।
ट्रंप प्रशासन ने इस ऑर्डर को एक तरह की “राष्ट्रीय आपात स्थिति” से जोड़ा है और कहा है कि क्यूबा की सरकार की नीतियां, प्रैक्टिस और “दुश्मन देशों और आतंकी संगठनों” से रिश्ते, अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के लिए “असामान्य और असाधारण खतरा” हैं।
यह पूरा मामला सुनने में भले ही दूर का लगे, लेकिन इसका असर दुनिया की तेल–राजनीति, लैटिन अमेरिका के पावर बैलेंस और ग्लोबल ट्रेड डायनामिक्स पर पड़ सकता है। आइए इसे आसान भाषा में, पॉइंट–टू–पॉइंट समझते हैं।
एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में लिखा क्या है?
व्हाइट हाउस से जारी इस ऑर्डर में मुख्य बात यह है कि अमेरिका एक ऐसा टैरिफ सिस्टम बना रहा है जिसके तहत:
- किसी भी दूसरे देश के प्रॉडक्ट्स, जो अमेरिका में इम्पोर्ट होते हैं,
- अगर वो देश सीधे या इंडायरेक्ट्ली क्यूबा को तेल बेचता या उपलब्ध कराता है,
- तो उन प्रॉडक्ट्स पर अतिरिक्त ad valorem ड्यूटी लगाई जा सकती है।
“ad valorem” का मतलब होता है – सामान की कीमत के प्रतिशत के रूप में टैक्स। उदाहरण के लिए, अगर किसी प्रॉडक्ट पर 10% ad valorem ड्यूटी लगती है और उसकी कीमत 100 डॉलर है, तो 10 डॉलर एक्स्ट्रा टैक्स देना होगा।
ऑर्डर के ढांचे के मुताबिक:
- पहले अमेरिकी कॉमर्स सेक्रेटरी यह तय करेंगे कि कौन–सा देश क्यूबा को तेल सप्लाई कर रहा है (चाहे सीधे टैंकर के ज़रिए या किसी तीसरे देश के माध्यम से)।
- फिर स्टेट सेक्रेटरी, ट्रेज़री, होमलैंड सिक्योरिटी और यूएस ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव से कंसल्ट करके ये रिकमेंड करेंगे कि किस देश पर कितने प्रतिशत एक्स्ट्रा ड्यूटी लगाई जाए।
- आख़िर में राष्ट्रपति खुद डिसाइड करेंगे कि कितने स्तर तक टैरिफ लगाना है और किन प्रॉडक्ट्स पर लागू करना है।
यानी यह कोई ऑटोमेटिक पनिशमेंट नहीं, बल्कि केस–बाय–केस टूल है जिसे व्हाइट हाउस ज़रूरत के हिसाब से अलग–अलग देशों पर लागू कर सकता है।
क्यूबा पर इतना ज़्यादा फोकस क्यों?
क्यूबा और अमेरिका के रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। 1962 से क्यूबा पर अमेरिकी एम्बार्गो लगा हुआ है, जिसने उसकी इकोनॉमी को काफी हद तक अलग–थलग कर दिया। ओबामा के दौर में थोडा नरमी आई थी, लेकिन ट्रंप ने आते ही फिर से टफ लाइन ले ली थी।
ताज़ा दौर में दो अहम बातें हुई हैं:
- अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को एक सैन्य ऑपरेशन में पकड़कर सत्ता से बेदखल कर दिया, और उसके तेल सेक्टर पर भारी पकड़ बना ली। वेनेज़ुएला कई सालों तक क्यूबा के लिए सब्सिडाइज़्ड ऑयल का मुख्य स्रोत रहा था।
- वेनेज़ुएला की सप्लाई टूटने के बाद क्यूबा को तेल के लिए दूसरे स्रोत खोजने पड़े – और यहां मेक्सिको, रूस जैसे देशों की भूमिका बढ़ गई।
ट्रंप ने हाल में यह तक कह दिया कि “क्यूबा जल्दी ही फेल होने वाला है”, क्योंकि अब न वेनेज़ुएला का तेल है, न उतनी फाइनेंसिंग।
क्यूबन राष्ट्रपति मिगेल दियाज़–कनेल ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अमेरिका को “नैतिक अधिकार नहीं है” कि वह क्यूबा पर किसी तरह की डील थोपे। उन्होंने कहा, क्यूबा दशकों से अमेरिकी एम्बार्गो झेल रहा है, फिर भी खड़ा है, और रिश्ते सिर्फ इंटरनेशनल लॉ पर आधारित होने चाहिए, न कि धमकियों और आर्थिक मजबूरियों पर।
क्यूबा की मौजूदा समस्या यह है कि उसके पास अपने तेल उत्पादन की क्षमता बहुत सीमित है, जबकि पावर ग्रिड और ट्रांसपोर्ट सिस्टम को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में इम्पोर्टेड फ्यूल चाहिए। पहले वेनेज़ुएला मदद करता था, अब खाली जगह धीरे–धीरे मेक्सिको और कुछ हद तक रूस ने भरी है।
तेल सप्लाई की रियल तस्वीर: कौन कितना दे रहा है?
2025 तक आने–आने की डेटा रिपोर्ट्स से एक दिलचस्प बदलाव सामने आया:
- मेक्सिको ने 2025 में औसतन करीब 12,284 बैरल प्रति दिन क्यूबा को तेल भेजा – जो क्यूबा की क्रूड इम्पोर्ट्स का लगभग 44% हिस्सा था।
- वेनेज़ुएला, जो पहले नंबर–वन सप्लायर था, 2025 में लगभग 9,528 बैरल प्रति दिन तक गिर गया, जो कुल इम्पोर्ट्स का 34% के आसपास है – यानी 2023 की तुलना में करीब 63% की भारी गिरावट।
- रूस तीसरे स्थान पर, अपेक्षाकृत कम मात्रा के साथ, लेकिन फिर भी क्यूबा के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर।
मेक्सिको के सरकारी ऑयल कंपनी PEMEX ने 2023–2024 के बीच लगभग 10 मिलियन बैरल तक तेल और रिफाइंड प्रॉडक्ट्स क्यूबा को भेजे, जिसकी वैल्यू लगभग 869 मिलियन डॉलर बताई गई।
मेक्सिको की नई राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाउम कह चुकी हैं कि:
- “हम ऐतिहासिक रूप से जितना भेजते रहे हैं, उससे ज़्यादा नहीं भेज रहे।”
- “वेनेज़ुएला की मौजूदा स्थिति के चलते मेक्सिको स्वाभाविक रूप से एक अहम सप्लायर बन गया है।”
लेकिन अमेरिकी नज़र में यह सब सिर्फ “मानवीय मदद” नहीं, बल्कि उसकी क्यूबा–नीति के खिलाफ़ एक तरह की चैलेंज की तरह दिख रहा है।
ट्रंप के ऑर्डर का असली टारगेट कौन: क्यूबा या मेक्सिको?
कागज़ पर तो यह ऑर्डर उन सभी देशों पर लागू हो सकता है जो क्यूबा को तेल बेचते हैं – मेक्सिको, वेनेज़ुएला, रूस, और भविष्य में कोई और भी। लेकिन ज़्यादातर एनालिस्ट्स मान रहे हैं कि सबसे बड़ा टारगेट फिलहाल मेक्सिको ही है।
क्यों?
- आज की तारीख़ में क्यूबा का नंबर–वन सप्लायर मेक्सिको ही है।
- मेक्सिको पहले से ही अमेरिकी बाज़ार पर भारी निर्भर है – ऑटोमोबाइल, मैन्यूफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर, एनर्जी, सब में यूएस एक बड़ा कस्टमर है।
- अगर अमेरिका सच में मेक्सिको के प्रॉडक्ट्स पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो मेक्सिकन इकोनॉमी पर सीधा झटका लगेगा।
इसी वजह से ट्रंप का यह कदम ‘डबल प्रेशर टैक्टिक’ जैसा है –
- एक तरफ क्यूबा पर फ्यूल की कमी और एनर्जी क्राइसिस के ज़रिए दबाव
- दूसरी तरफ मेक्सिको पर ये मैसेज कि अगर तुमने क्यूबा के साथ खड़े रहना जारी रखा तो तुम्हें अमेरिकी मार्केट में कॉस्ट चुकानी पड़ेगी
हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि ऑर्डर साइन होने से ठीक पहले मेक्सिको की राष्ट्रपति ने घोषणा की कि उनकी सरकार फिलहाल क्यूबा को तेल की शिपमेंट “अस्थायी रूप से रोक” रही है, और यह “पूरी तरह से संप्रभु फैसला” है, किसी बाहरी दबाव की वजह से नहीं।
इसे कई ऑब्ज़र्वर “सिग्नल” मान रहे हैं – मेक्सिको एक तरफ क्यूबा के लिए अपनी पारंपरिक दोस्ती बचाना चाहता है, लेकिन साथ–साथ ट्रंप के साथ सीधे टकराव से भी बचना चाहता है।
क्यूबा के लिए इसका मतलब क्या है?
क्यूबा की इकोनॉमी पहले से ही बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है:
- फ्यूल की कमी से बिजली कटौती, ब्लैकआउट्स और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में दिक्कतें
- कोविड के बाद टूरिज़्म में गिरावट
- वेनेज़ुएला की मदद कम होने से कमाई के रास्ते और सिकुड़ गए
अब अगर मेक्सिको भी दबाव में आकर लंबी अवधि के लिए सप्लाई कम करता है, या रूस पर भी आगे जाकर प्रेशर बढ़ाया जाता है, तो क्यूबा के पास बहुत कम विकल्प बचेंगे।
ट्रंप खुद कह चुके हैं कि उनकी नज़र में “क्यूबा जल्दी ही फेल होने वाला है” क्योंकि अब उसे न वेनेज़ुएला से तेल मिल रहा है, न उतनी फाइनेंसिंग।
दूसरी तरफ, क्यूबन नेतृत्व कह रहा है कि:
- हम किसी सौदे के लिए अमेरिका के सामने झुकने वाले नहीं
- हमारे पास अन्य पार्टनर्स और रास्ते हैं
- हमने 60 साल से एम्बार्गो झेला है, आगे भी रेज़िस्ट करेंगे
लेकिन ग्राउंड रियलिटी यह है कि फ्यूल की हर नई कटौती सीधे आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर डालती है – अस्पतालों की बिजली से लेकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और फूड सप्लाई तक।
क्या ट्रंप के पास कानूनी अधिकार है ऐसे टैरिफ लगाने का?
यह भी एक बड़ा सवाल है। ट्रंप ने इस ऑर्डर में “राष्ट्रीय आपात स्थिति” घोषित की है और उसी के नाम पर टैरिफ सिस्टम बनाने की बात कही है।
- इससे पहले भी उन्होंने अलग–अलग देशों पर नेशनल सिक्योरिटी या नेशनल इमरजेंसी के नाम पर टैरिफ बढ़ाए थे।
- सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर पहले से बहस चल रही है कि क्या राष्ट्रपति इस तरह की आपात स्थिति का इस्तेमाल कर के व्यापारिक टैरिफ को मनमाने तरीके से बदल सकते हैं या नहीं।
क़ानूनी विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं – कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना भी राष्ट्रपति के पास काफी स्पेस है, जबकि कुछ मानते हैं कि यह पावर सीमित होनी चाहिए, नहीं तो हर प्रशासन “इमरजेंसी” बताकर टैरिफ और सैंक्शन का दुरुपयोग कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल है कि क्या इस तरह किसी तीसरे देश को टारगेट करना – सिर्फ इसलिए कि वो किसी चौथे देश (क्यूबा) के साथ ट्रेड कर रहा है – वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन और इंटरनेशनल लॉ की भावना के खिलाफ़ नहीं जाता?
रूस, चीन और दूसरे देशों की पोज़िशन
ट्रंप के ऑर्डर में सिर्फ क्यूबा ही नहीं, बल्कि रूस, चीन, ईरान जैसे देशों की भी बात है, जिन्हें वो “अमेरिका के दुश्मन” और “अस्थिरता फैलाने वाले” देशों के रूप में दिखाते हैं।
क्यूबा के साथ रूस और चीन दोनों की स्ट्रैटेजिक नज़दीकी है –
- रूस ने कुछ मात्रा में तेल और फ्यूल प्रॉडक्ट्स क्यूबा को भेजे हैं, और साथ–साथ मिलिट्री और सिक्योरिटी कोऑपरेशन भी बढ़ा रहा है।
- चीन क्यूबा की इन्फ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम और टेक सेक्टर में इन्वेस्टमेंट करता रहा है, और उसे अमेरिकी इन्फ्लुएंस–फ्री जोन की तरह देखता है।
अगर अमेरिका सच में इन देशों के प्रॉडक्ट्स पर “क्यूबा को तेल भेजने” के आधार पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो यह पहले से चल रही यूएस–चीन, यूएस–रूस ट्रेड और सैंक्शन वॉर्स को और ज़्यादा जटिल बना सकता है।
ट्रंप की ओवरऑल लैटिन–अमेरिका स्ट्रैटेजी
इस सारे कदम को अकेले नहीं देखना चाहिए। कुछ और पैरलल चीजें भी चल रही हैं:
- अमेरिका ने वेनेज़ुएला की सरकार को हटाकर उसके तेल सेक्टर पर भारी कंट्रोल बना लिया है, और अब वहां से क्यूबा को जाने वाली सप्लाई लगभग बंद कर दी है।
- वो खुले तौर पर यह कह रहा है कि लैटिन अमेरिका के देश – खासकर मेक्सिको – “यूएस की नीति के साथ अलाइंड, कंस्ट्रक्टिव रोल” निभाएं, न कि क्यूबा जैसे देशों को ऑक्सीजन दें।
- ट्रंप प्रशासन पहले भी मेक्सिको पर माइग्रेशन, ड्रग्स, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड के मुद्दों पर ऊंचे टैरिफ का हथियार लहराता रहा है।
यानी, यह ऑर्डर सिर्फ क्यूबा को अलग–थलग करने का टूल नहीं, बल्कि पूरे रीजन में अमेरिकी इन्फ्लुएंस रीसैट करने की कोशिश भी है – “अगर तुम हमारी लाइन के खिलाफ़ जाओगे, तो तुम्हारे एक्सपोर्ट्स पर कॉस्ट लगेगी।”
भारत और बाकी दुनिया के लिए क्या मायने?
सीधे–सीधे देखें, तो यह ऑर्डर भारत जैसे देशों को तुरंत नहीं हिट करता, क्योंकि भारत क्यूबा को तेल सप्लाई करने वाला बड़ा खिलाड़ी नहीं है। लेकिन इसके कुछ इंडायरेक्ट इफेक्ट हो सकते हैं:
- अगर ग्लोबल मार्केट में छोटे–मोटे री–रूटिंग या सप्लाई चेन एडजस्टमेंट होते हैं, तो ऑयल प्राइसेज़ में शॉर्ट–टर्म वॉलैटिलिटी बढ़ सकती है।
- अमेरिका जिस तरह “सेकेंडरी सैंक्शन” या “थर्ड–कंट्री टैरिफ” का मॉडल यूज़ कर रहा है, वो भविष्य में किसी और मुद्दे पर भी लागू हो सकता है – यानी कोई भी देश अगर अमेरिकी लाइन के खिलाफ़ किसी तीसरे देश से डील करे, तो उसके प्रॉडक्ट्स पर टैरिफ लग सकते हैं।
- ये एक तरह का प्रीसिडेंट सेट करता है कि बड़ी पावर अपने ट्रेड टूल्स का कितना आक्रामक इस्तेमाल कर सकती हैं।
भारत जैसे देशों को ऐसी स्थितियों में बैलेंस्ड डिप्लोमेसी की ज़रूरत होती है – ताकि एक तरफ अमेरिकी बाज़ार और स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप भी बनी रहे, और दूसरी तरफ अपने स्वतंत्र विदेश नीति विकल्प भी खुले रहें।
क्यूबा की आगे की राह
क्यूबा के लिए यह एक और मुश्किल टेस्ट है। पहले वेनेज़ुएला पर निर्भरता, फिर अमेरिकी एम्बार्गो, अब मेक्सिको और दूसरे सप्लायर्स पर भी संभावित प्रेशर – ऐसे में उसे:
- अपने एनर्जी मिक्स को थोड़ा–बहुत डाइवर्सिफाई करना पड़ेगा – रिन्यूएबल, गैस, इफिशियंसी मेज़र्स
- रूस, अल्जीरिया या दूसरे छोटे सप्लायर्स से ओप्शन तलाशने होंगे
- और साथ–साथ घरेलू रिफॉर्म्स और प्रोडक्टिविटी बढ़ाकर अपनी इकोनॉमी को कुछ हद तक इंटरनल स्ट्रेंथ देनी होगी
लेकिन यह आसान नहीं है, क्योंकि क्यूबा की राजनीतिक व्यवस्था, संसाधन और ग्लोबल एक्सेस, तीनों ही सीमित हैं।
निष्कर्ष: यह सिर्फ एक टैरिफ ऑर्डर नहीं, पावर पॉलिटिक्स का मैसेज है
ऊपरी नज़र में ट्रंप का ऑर्डर बस एक लाइन जैसा लगता है – “जो देश क्यूबा को तेल देगा, उसके प्रॉडक्ट्स पर हम एक्स्ट्रा ड्यूटी लगा सकते हैं।” लेकिन असल में यह तीन–चार स्तर पर मैसेज भेज रहा है:
- क्यूबा को – कि अब तुम्हारे हर नए सप्लायर पर भी प्रेशर डाला जा सकता है
- मेक्सिको और लैटिन अमेरिका को – कि यूएस की विदेश–नीति के खिलाफ़ जाने की कीमत सीधे तुम्हारी इकोनॉमी पर पड़ेगी
- रूस और चीन को – कि क्यूबा को सपोर्ट करना आसान नहीं छोड़ा जाएगा
- और दुनिया को – कि अमेरिका अपने ट्रेड और टैरिफ पावर का इस्तेमाल सख्ती से करने के लिए तैयार है
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि:
- मेक्सिको वास्तव में कितनी देर तक तेल शिपमेंट “रोक” कर रखता है या फिर धीरे–धीरे बैकडोर से सप्लाई जारी रहती है
- रूस या कोई और देश क्यूबा को सपोर्ट करने के लिए कितनी दूर तक जाने को तैयार होता है
- और खुद अमेरिका कितना आगे बढ़कर इन अतिरिक्त टैरिफ को असल में लागू करता है, या सिर्फ धमकी के स्तर पर इन्हें रखता है
फिलहाल के लिए इतना तय है कि क्यूबा के लिए फ्यूल लाइफ़लाइन और मुश्किल हो गई है, और लैटिन अमेरिका की तेल–राजनीति में एक नया, तेज़ मोड़ आ चुका है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
प्रश्न 1: ट्रंप के नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में मुख्य बात क्या है?
उत्तर: इस ऑर्डर के तहत अमेरिका एक नया टैरिफ सिस्टम बना रहा है, जिसमें किसी भी ऐसे देश के प्रॉडक्ट्स पर अतिरिक्त ad valorem ड्यूटी लगाई जा सकती है, जो सीधे या परोक्ष रूप से क्यूबा को तेल बेचता या सप्लाई करता है। मतलब, क्यूबा को तेल भेजोगे तो तुम्हारे सामान पर अमेरिका में ज़्यादा टैक्स लग सकता है।
प्रश्न 2: अभी क्यूबा को सबसे ज़्यादा तेल कौन–कौन से देश देते हैं?
उत्तर: ताज़ा डेटा के अनुसार 2025 में मेक्सिको क्यूबा का सबसे बड़ा सप्लायर बन चुका है, जो औसतन करीब 12,284 बैरल प्रति दिन और लगभग 44% शेयर देता है। वेनेज़ुएला करीब 9,500 बैरल प्रति दिन और 34% के आसपास हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि रूस की सप्लाई तीसरे नंबर पर आती है।
प्रश्न 3: क्या यह ऑर्डर सीधे मेक्सिको को टारगेट कर रहा है?
उत्तर: ऑफिशियली तो ऑर्डर सभी देशों पर लागू हो सकता है, लेकिन रियलिटी में मेक्सिको सबसे बड़ा टारगेट दिखता है, क्योंकि वही इस वक्त क्यूबा का नंबर–वन ऑयल सप्लायर है और उसकी इकोनॉमी अमेरिकी मार्केट पर बहुत निर्भर है। अमेरिकी मीडिया और एनालिस्ट्स भी मान रहे हैं कि इस कदम से मेक्सिको पर भारी दबाव बनाया जाएगा कि वह क्यूबा से दूरी बनाए।
प्रश्न 4: क्यूबा पर इसका क्या असर पड़ेगा?
उत्तर: क्यूबा पहले से गंभीर फ्यूल शॉर्टेज और ब्लैकआउट्स झेल रहा है। वेनेज़ुएला से सस्ती सप्लाई घट चुकी है, और अब अगर मेक्सिको या दूसरे सप्लायर्स भी दबाव में आकर शिपमेंट घटाते हैं, तो क्यूबा की एनर्जी क्राइसिस और गहरी हो सकती है – बिजली, ट्रांसपोर्ट, हेल्थकेयर सब पर असर पड़ेगा।
प्रश्न 5: क्या यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून और ग्लोबल ट्रेड के हिसाब से विवादित है?
उत्तर: हां, कई विशेषज्ञ इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं। एक तो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहले से देख रहा है कि राष्ट्रपति “नेशनल इमरजेंसी” के नाम पर टैरिफ लगाने की कितनी हद तक पावर रखता है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह बहस है कि किसी तीसरे देश को सिर्फ इसलिए टारगेट करना कि वो किसी चौथे देश (क्यूबा) से ट्रेड कर रहा है, क्या वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन और इंटरनेशनल लॉ की भावना के खिलाफ़ नहीं जाता। इस पर आने वाले महीनों में काफ़ी कानूनी और राजनीतिक जंग दिख सकती है।
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