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क्या पेनिसिलिन पर सरकार की नई MIP से घरेलू दवा उद्योग को बड़ी राहत मिलेगी?

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penicillin minimum import price India
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भारत सरकार ने पेनिसिलिन और उसके साल्ट्स पर न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) लागू कर दिया है ताकि चीन से सस्ती डंपिंग रुके और घरेलू फर्मेंटेशन इंडस्ट्री को बचाया जा सके। औरोबिंदो फार्मा को बड़ा फायदा, दवा कीमतों पर असर, हेल्थकेयर और स्टॉक मार्केट के लिए इसका मतलब क्या है – सब कुछ आसान भाषा में समझिए।

चीन से सस्ती इंपोर्ट पर ब्रेक! पेनिसिलिन के लिए सरकार का नया न्यूनतम आयात मूल्य

नई पॉलिसी से पेनिसिलिन पर ब्रेक: सरकार ने तय किया न्यूनतम आयात मूल्य

भारत सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए पेनिसिलिन और उसके साल्ट्स पर न्यूनतम आयात मूल्य यानी Minimum Import Price (MIP) लगा दिया है। ये फैसला डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) की तरफ से एक साल के लिए लागू किया गया है। इसका सीधा मकसद है – चीन से आने वाली बेहद सस्ती इंपोर्टेड सामग्री की डंपिंग को रोकना और घरेलू फर्मेंटेशन इंडस्ट्री को बचाना, जो अभी–अभी खड़ी हो रही है और जिसे सपोर्ट की सख्त ज़रूरत है।

सरकार ने साफ कहा है कि ये कदम स्थायी ट्रेड बैरियर नहीं, बल्कि प्रोटेक्टिव शील्ड है, ताकि घरेलू कंपनियां कम से कम ब्रेकईवन के ऊपर काम कर सकें और चीन जैसी कम कीमत वाले सप्लायर्स के सामने पूरी तरह घुटने न टेकें।

इस पॉलिसी का सबसे बड़ा लाभ जिस कंपनी को तुरंत दिखा है, वह है Aurobindo Pharma। कंपनी ने सरकार की Production-Linked Incentive (PLI) स्कीम के तहत लगभग 3,500 करोड़ रुपये की भारी–भरकम इन्वेस्टमेंट की है ताकि भारत में ही पेनिसिलिन G (Pen-G), 6-APA और अमोक्सिसिलिन ट्राईहाइड्रेट जैसी क्रिटिकल एंटीबायोटिक रॉ–मटीरियल की मैन्युफैक्चरिंग हो सके। अब MIP लागू होने से उनकी यह इन्वेस्टमेंट प्रैक्टिकली वायबल दिखने लगी है, इसी वजह से स्टॉक मार्केट ने भी पॉज़िटिव रिएक्शन दिया और Aurobindo Pharma का शेयर एनएसई पर लगभग 3% से ज्यादा चढ़ गया।

MIP क्या होता है और सरकार इसे क्यों लागू करती है?

आम भाषा में समझें तो MIP एक तरह का ‘फ्लोर प्राइस’ है – यानी सरकार कहती है कि फलां–फलां प्रोडक्ट इस कीमत से कम पर आप विदेश से नहीं मंगा सकते। इससे दो काम होते हैं:

पहला, जो विदेशी कंपनियां मार्केट पर कब्ज़ा करने के लिए बेहद सस्ती कीमत पर सामान डंप करती हैं, उनकी गुंजाइश कम हो जाती है।

दूसरा, घरेलू इंडस्ट्री को एक बेस लेवल का प्राइस प्रोटेक्शन मिल जाता है, जिससे वो कम से कम अपने कॉस्ट और सही मार्जिन के साथ टिकने लायक बिज़नेस कर सके।

पेनिसिलिन जैसे प्रोडक्ट्स में फैक्टर ये है कि ये बहुत कैपिटल–इंटेंसिव और टेक्निकल फर्मेंटेशन प्रोसेस से बनते हैं। ये कोई सिंपल केमिकल ब्लेंडिंग नहीं, बल्कि हाई–टेक, बायो–फर्मेंटेशन, बड़े–बड़े रिएक्टर, बहुत ज्यादा बिजली, टेक्निकल स्किल्स और लॉन्ग–टर्म इन्वेस्टमेंट वाला खेल है। अगर कोई देश – यहां चीन – बहुत बड़े स्केल और कम कॉस्ट पर ये सामान बनाकर आधी–तिहाई कीमत पर बेच दे, तो नई–नई खड़ी हो रही इंडियन फैक्ट्रियां सीधी टक्कर नहीं ले पातीं।

फिलहाल सरकार ने MIP सिर्फ एक साल के लिए लगाया है, यानी इसे परमानेंट टैरिफ या बैन नहीं कहा जा सकता। लेकिन ये साल घरेलू इंडस्ट्री के लिए बहुत अहम हो सकता है, क्योंकि इसी समय में उनका प्लांट स्टेबल हो, कॉस्ट स्ट्रक्चर सेट हो और फाइनेंसियल रुप से ट्रैक पर आए, इसकी उम्मीद है।

पेनिसिलिन और उसके साल्ट्स के लिए नई MIP कितनी है?

सरकारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, तीन मुख्य प्रोडक्ट्स पर MIP तय की गई है –

  • Penicillin-G (Pen-G) के लिए MIP 2,216 रुपये प्रति किलो (लगभग 26.5 डॉलर प्रति किलो)
  • 6-APA के लिए MIP 3,405 रुपये प्रति किलो (लगभग 40.8 डॉलर प्रति किलो)
  • Amoxicillin trihydrate के लिए MIP 2,733 रुपये प्रति किलो (लगभग 32.7 डॉलर प्रति किलो)

ये कीमतें उस रेंज के आसपास हैं, जहां इंडियन मैन्युफैक्चरर्स को माना जाता है कि वो ऑपरेट कर सकते हैं और प्रोफिटेबिलिटी या कम से कम ब्रेकईवन के करीब रह सकते हैं।

इसके उलट, इंटरनेशनल मार्केट में Pen-G की कीमत 2025 के आखिर तक गिरकर लगभग 13.5 डॉलर प्रति किलो पर आ गई थी – जो कि घरेलू इंडस्ट्री के लिए लगभग ‘मारक’ स्तर पर कम है, क्योंकि एनालिस्ट्स का अनुमान है कि घरेलू प्रोडक्शन के लिए कम से कम 25 डॉलर प्रति किलो की जरूरत होती है, तभी बात बनती है।

यही कारण है कि डोमेस्टिक प्लेयर्स को अपनी कैपेसिटी होने के बावजूद प्रोडक्शन “कैलिब्रेट” यानी बहुत कम लेवल पर चलाकर काम करना पड़ रहा था, ताकि लगातार घाटे में प्रोड्यूस न करना पड़े।

अब MIP के बाद सिचुएशन ये होगी कि भारत में जो भी इंपोर्टर चीन या किसी और देश से Pen-G या इससे जुड़े साल्ट्स लाएगा, उसे कम से कम MIP के बराबर कीमत पर ही इंपोर्ट कर पाना चाहिए। इससे बहुत सस्ते इंपोर्ट्स की डंपिंग अपने–आप कम हो जाएगी और इंडियन प्रोड्यूसर्स को सांस लेने की जगह मिलेगी।

Aurobindo Pharma के लिए ये फैसला इतना बड़ा ‘गेमचेंजर’ क्यों है?

Aurobindo ने सरकार की PLI स्कीम के तहत करीब 3,500 करोड़ रुपये की इन्वेस्टमेंट करके एक बड़ा फर्मेंटेशन–बेस्ड प्लांट तैयार किया है, जहां Pen-G, 6-APA और अमोक्सिसिलिन ट्राईहाइड्रेट जैसे क्रिटिकल इंटरमीडिएट्स बनाए जाने हैं।

ये प्रोजेक्ट सिर्फ कंपनी के लिए नहीं, बल्कि देश की ड्रग सिक्योरिटी के लिए भी स्ट्रेटेजिक है, क्योंकि पिछले कई दशकों से भारत इन फर्मेंटेशन–बेस्ड इनपुट्स के लिए लगभग 90–100% तक चीन पर डिपेंड रहा है। अगर कभी चीन की तरफ से सप्लाई रुक जाए, कीमतें आसमान छूने लगें या जियो–पॉलिटिकल टेंशन हो, तो भारत की बेसिक हेल्थकेयर सिस्टम पर सीधा असर पड़ सकता है।

समस्या यह थी कि Aurobindo जैसे प्लेयर्स को प्रैक्टिकल लेवल पर दुनिया की सस्ती कीमतों से कॉम्पिट करना मुश्किल पड़ रहा था। जब इंटरनेशनल प्राइस 13.5 डॉलर/किलो हो और आपको चलने के लिए कम से कम 25 डॉलर/किलो चाहिए, तो या तो आप प्लांट बंद रखिए, या घाटे में प्रोड्यूस करिए – दोनों ही रास्ते लॉन्ग–टर्म में टिकाऊ नहीं हैं।

अब MIP की वजह से कंपनी के लिए एक तरह का ‘प्राइस फ्लोर’ तय हो गया है, जिसके नीचे इंपोर्टेड रॉ–मटीरियल नहीं आ पाएगा, तो घरेलू प्रोडक्शन अपने कॉस्ट के आसपास या थोड़ा ऊपर मार्केट में सप्लाई कर सकता है।

यही कारण है कि स्टॉक मार्केट ने इसे कंपनी के लिए पॉज़िटिव माना और खबर आने के बाद Aurobindo Pharma के शेयर में लगभग 3% से ज़्यादा की तेजी दिखी। निवेशकों को लग रहा है कि PLI के तहत लगी भारी–भरकम पूंजी अब ‘स्टक’ न रहकर अच्छे रिटर्न देने की पोज़िशन में आ सकती है।

चीन पर निर्भरता क्यों जोखिम भरी है?

कई सालों से भारत ने एंटीबायोटिक जैसे बेसिक लेकिन क्रिटिकल मटीरियल्स के लिए चीन पर बहुत ज़्यादा भरोसा किया। कारण भी साफ थे –

  • चीन के पास बड़े–बड़े फर्मेंटेशन प्लांट्स,
  • सस्ती बिजली,
  • स्केल की इकनॉमी,
  • और कई बार आक्रामक प्राइसिंग स्ट्रेटेजी,

जिससे वो दुनिया के बाकी देशों की इंडस्ट्री को धीरे–धीरे “आउट–प्राइस” कर देते हैं।

नतीजा यह हुआ कि भारत में जो–जो पुरानी फर्मेंटेशन यूनिट्स थीं, वो या तो शटडाउन हो गईं या किसी और प्रोडक्ट लाइन में कन्वर्ट हो गईं। शॉर्ट टर्म में ये मॉडल अच्छा लगा – सस्ता माल आया, कंपनियों ने कम कॉस्ट पर दवाएं बनाईं – लेकिन लॉन्ग–टर्म में इससे सप्लाई सिक्योरिटी पर बहुत बड़ा रिस्क खड़ा हो गया।

कोविड महामारी, ग्लोबल सप्लाई डिसरप्शन और जियो–पॉलिटिकल टेंशन ने साफ दिखा दिया कि अगर बेसिक APIs और इंटरमीडिएट्स के लिए आप 100% किसी एक देश पर निर्भर रहेंगे, तो पब्लिक हेल्थ, सेना और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सब कुछ रिस्क में आ सकता है।

MIP जैसे कदम इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं – ताकि भारत कम से कम उन क्रिटिकल प्रोडक्ट्स में घरेलू क्षमता खड़ी कर सके, जिनके बिना बेसिक एंटीबायोटिक तक नहीं बन पाते।

क्या इससे दवाएं महंगी हो जाएंगी?

पहला स्वाभाविक सवाल यही उठता है कि अगर रॉ–मटीरियल का आयात महंगा हो जाएगा या घरेलू प्रोडक्शन MIP के आसपास होगा, तो क्या आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा?

यहां एक अहम पॉइंट है – सरकार ने खुद कहा है कि ज्यादातर पेनिसिलिन–बेस्ड दवाएं पहले से ही प्राइस कंट्रोल के दायरे में आती हैं। यानी NPPA (National Pharmaceutical Pricing Authority) जैसी एजेंसियां इन दवाओं की MRP पर कैप लगाकर रखती हैं।

सरकार का तर्क है कि चूंकि फाइनल मेडिसिन की कीमत कंट्रोल्ड रहती है, इसलिए रॉ–मटीरियल के स्तर पर जो यह सुधार किया जा रहा है, उसका सीधा और बड़ा असर कंज़्यूमर पर नहीं पड़ेगा। हां, कुछ सीमित इफेक्ट हो सकता है, लेकिन उसे ‘मार्जिनल’ माना जा रहा है।

दूसरी तरफ अगर घरेलू प्रोडक्शन मजबूत होता है, तो लॉन्ग–टर्म में सप्लाई ज़्यादा स्टेबल रह सकती है, जिससे अचानक शॉर्टेज और ब्लैक–मार्केटिंग जैसी सिचुएशन कम होंगी, जो अंततः मरीज के हित में ही है।

क्लाव्युलैनिक एसिड (क्लाव्युलनेट) पर पहले ही हो चुका है MIP

पेनिसिलिन G के लिए लिया गया यह फैसला कोई पहली मिसाल नहीं है। इससे पहले सरकार ने पोटैशियम क्लाव्युलनेट (KGA) – जो कई पेनिसिलिन–बेस्ड कॉम्बिनेशन एंटीबायोटिक्स में इस्तेमाल होता है – पर भी MIP तय की थी।

क्लाव्युलैनिक एसिड जैसे प्रोडक्ट की खासियत यह है कि ये खुद बहुत बड़ी मात्रा में नहीं खाया जाता, लेकिन पेनिसिलिन या अमोक्सिसिलिन के साथ मिलकर “ब्रॉड–स्पेक्ट्रम” एंटीबायोटिक कॉम्बिनेशन बनाता है।

सरकार ने KGA के लिए 180 डॉलर प्रति किलो की MIP नवंबर 2026 तक के लिए तय की है, ताकि Kinvan Pvt Ltd जैसे डोमेस्टिक प्रोड्यूसर को प्रोटेक्शन मिल सके। यह कंपनी भारत में पहली ऐसी फर्म मानी जा रही है जिसने इस क्रिटिकल इंग्रेडिएंट की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग शुरू की।

Kinvan ने प्लान किया था कि वह 300 मीट्रिक टन सालाना तक प्रोडक्शन स्केल करेगी, लेकिन प्रोजेक्ट लॉन्च होने के कुछ ही समय बाद इंटरनेशनल मार्केट में कीमतें 195 डॉलर से गिरकर 150 डॉलर तक आ गईं – जो दुबारा वही कहानी दोहराने जैसा था कि घरेलू कंपनी शुरू करते ही ग्लोबल प्राइसिंग नीचे गिरा दी जाती है ताकि वो टिक न सके।

MIP ने यहां भी एक सेफ्टी नेट दिया – ताकि कंपनी लॉन्ग–टर्म में सर्वाइव कर सके और देश को इस महत्वपूर्ण प्रोडक्ट में सेल्फ–रिलायंस मिल सके।

क्रिटिक्स क्या कह रहे हैं?

जो कंपनियां इंपोर्टेड रॉ–मटीरियल पर ज्यादा निर्भर हैं, वो यह चिंता ज़ाहिर कर रही हैं कि MIP से उनकी इनपुट कॉस्ट बढ़ जाएगी और कुछ फॉर्मुलेशंस की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर पड़ेगा।

उनका तर्क है कि अगर ग्लोबल मार्केट में कीमत वाकई कम हो चुकी है और उसका फायदा दुनिया की बाकी इंडस्ट्री को मिल रहा है, तो इंडियन फॉर्मुलेटर्स को इस बेनिफिट से वंचित करना प्रतिस्पर्धा के लिहाज़ से सही नहीं होगा। कुछ लोगों का कहना है कि MIP अगर बहुत लंबे समय तक चली, तो यह दक्षता (efficiency) बढ़ाने की बजाय ‘कम्फर्ट ज़ोन’ बना देगी।

सरकार का जवाब है कि:

  • MIP अस्थायी है, एक साल के लिए है (कुछ केसों में दो–तीन साल तक)
  • यह केवल क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक प्रोडक्ट्स पर लगाई जा रही है – जहां सप्लाई सिक्योरिटी का मुद्दा जुड़ा हुआ है
  • साथ ही, फार्मा फिनिश्ड प्रोडक्ट्स में प्राइस कंट्रोल और NPPA की पॉलिसी पहले से लागू है, इसलिए कंज्यूमर लेवल पर इम्पैक्ट को कम से कम रखने की कोशिश रहेगी

हेल्थ और स्टॉक मार्केट – दोनों के लिए क्या मैसेज है?

हेल्थकेयर की नज़र से देखें तो MIP का सीधा मैसेज ये है कि सरकार अब सिर्फ़ “सबसे सस्ता इंपोर्ट” मॉडल पर नहीं चलना चाहती, बल्कि स्ट्रेटेजिक प्रोडक्ट्स में घरेलू क्षमता खड़ी करने के लिए कुछ समय के लिए प्रोटेक्शन भी देने को तैयार है।

स्टॉक मार्केट की नज़र से देखें तो ये संकेत है कि PLI स्कीम के तहत जो–जो कंपनियां हाई–कैपेक्स, हाई–टेक प्रोजेक्ट्स में उतरी हैं, उन्हें सिर्फ़ घोषणा–स्तर पर नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल पॉलिसी–सपोर्ट भी मिलने लगा है। इसलिए Aurobindo Pharma जैसे स्टॉक्स में पॉज़िटिव सेंटिमेंट दिखना लाजिमी है।

लॉन्ग–टर्म में, अगर ये सभी प्रोजेक्ट्स सही से ऑपरेट होते हैं, तो भारत एंटीबायोटिक रॉ–मटीरियल्स और APIs में न सिर्फ आत्मनिर्भर, बल्कि एक्सपोर्टर भी बन सकता है – जैसा कभी 90 के दशक में हुआ था, जब भारत “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” की छवि बना रहा था।

निष्कर्ष: क्या ये कदम सही दिशा में है?

संतुलित नज़रिए से देखें तो पेनिसिलिन और उसके साल्ट्स पर MIP लगाना दो–तीन स्तर पर सही दिशा में उठाया गया कदम लगता है:

  • यह चीन पर अत्यधिक निर्भरता के रिस्क को कम कर सकता है
  • घरेलू फर्मेंटेशन इंडस्ट्री, खासकर नई–नई PLI–समर्थित प्रोजेक्ट्स को सांस लेने की जगह मिलेगी
  • सप्लाई चेन अधिक सुरक्षित और विविधतापूर्ण बन सकती है

हाँ, यह भी सच है कि किसी भी तरह का प्राइस प्रोटेक्शन लॉन्ग–टर्म के लिए नहीं होना चाहिए; इंडस्ट्री को समय–सीमा के भीतर खुद को इतना इफिसिएंट बनाना होगा कि वो ग्लोबल मार्केट में भी टिक सके। लेकिन स्ट्रेटेजिक और हेल्थ–क्रिटिकल प्रोडक्ट्स के मामले में शुरुआती वर्षों के लिए ऐसा सेफ्टी नेट देना आज की जियो–पॉलिटिकल हकीकत में काफी व्यावहारिक लग रहा है।

फिलहाल पब्लिक के लिए संदेश यह है कि पेनिसिलिन–बेस्ड दवाओं की कीमतों में कोई बड़ा उछाल अपेक्षित नहीं है, क्योंकि वे पहले से ही प्राइस कंट्रोल के दायरे में हैं। दूसरी तरफ, देश के लिए यह संभावना मजबूत हुई है कि आने वाले सालों में हम अपने सबसे बुनियादी एंटीबायोटिक रॉ–मटीरियल्स के लिए किसी एक देश पर निर्भर न रहें – यही इस कदम का सबसे बड़ा पॉज़िटिव है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: पेनिसिलिन के लिए न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) क्यों लगाया गया है?
उत्तर: MIP इसलिए लगाया गया है ताकि चीन जैसे देशों से आने वाली बहुत सस्ती डंप्ड इंपोर्ट्स को रोका जा सके और भारत की घरेलू फर्मेंटेशन इंडस्ट्री को प्राइस प्रोटेक्शन मिल सके। इससे नई–नई लगी यूनिट्स लॉन्ग–टर्म में टिक सकें और देश की एंटीबायोटिक सप्लाई चेन सुरक्षित हो।

प्रश्न 2: सरकार ने Pen-G, 6-APA और अमोक्सिसिलिन के लिए MIP कितनी तय की है?
उत्तर: Penicillin-G (Pen-G) के लिए करीब 2,216 रुपये प्रति किलो, 6-APA के लिए 3,405 रुपये प्रति किलो और Amoxicillin trihydrate के लिए 2,733 रुपये प्रति किलो का न्यूनतम आयात मूल्य तय किया गया है।

प्रश्न 3: Aurobindo Pharma को इस फैसले से क्या फायदा होगा?
उत्तर: Aurobindo Pharma ने PLI स्कीम के तहत लगभग 3,500 करोड़ रुपये की इन्वेस्टमेंट से पेनिसिलिन, 6-APA और अमोक्सिसिलिन बनाने की बड़ी क्षमता तैयार की है। MIP से अब उन्हें इतना प्राइस फ्लोर मिल जाता है कि वे चीन की अति–सस्ती सप्लाई से कुछ हद तक सुरक्षित रहकर वायबल तरीके से प्रोडक्शन चला सकें, इसलिए कंपनी के शेयर में भी तेजी देखी गई।

प्रश्न 4: क्या इस कदम से आम मरीज के लिए दवाएं महंगी हो जाएंगी?
उत्तर: सरकार का कहना है कि ज्यादातर पेनिसिलिन–बेस्ड दवाएं पहले से ही प्राइस कंट्रोल के तहत हैं, इसलिए रॉ–मटीरियल पर MIP लगाने से मरीज पर सीधे बहुत बड़ा बोझ नहीं पड़ेगा। थोड़ा–बहुत इफेक्ट हो सकता है, लेकिन उसे सीमित माना जा रहा है, जबकि बदले में सप्लाई सिक्योरिटी और घरेलू इंडस्ट्री स्ट्रेंथ बढ़ेगी।

प्रश्न 5: क्लाव्युलैनिक एसिड (पोटैशियम क्लाव्युलनेट) पर MIP क्या है और क्यों?
उत्तर: सरकार ने पोटैशियम क्लाव्युलनेट पर 180 डॉलर प्रति किलो की MIP नवंबर 2026 तक के लिए तय की है, ताकि Kinvan Pvt Ltd जैसी घरेलू कंपनी, जिसने इस प्रोडक्ट का इंडियन प्रोडक्शन शुरू किया है, ग्लोबल प्राइस क्रैश के बावजूद सर्वाइव कर सके। ये प्रोडक्ट कई पेनिसिलिन–बेस्ड कॉम्बिनेशन दवाओं में अहम रोल निभाता है, इसलिए इसे स्ट्रेटेजिक माना गया है।

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