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क्या बच्चों का सोशल मीडिया अकाउंट बंद होगा? आर्थिक सर्वे ने उम्र की लिमिट क्यों सुझाई

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भारत के आर्थिक सर्वे 2025-26 ने सोशल मीडिया पर उम्र आधारित लिमिट, सख्त age verification और बच्चों के लिए सेफ सेटिंग्स की जरूरत पर सवाल उठाए हैं। ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम पर बैन, आंध्र प्रदेश की तैयारी, पेरेंट्स, बच्चों और टेक कंपनियों पर असर क्या होगा – आसान भाषा में पूरा विश्लेषण।

बच्चों के हाथ से मोबाइल छिनेगा या बदलेगा सिस्टम? सोशल मीडिया पर उम्र की रेखा की बहस

भारत के आर्थिक सर्वे में सोशल मीडिया पर उम्र की लिमिट: बच्चों की ऑनलाइन दुनिया अब कैसे बदलेगी?

आजकल बच्चों के हाथ में मोबाइल और सोशल मीडिया उतना ही कॉमन हो चुका है जितना पहले टीवी या वीडियो गेम होता था। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, स्नैपचैट, गेमिंग ऐप्स – 12–13 साल के बच्चे भी उतनी ही आसानी से चला रहे हैं जितने बड़े। माता–पिता अक्सर कंफ्यूज रहते हैं कि कितना कंट्रोल करें, कितना छोड़ दें।

इसी बीच भारत के आर्थिक सर्वे 2025-26 ने एक अहम बहस को आधिकारिक दस्तावेज़ में जगह दी है – क्या सोशल मीडिया और कुछ तरह के ऐप्स पर उम्र आधारित पाबंदियां सख्ती से लागू की जानी चाहिए? सर्वे ने साफ कहा है कि प्लेटफॉर्म्स को उम्र की जांच (age verification) और बच्चों के लिए age-appropriate defaults (उम्र के हिसाब से सुरक्षित सेटिंग्स) की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, खासकर सोशल मीडिया, जुआ/गैंबलिंग ऐप्स, ऑटो-प्ले फीचर और टार्गेटेड एड्स के मामले में।

यानी सरकार की आर्थिक रिपोर्ट पहली बार इतनी खुलकर कह रही है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा केवल परिवार और स्कूल की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सीधा–सीधा टेक कंपनियों और प्लेटफॉर्म्स की भी जिम्मेदारी बननी चाहिए।

आर्थिक सर्वे क्या है और इसकी बात इतनी अहम क्यों?

सबसे पहले ये समझें कि आर्थिक सर्वे (Economic Survey) होता क्या है। यह सरकार के वित्त मंत्रालय की तरफ से हर साल पेश किया जाने वाला दस्तावेज़ होता है, जो देश की अर्थव्यवस्था की हालत, चुनौतियों और आगे की नीतियों की दिशा पर संकेत देता है।

ये सीधे–सीधे कानून नहीं होता, लेकिन पॉलिसी मेकर्स, सांसद, ब्यूरोक्रेट्स और इंडस्ट्री के लिए ये एक तरह का रोडमैप या डिस्कशन पेपर जैसा होता है। आज जो कई बड़े कानून बने हैं – डेटा प्रोटेक्शन, बैंकिंग रिफॉर्म्स, टैक्स से जुड़े बदलाव – उनकी शुरुआती झलक अक्सर पहले आर्थिक सर्वे में ही देखने को मिल जाती है।

इसलिए जब आर्थिक सर्वे 2025-26 ये कहता है कि:

  • प्लेटफॉर्म्स को age verification लागू करना चाहिए
  • बच्चों के लिए डिफॉल्ट सेटिंग्स सुरक्षित और सीमित होनी चाहिए
  • सोशल मीडिया, गैंबलिंग ऐप्स, ऑटो-प्ले और टार्गेटेड विज्ञापनों पर खास ध्यान देना होगा

तो ये साफ सिग्नल है कि आने वाले सालों में भारत में बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी और सेफ्टी पर कड़ा कानून या नए नियम देखने को मिल सकते हैं।

दुनिया क्या कर रही है? ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूरोप तक के उदाहरण

भारत अकेला नहीं है जो इस पर सोच रहा है। दुनिया भर में बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य, लत (addiction), साइबर बुलिंग और ऑनलाइन शोषण (online exploitation) को लेकर चिंता बढ़ रही है।

कुछ अहम इंटरनेशनल कदम:

  • ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट पर नेशनल लेवल पर बैन जैसा सख्त कदम उठाने का फैसला लिया है। मतलब, 16 से कम बच्चे के नाम से इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक जैसी सोशल मीडिया सर्विस नहीं होनी चाहिए।
  • कई यूरोपीय देशों में 13–16 साल की उम्र के बीच बच्चों के डेटा के इस्तेमाल, ट्रैकिंग और टार्गेटेड एड्स पर अलग–अलग लेवल की पाबंदियां हैं।
  • कुछ देशों में गैंबलिंग या बेटिंग ऐप्स पर सख्त KYC और age verification करना अनिवार्य है, ताकि नाबालिग बच्चे उसमें पैसा या समय बर्बाद न कर सकें।

भारत के आर्थिक सर्वे में भी इन्हीं ग्लोबल ट्रेंड्स का जिक्र करते हुए कहा गया है कि दुनिया भर में सरकारें टेक कंपनियों पर लगाम कसने की कोशिश कर रही हैं, और भारत को भी अब इस बहस से बचना नहीं चाहिए।

भारत में सोशल मीडिया और बच्चे: ग्राउंड रियलिटी

अगर आप अपने आसपास देखें तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होगा कि 13–14 साल की उम्र से पहले ही बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट आ चुका होता है।

  • 6वीं–7वीं क्लास के बच्चों के पास अक्सर खुद का या घर का स्मार्टफोन होता है
  • ऑनलाइन क्लासेज और होमवर्क के नाम पर बच्चे घंटों स्क्रीन पर रहते हैं
  • इसी के बीच यूट्यूब, इंस्टाग्राम, गेम्स और शॉर्ट वीडियो ऐप्स उनकी रोज़मर्रा का हिस्सा बन जाते हैं

कई स्टडीज़ और सर्वे बताते हैं कि:

  • देर रात तक फोन चलाने से नींद का पैटर्न खराब होता है
  • लगातार रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने से ध्यान की क्षमता (attention span) कम होती है
  • लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स पर निर्भरता से सेल्फ–इमेज और कॉन्फिडेंस प्रभावित होता है
  • साइबर बुलिंग, ट्रोलिंग और ऑनलाइन हरासमेंट की घटनाएं बढ़ रही हैं

इसीलिए अब बहस यह नहीं है कि बच्चे इंटरनेट इस्तेमाल करें या नहीं – क्योंकि practically अब इसे पूरी तरह रोक पाना लगभग नामुमकिन है – बल्कि असली सवाल यह है कि उसकी उम्र, कंटेंट और टाइम लिमिट पर किस तरह की पॉलिसी और कंट्रोल हो।

आर्थिक सर्वे क्या सुझाव दे रहा है?

सर्वे की भाषा टेक्निकल लग सकती है, लेकिन इसे आसान शब्दों में समझें तो मुख्य बातें कुछ ऐसी हैं:

  1. प्लेटफॉर्म पर जिम्मेदारी, सिर्फ पेरेंट्स पर नहीं
    अब तक कंपनियां अक्सर Terms & Conditions में लिख देती हैं कि “13 साल से कम बच्चों के लिए नहीं” या “कृपया बच्चों को सुरक्षित रखें” – और अपना पल्ला झाड़ लेती हैं। सर्वे कहता है कि प्लेटफॉर्म्स को खुद टेक्निकल लेवल पर age verification और बच्चों के लिए अलग मोड या सेटिंग देनी चाहिए।
  2. Age Verification – सिर्फ औपचारिक नहीं, असरदार
    साधारण “Yes, I am 18+” वाला बटन टिक कर देना अब काफी नहीं माना जाएगा। प्लेटफॉर्म्स को या तो डॉक्यूमेंट–बेस्ड, KYC, या गोपनीय (privacy-friendly) टेक सॉल्यूशन्स लाने होंगे, जिससे यह भरोसेमंद तरीके से पता चल सके कि यूजर की उम्र वास्तव में कितनी है।
  3. Age-Appropriate Defaults
    अगर यूजर नाबालिग है, तो:
  • उसकी प्रोफाइल डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट हो
  • लोकेशन, कॉन्टैक्ट लिस्ट या सेंसिटिव डेटा शेयर न हो
  • उस पर टार्गेटेड एड्स, गैंबलिंग, एडल्ट कंटेंट या वायलेंट कंटेंट ऑटोमेटिक रूप से ना पहुंचे
  • ऑटो-प्ले लिमिटेड या ऑफ हो, ताकि बच्चा बिना सोचे घंटों रील्स न देखता रहे
  1. गैंबलिंग ऐप्स और ऑटो-प्ले पर खास फोकस
    सर्वे ने सिर्फ सोशल मीडिया की नहीं, बल्कि गैंबलिंग जैसे ऐप्स, बेटिंग गेम्स, और यहां तक कि ऑटो-प्ले वीडियो फीचर और एड्स पर भी चिंता जताई है। यानी सरकार भविष्य में इन पर भी रेगुलेशन सख्त कर सकती है।

आंध्र प्रदेश का उदाहरण: “हम ऑस्ट्रेलिया के कानून का अध्ययन कर रहे हैं”

दक्षिण भारत के राज्य आंध्र प्रदेश के टेक्नोलॉजी और ह्यूमन रिसोर्सेज मंत्री नारा लोकेश ने हाल ही में कहा कि राज्य सरकार ऑस्ट्रेलिया के under-16 सोशल मीडिया बैन मॉडल का अध्ययन कर रही है, और वे मानते हैं कि भारत में भी एक मजबूत कानूनी ढांचा लाने की जरूरत है।

इसका मतलब क्या हुआ?

  • राज्य स्तर पर भी अब सोशल मीडिया रेगुलेशन पर गंभीर चर्चा हो रही है
  • अगर कोई राज्य पायलट के रूप में सख्त कानून लाता है, तो वह आगे केंद्रीय नीति को भी प्रभावित कर सकता है
  • यह संदेश भी जाता है कि बच्चों की डिजिटल सेफ्टी अब सिर्फ “पैरेंट्स की चिंता” नहीं, बल्कि पॉलिटिकल और पॉलिसी लेवल का मुद्दा बन चुकी है

प्लेटफॉर्म्स पर असर: मेटा, गूगल, गेमिंग कंपनियां क्या करेंगी?

अगर भारत वास्तव में कड़े age-based नियम लाता है, तो सबसे बड़ा असर सीधे बड़ी टेक कंपनियों और ऐप डेवलपर्स पर पड़ेगा।

उन्हें:

  • अपनी साइनअप और लॉगिन प्रक्रिया बदलनी पड़ेगी
  • बैकएंड में उम्र सत्यापन के लिए नए सिस्टम बनाने होंगे
  • बच्चों के लिए अलग–अलग UX (user experience) और इंटरफेस डिजाइन करना होगा
  • डेटा प्रोसेसिंग और टार्गेटेड एड्स के मॉडल को रीडिज़ाइन करना होगा

ये सब आसान या सस्ता काम नहीं है। लेकिन यूरोप और कुछ दूसरे देशों में पहले से लागू कड़े डेटा प्रोटेक्शन कानूनों की वजह से कंपनियों ने वहां ऐसी सेटिंग्स बना रखी हैं, जिन्हें कुछ हद तक भारत में भी एडाप्ट किया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल – प्राइवेसी और निगरानी

जैसे ही age verification की बात आती है, एक और चिंता तुरंत उठती है – क्या इससे बच्चों और परिवारों की प्राइवेसी खतरे में नहीं पड़ जाएगी?

  • अगर हर बच्चे को सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए आधार या किसी आईडी से वेरीफाई करना पड़े, तो क्या उसका डेटा कहीं लीक हो सकता है?
  • क्या प्लेटफॉर्म्स या सरकार बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी को जरूरत से ज़्यादा ट्रैक नहीं करने लगेंगे?
  • क्या इससे ordinary users की फ्रीडम पर असर नहीं पड़ेगा?

इसलिए आगे जो भी मॉडल बनेगा, उसमें दो चीज़ों का बैलेंस बहुत ज़रूरी होगा –

  1. चाइल्ड सेफ्टी
  2. डेटा प्राइवेसी और डिजिटल राइट्स

संभव है कि भारत में भी privacy-friendly age-estimation टेक्नोलॉजी, या anonymised वेरिफिकेशन सिस्टम्स की तरफ रास्ता निकाला जाए, ताकि बिना सीधे पहचान बताए सिर्फ उम्र की कैटेगरी कन्फर्म हो सके।

माता–पिता के लिए इसका क्या मतलब है?

कई पेरेंट्स को यह सुनकर राहत भी मिलेगी और थोड़ा डर भी लगेगा।

राहत इसलिए:

  • अगर कानून और प्लेटफॉर्म दोनों सख्त हो जाएं, तो बच्चे को गलत कंटेंट देखने, स्ट्रेंजर्स से चैट करने या गैंबलिंग जैसे ऐप्स में फंसने से कुछ हद तक बचाया जा सकेगा
  • पेरेंटल कंट्रोल टूल्स बेहतर और आसान हो सकते हैं
  • कम उम्र में सोशल मीडिया पर आने का ट्रेंड थोड़ा स्लो हो सकता है

डर इसलिए:

  • बच्चों की डिजिटल एक्टिविटी पर जरूरत से ज़्यादा निगरानी का माहौल न बन जाए
  • प्रैक्टिकल लेवल पर, बच्चा किसी रिश्तेदार के फोन या फर्जी अकाउंट से प्लेटफॉर्म पर चला ही जाए, तो क्या होगा?
  • अगर स्कूल असाइनमेंट, ऑनलाइन क्लासेज या ग्रुप्स के लिए ही सोशल मीडिया या ऐप्स की जरूरत पड़ जाए, तो हर बार कानून की दिक्कत न बन जाए

इसलिए आगे आने वाले समय में माता–पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा कि वे सिर्फ “बैन” या “नॉन–बैन” पर नहीं, बल्कि डिजिटल लिटरेसी पर फोकस करें – बच्चों से खुलकर बात करना, सीमाएं तय करना, खुद रोल मॉडल बनना और समय–समय पर उनकी ऑनलाइन दुनिया के बारे में जानने की कोशिश करना।

बच्चों और टीनेजर्स पर मनोवैज्ञानिक असर

किसी भी नियम या बैन का डायरेक्ट और इंडायरेक्ट साइकोलॉजिकल असर होता है।

पॉज़िटिव साइड:

  • अगर 13–14 साल के बच्चों की स्क्रीन टाइम कम होती है, खासकर देर रात की, तो नींद बेहतर होगी
  • साइबर बुलिंग, FOMO (fear of missing out), फॉलोअर्स–कमेंट्स के प्रेशर से थोड़ा राहत मिलेगी
  • पढ़ाई, खेलकूद और ऑफलाइन एक्टिविटीज़ को ज़्यादा टाइम मिल सकता है

नेगेटिव या चैलेंज साइड:

  • बच्चे “बैन” को रेबेल करने का कारण भी मान सकते हैं और चोरी–छुपे, या और ख़तरनाक प्लेटफॉर्म्स पर चले जाएं
  • अगर कानून बहुत सख्त और बिना ग्राउंड रियलिटी समझे बनाया गया, तो उसका फायदा जुगाड़ और फर्जी अकाउंट बनाने वाली साइट्स उठा सकती हैं
  • सोशल मीडिया पूरी तरह हटाने के बजाय, ज़िम्मेदार और संतुलित यूज़ सिखाना ज़्यादा टिकाऊ समाधान हो सकता है

भारत का आगे का रास्ता: कैसा कानून आ सकता है?

हाल ही में भारत ने डेटा प्रोटेक्शन से जुड़ा कानून (DPDP Act) पास किया है, जिसमें बच्चों के डेटा और टार्गेटेड एड्स पर अलग प्रावधान हैं। अब अगर आर्थिक सर्वे की बातों को आगे बढ़ाया गया, तो संभव है कि:

  • अलग से “चाइल्ड ऑनलाइन सेफ्टी” या “डिजिटल सेफ्टी फॉर मिनर्स” पर नियम बनें
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए आयु–आधारित वेरिफिकेशन को कानूनन अनिवार्य किया जाए
  • गैंबलिंग और हाई–रिस्क ऐप्स पर 18+ KYC सख्ती से लागू कराई जाए
  • ऑनलाइन गेमिंग, ऑटो–प्ले और एल्गोरिदमिक रिकमेंडेशन पर बच्चों के लिए अलग लिमिट तय की जाए

साथ ही, बहुत मुमकिन है कि सरकार सीधे–सीधे एकदम सख्त ऑस्ट्रेलिया जैसा बैन न लाकर, भारतीय संदर्भ में थोड़ा फ्लेक्सिबल लेकिन जिम्मेदार मॉडल अपनाए – जैसे 13–16 साल के बच्चों के लिए पैरेंटल कंसेंट, लिमिटेड फीचर्स और स्ट्रिक्ट कंटेंट फिल्टर।

आर्थिक सर्वे की बात का असली मतलब क्या समझना चाहिए?

कई लोग पूछेंगे – “क्या इसका मतलब है कि कल से ही बच्चों का सोशल मीडिया बंद हो जाएगा?” जवाब है – नहीं।

आर्थिक सर्वे सिर्फ यह बता रहा है कि सरकार की नजर इस मुद्दे पर है और वह इसे पॉलिसी बहस में ला रही है। इसके बाद:

  • संसद में चर्चा हो सकती है
  • एक्सपर्ट कमेटी, IT और शिक्षा मंत्रालय, चाइल्ड राइट्स बॉडीज़ आदि अपने–अपने सुझाव दे सकते हैं
  • इंडस्ट्री और सिविल सोसायटी के इनपुट लिए जा सकते हैं
  • फिर कहीं जाकर कानून या नियमों का ड्राफ्ट बनेगा

लेकिन हां, ये साफ संकेत ज़रूर है कि “जो चल रहा है उसे चलने दो” वाला दौर शायद खत्म होने की तरफ है। आने वाले समय में बच्चों की ऑनलाइन दुनिया पर नियम और संरचना दोनों और क्लियर होते नज़र आएंगे।

निष्कर्ष: बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा – अब सिर्फ घर की नहीं, सिस्टम की भी जिम्मेदारी

भारत के आर्थिक सर्वे 2025-26 ने एक तरह से आधिकारिक मान्यता दे दी है कि:

  • सोशल मीडिया, गेमिंग ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का बच्चों पर गहरा असर पड़ रहा है
  • इस असर को सिर्फ “पैरेंटिंग का मामला” कहकर छोड़ना अब पर्याप्त नहीं है
  • प्लेटफॉर्म्स को भी अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी – उम्र की जांच, सेफ डिफॉल्ट सेटिंग्स और हाई–रिस्क फीचर्स पर लिमिट्स के जरिए

ऑनलाइन दुनिया अब बच्चों की रियल दुनिया का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में स्कूल, परिवार, सरकार और टेक कंपनियां – सबको मिलकर सोचना पड़ेगा कि ये दुनिया सुरक्षित, संतुलित और हेल्दी कैसे बने।

शायद आने वाले सालों में हम देखेंगे कि बच्चों के लिए “सोशल मीडिया अकाउंट बनाना” वैसा ही रेगुलेटेड काम होगा जैसा ऑफलाइन दुनिया में ड्राइविंग लाइसेंस या बैंक अकाउंट खोलना होता है – उम्र की शर्त, जिम्मेदारी, और नियमों के साथ।

अभी के लिए सबसे ज़रूरी है कि हम इस बहस को “बैन बनाम फ्रीडम” के बजाए “सेफ्टी बनाम लापरवाही” के फ्रेम में देखें – ताकि बच्चों की भलाई के साथ–साथ उनकी प्राइवेसी, सीखने की आज़ादी और डिजिटल भविष्य भी सुरक्षित रह सके।


FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: क्या आर्थिक सर्वे की वजह से तुरंत बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद हो जाएंगे?
उत्तर: नहीं, आर्थिक सर्वे कोई सीधा कानून नहीं होता। यह सरकार और संसद को सुझाव और दिशा देता है। अभी सिर्फ यह संकेत मिला है कि सरकार बच्चों की ऑनलाइन सेफ्टी और सोशल मीडिया पर उम्र आधारित लिमिट्स पर गंभीरता से विचार कर रही है। असली बदलाव कानून या नियम आने पर ही होंगे।

प्रश्न 2: आर्थिक सर्वे सोशल मीडिया के लिए क्या मुख्य सुझाव दे रहा है?
उत्तर: सर्वे कहता है कि प्लेटफॉर्म्स को age verification लागू करना चाहिए, बच्चों के लिए age-appropriate defaults यानी सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग्स देनी चाहिए, और खासकर सोशल मीडिया, गैंबलिंग ऐप्स, ऑटो-प्ले वीडियो और टार्गेटेड एड्स जैसे फीचर्स पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

प्रश्न 3: ऑस्ट्रेलिया ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर क्या कदम उठाया है?
उत्तर: ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट्स पर नेशनल लेवल पर सख्त पाबंदी की दिशा में कदम उठाया है। वहां अंडर-16 बच्चों के नाम से सोशल मीडिया अकाउंट को पूरी तरह बैन या कड़ी उम्र–जांच के बिना अनुमति न देने जैसे मॉडल पर काम हो रहा है।

प्रश्न 4: आंध्र प्रदेश सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है?
उत्तर: आंध्र प्रदेश के टेक्नोलॉजी और ह्यूमन रिसोर्सेज मंत्री नारा लोकेश ने कहा है कि राज्य सरकार ऑस्ट्रेलिया के under-16 मॉडल का अध्ययन कर रही है और वे भारत में भी बच्चों के लिए मजबूत कानूनी सुरक्षा की जरूरत महसूस करते हैं। इससे पता चलता है कि राज्य स्तर पर भी इस विषय पर गंभीर सोच चल रही है।

प्रश्न 5: पेरेंट्स अभी क्या कर सकते हैं, जब तक कानून नहीं आता?
उत्तर: माता–पिता फिलहाल अपने स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं – जैसे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर लिमिट लगाना, उनसे खुलकर सोशल मीडिया और ऑनलाइन रिस्क पर बातचीत करना, फोन–कम्प्यूटर पर पेरेंटल कंट्रोल और प्राइवेसी सेटिंग्स सही करना, बच्चों के फ्रेंड लिस्ट और फॉलो की जाने वाली प्रोफाइल्स पर नज़र रखना, और खुद भी संतुलित डिजिटल आदतों का उदाहरण बनना। कानून मदद करेगा, लेकिन रोज़मर्रा की सुरक्षा की शुरुआत घर से ही होगी।

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