पुणे एयरपोर्ट के Arrivals में AI-पावर्ड ह्यूमनॉइड रोबोट Spaceo M1 का 8–10 दिन का ट्रायल शुरू हुआ है। यह यात्रियों को नेविगेशन, रेस्टोरेंट ढूंढने, कैब बुकिंग, लोकल जानकारी, रियल-टाइम फ्लाइट अपडेट, गेट-चेंज अनाउंसमेंट जैसी सेवाएं दे सकता है और 85+ भाषाओं में बातचीत करता है।
टिकट का QR स्कैन करो, गेट नंबर जानो: पुणे एयरपोर्ट पर Spaceo M1 रोबोट की एंट्री, 35+ काम अकेले
पुणे एयरपोर्ट पर ट्रैवल असिस्टेंस का नया दौर: Spaceo M1 ह्यूमनॉइड रोबोट का ट्रायल शुरू
पुणे एयरपोर्ट पर इस हफ्ते यात्रियों का स्वागत एक “अलग तरह के गाइड” से हो रहा है—एक ह्यूमनॉइड रोबोट, जिसका नाम Spaceo M1 है। यह रोबोट पुणे की कंपनी Muks Robotics ने डेवलप किया है और फिलहाल एयरपोर्ट पर 8 से 10 दिन के ट्रायल पर चल रहा है। यह पुणे एयरपोर्ट पर इस तरह की तकनीक का पहला पायलट डिप्लॉयमेंट माना जा रहा है और अभी Arrivals एरिया में ऑपरेशनल है।
इस ट्रायल का मकसद सिर्फ “डेमो” करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि असली भीड़, अलग-अलग उम्र के यात्रियों, और अलग-अलग जगहों (एंट्रेंस, चेक-इन, बोर्डिंग गेट, बैगेज क्लेम) में रोबोट कितना ठीक काम कर पाता है। एयरपोर्ट मैनेजमेंट यह भी देख रहा है कि यात्रियों का रिस्पॉन्स कैसा रहता है और तकनीकी तौर पर यह कितनी स्थिरता से चल सकता है।
Spaceo M1 क्या करता है? यात्रियों के लिए सीधे-सीधे फायदे
Spaceo M1 का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह एक “चलने-फिरने वाला” हेल्प डेस्क है, यानी यह सिर्फ स्क्रीन या कियोस्क की तरह एक जगह खड़ा नहीं रहता। यह यात्रियों के साथ चलकर दिशा बताने, जरूरी जगह तक पहुंचाने और छोटे-छोटे टास्क में मदद कर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, Spaceo M1 यात्रियों को एयरपोर्ट के अंदर नेविगेशन, रेस्टोरेंट ढूंढने, कैब बुक करने और लोकल अट्रैक्शंस की जानकारी देने जैसे कामों में मदद करता है। यानी लैंड करने के बाद “अब कहां जाना है?” और “किससे मदद मांगें?” वाली चिंता कम करने की कोशिश है।
35+ टास्क, रियल-टाइम फ्लाइट अपडेट और गेट-चेंज अनाउंसमेंट
Muks Robotics के फाउंडर और CEO डॉ. मुकेश बांगड़ के हवाले से कहा गया है कि Spaceo M1 सोशलली इंटरएक्टिव है और 35 से ज्यादा काम अपने आप कर सकता है। यह रियल-टाइम फ्लाइट जानकारी दे सकता है, गेट बदलने की घोषणा कर सकता है और यात्रियों को चेक-इन काउंटर, बोर्डिंग गेट, वॉशरूम और अन्य सुविधाओं तक गाइड कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में, अगर लाइव फ्लाइट शेड्यूल डेटा से इंटीग्रेशन हो जाए, तो यात्री अपना टिकट QR कोड स्कैन करके तुरंत बोर्डिंग गेट नंबर देख सकेंगे। यह फीचर खास तौर पर उन यात्रियों के लिए उपयोगी हो सकता है जिन्हें एयरपोर्ट पर बार-बार स्क्रीन ढूंढनी पड़ती है या जो किसी बदलाव की सूचना मिस कर देते हैं।
मोबाइल रोबोट कैसे चलता है? व्हील-बेस्ड डिजाइन और 60 किलो लगेज सपोर्ट
Spaceo M1 व्हील-बेस्ड (पहियों वाला) मॉडल है, इसलिए यह फ्लैट सतहों पर ऑटोनॉमस तरीके से नेविगेट कर सकता है और जरूरत पड़े तो यात्रियों के साथ-साथ चल भी सकता है। रोबोट 60 किलोग्राम तक का लगेज कैरी करने की क्षमता रखता है, जो एयरपोर्ट पर बुजुर्ग यात्रियों या भारी सामान वाले लोगों के लिए मददगार हो सकता है।
इसके साथ ही, रोबोट में सेंसर लगाए गए हैं जो “सस्पिशस एक्टिविटी” डिटेक्ट करने में मदद कर सकते हैं, यानी यह बेसिक सिक्योरिटी सपोर्ट भी दे सकता है—हालांकि इसका मुख्य फोकस पैसेंजर असिस्टेंस ही बताया गया है।
85+ भाषाओं में बातचीत: भारतीय यात्रियों के लिए बड़ा प्लस
एयरपोर्ट पर सबसे बड़ी परेशानी भाषा भी होती है, खासकर तब जब देश-विदेश के लोग एक ही जगह हों। Spaceo M1 85 से ज्यादा भाषाओं में संवाद कर सकता है, जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, तमिल और तेलुगु जैसी भाषाएं शामिल हैं। इससे यह घरेलू यात्रियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए भी अधिक सुलभ बनता है।
पुणे एयरपोर्ट डायरेक्टर संतोष धोके ने ट्रायल की पुष्टि करते हुए कहा कि एक प्राइवेट कंपनी ने पैसेंजर असिस्टेंस के लिए रोबोट टेस्ट करने का प्रस्ताव दिया था और एयरपोर्ट ने 8–10 दिनों की अनुमति दी है ताकि परफॉर्मेंस, पैसेंजर रिस्पॉन्स और टेक्निकल कैपेबिलिटी को मॉनिटर किया जा सके।
कियोस्क बनाम मोबाइल रोबोट: क्या फर्क पड़ता है?
नीचे एक छोटा सा समझने वाला टेबल है ताकि साफ हो जाए कि एयरपोर्ट पर रोबोट लाने का “प्रैक्टिकल फायदा” क्या हो सकता है।
टेबल: Kiosk/Screen बनाम Spaceo M1 (Mobile Robot)
ट्रायल सफल हुआ तो आगे क्या? कितने रोबोट लग सकते हैं
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ट्रायल सफल रहता है तो Spaceo M1 एयरपोर्ट पर स्थायी रूप से लगाया जा सकता है। डॉ. बांगड़ के अनुसार, पुणे जैसे साइज के एयरपोर्ट को सभी क्षेत्रों को कवर करने के लिए कम से कम तीन ऐसे रोबोट चाहिए होंगे।
कंपनी का यह भी प्लान है कि मार्च की शुरुआत में पुणे मेट्रो के सिविल कोर्ट स्टेशन पर इस रोबोट का परीक्षण किया जाए। आगे चलकर नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (नेरुल के पास) में संभावित डिप्लॉयमेंट की बात भी कही गई है।
सीमाएं भी हैं: सीढ़ियां और मल्टी-फ्लोर नेविगेशन अभी चुनौती
जहां यह टेक्नोलॉजी आकर्षक है, वहीं इसकी सीमाएं भी साफ हैं। फिलहाल यह व्हील-बेस्ड मॉडल सिर्फ फ्लैट सतहों पर काम कर सकता है और सीढ़ियां या एलिवेटर नेविगेट नहीं कर सकता। इसी कमी को दूर करने के लिए कंपनी बाइपेडल (दो पैरों पर चलने वाला) वर्जन विकसित कर रही है, जो मल्टी-फ्लोर एनवायरमेंट में अधिक उपयोगी हो सकता है।
ट्रायल के दौरान इसी बात को भी जांचा जा रहा है कि अलग-अलग ज़ोन, भीड़ के अलग-अलग स्तर और पैसेंजर वॉल्यूम में रोबोट की परफॉर्मेंस कैसी रहती है। क्योंकि एयरपोर्ट में असली टेस्ट “भीड़ के समय” ही होता है, जब हर चीज तेज़ी से बदलती है।
भविष्य में और कौन से काम कर सकता है Spaceo M1?
रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरी तरह डिप्लॉय होने पर Spaceo M1 अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी ले सकता है, जैसे सीनियर सिटीजन्स की विशेष सहायता, टिकट स्कैनिंग, और पब्लिक अनाउंसमेंट। अगर यह सही इंटीग्रेशन के साथ लागू होता है, तो एयरपोर्ट स्टाफ पर बोझ घट सकता है और यात्रियों को ज्यादा पर्सनलाइज्ड मदद मिल सकती है।
FAQs (5)
- Spaceo M1 क्या है और यह कहां तैनात हुआ है?
Spaceo M1 एक AI-पावर्ड ह्यूमनॉइड रोबोट है, जिसका पुणे एयरपोर्ट पर 8–10 दिन का ट्रायल चल रहा है और फिलहाल यह Arrivals एरिया में ऑपरेशनल है। - यह रोबोट यात्रियों की कैसे मदद करता है?
यह एयरपोर्ट नेविगेशन, रेस्टोरेंट ढूंढने, कैब बुकिंग और लोकल अट्रैक्शंस की जानकारी जैसे कामों में मदद करता है, साथ ही रियल-टाइम फ्लाइट जानकारी और गेट-चेंज अनाउंसमेंट भी कर सकता है। - क्या Spaceo M1 कई भाषाओं में बात कर सकता है?
हां, यह 85+ भाषाओं में संवाद कर सकता है, जिनमें हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, तमिल और तेलुगु जैसी भाषाएं शामिल हैं। - क्या यह लगेज भी उठा सकता है?
हां, रिपोर्ट के मुताबिक यह 60 किलोग्राम तक का लगेज कैरी कर सकता है। - इसकी सबसे बड़ी सीमा क्या है?
यह व्हील-बेस्ड मॉडल है, इसलिए फिलहाल सिर्फ फ्लैट सतहों पर काम करता है और सीढ़ियां/एलिवेटर नेविगेट नहीं कर सकता; कंपनी इसके लिए बाइपेडल वर्जन विकसित कर रही है।
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