पूर्वी बेड़े की बढ़ी ताकत, रक्षा मंत्री ने विशाखापत्तनम में किया कमिशन
विशाखापत्तनम : भारतीय नौसेना की युद्धक क्षमता और आत्मनिर्भरता के इतिहास में आज एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में आयोजित एक भव्य और पारंपरिक समारोह में स्वदेशी रूप से निर्मित उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस महेन्द्रगिरि’ (INS Mahendragiri) को औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े (सनराइज फ्लीट) में शामिल कर लिया गया।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित इस समारोह में पारंपरिक रूप से कमीशनिंग पताका को तोड़कर जहाज पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन, पूर्वी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमान-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय भल्ला और एमडीएल के सीएमडी कैप्टन जगमोहन (सेवानिवृत्त) सहित कई वरिष्ठ सैन्य और असैन्य अधिकारी उपस्थित थे।
जहाज निर्माण में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नया प्रतीक
अपने संबोधन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘आईएनएस महेन्द्रगिरि’ को जहाज निर्माण में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का जीवंत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह युद्धपोत भारत की असाधारण डिजाइन क्षमताओं, विनिर्माण उत्कृष्टता और नौसेना-आद्योगिक तंत्र के तीव्र विकास का प्रमाण है।
“यह समुद्री पोत न केवल तट के पास, बल्कि गहरे महासागरों में भी भारत के समुद्री हितों की रक्षा करेगा।”
— राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री
प्रोजेक्ट 17ए (Project 17A) की अभूतपूर्व सफलता
‘आईएनएस महेन्द्रगिरि’ प्रोजेक्ट 17ए के अंतर्गत आने वाला छठा स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट है। विशेष बात यह है कि इसे मात्र डेढ़ वर्ष के अंतराल में नौसेना में शामिल किया गया है। इस श्रृंखला के अन्य जहाजों का विवरण इस प्रकार है:
- जनवरी 2025: आईएनएस नीलगिरि (पहला जहाज)
- अगस्त 2025: आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि
- अप्रैल 2026: आईएनएस तारागिरि
- जून 2026: आईएनएस दुनागिरि
- जुलाई 2026: आईएनएस महेन्द्रगिरि (वर्तमान)
इस जहाजी बेड़े को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया है और मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) द्वारा निर्मित किया गया है।
समय सीमा में ऐतिहासिक कमी: केवल एक सी-ट्रायल में पास
नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने आईएनएस महेन्द्रगिरि को भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता का प्रतीक बताते हुए एमडीएल और नौसेना के संयुक्त प्रयासों की सराहना की। उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट में निर्माण और डिलीवरी के समय में रिकॉर्ड कमी आई है:
- लॉन्च से डिलीवरी का समय: 63 महीने से घटकर मात्र 31 महीने (लगभग 50% की कमी) रह गया।
- कुल निर्माण समय: 95 महीने से घटकर 75 महीने (लगभग 20% की कमी) हो गया।
- सी-ट्रायल: सामान्यतः लगने वाले 5 से 7 समुद्री परीक्षणों के बजाय, सभी तकनीकी विश्लेषण केवल एक ही समुद्री परीक्षण में पूरे कर लिए गए।
अत्याधुनिक हथियारों और स्वदेशी तकनीक से लैस
75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित यह युद्धपोत बेहद शक्तिशाली और आधुनिक है।
प्रमुख विशेषताएं और क्षमताएं:
- विस्थापन और गति: इसका वजन लगभग 6,670 टन है और यह 28 समुद्री मील (Knots) प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकता है।
- शस्त्रागार: यह दुनिया की सबसे तेज और घातक क्रूज मिसाइलों में से एक ब्रह्मोस (सतह से सतह पर मार करने वाली) मिसाइल से सुसज्जित होने में सक्षम है।
- रक्षा प्रणालियां: इसमें बहुक्रियाशील रडार, लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर, टॉरपीडो लॉन्चर, एकीकृत पनडुब्बी रोधी रक्षा प्रणाली और क्लोज-इन वेपन सिस्टम शामिल हैं।
- मल्टी-रोल क्षमताएं: यह वायु रक्षा, सतह-विरोधी युद्ध, पनडुब्बी-रोधी युद्ध, समुद्री अवरोधन, निगरानी के साथ-साथ मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियानों को पूरा करने में सक्षम है।
पारंपरिक सैन्य शक्ति और आधुनिक तकनीक का संतुलन
रक्षा मंत्री ने उभरती प्रौद्योगिकियों जैसे एआई (AI), साइबर युद्ध, हाइपरसोनिक हथियार और ड्रोन के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि पारंपरिक सैन्य क्षमताएं ही प्रभावी रक्षा का आधार बनी रहेंगी। उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उदाहरण देते हुए इसे पारंपरिक और आधुनिक क्षमताओं के एकीकरण का उत्कृष्ट नमूना बताया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा आपस में जुड़ी हुई हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना ने ‘ऊर्जा सुरक्षा अभियान’ के तहत 9,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के आवश्यक माल से लदे 18 व्यापारिक जहाजों की रक्षा की है, जो भारत के आर्थिक हितों की रक्षा के प्रति नौसेना की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आईएनएस महेन्द्रगिरि: एक नजर में
- नामकरण: पूर्वी घाट की महेन्द्रगिरि पर्वत श्रृंखला के नाम पर।
- आदर्श वाक्य: ‘शक्तिशाली, विशाल, अद्वितीय’।
- प्रणोदन: संयुक्त डीजल या गैस (CODOG) प्रणोदन प्रणाली।
- औद्योगिक योगदान: 200 से अधिक भारतीय उद्योगों (जिसमें कई एमएसएमई शामिल हैं) के सहयोग से निर्मित।
‘आईएनएस महेन्द्रगिरि’ के शामिल होने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ‘सागर’ (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) विजन के तहत भारत की स्थिति एक ‘प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता’ (First Responder) और ‘पसंदीदा सुरक्षा भागीदार’ के रूप में और अधिक मजबूत होगी।
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