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Australia के जंगल पहले से ज़्यादा CO₂ छोड़ रहे हैं

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Australia के ट्रॉपिकल वर्षावनें अब तक के आंकड़ों के अनुसार कार्बन सोखने के बजाय उत्सर्जित कर रही हैं—परिवर्तन की वजहें व वैश्विक असर जानें।

Australia के ट्रॉपिकल वर्षावनों में बड़ा उलटफेर: अब उत्सर्जन हो रहा है सोखने की जगह

विश्व में वर्षावनें (रेनफॉरेस्ट्स) को “कार्बन सिंक” माना गया है — वो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) सोखती थीं, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करने में मदद मिलती थी। लेकिन हाल-हि में प्रकाशित एक शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है: अब Queensland (ऑस्ट्रेलिया) के ट्रॉपिकल वर्षावनें ज़्यादा कार्बन उत्सर्जित कर रही हैं जितनी वो सोख पा रही थीं। यह सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक कार्बन-बजट और जलवायु-नीति के लिए सतर्कता-का संदेश बन सकती है।


क्या हुआ है? स्थिति स्पष्ट करें

इस अध्ययन के तहत ऑस्ट्रेलिया के ट्रॉपिकल वर्षावनों में पिछले पाँच या छह दशकों के ट्रेंड का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में मुख्य बिंदु ये मिले:

  • पहले वर्षावनें हर वर्ष “नेट” कुल मिलाकर कार्बन सोखती थीं — यानी उत्सर्जित कार्बन से अधिक सोखा करती थीं।
  • लेकिन अब हाल-कहा वर्षों में सोखने की क्षमता में कमी आई है, जबकि उत्सर्जन बढ़ा है — यानी उत्सर्जित > सोखा की स्थिति बनी है।
  • उदाहरण के लिए, एक अध्ययन ने यह पाया कि 1970-80 के दशक में प्रति हे्क्‌टेयर वर्षावनें करीब 600-700 किलोग्राम कार्बन प्रति वर्ष सोख रही थीं; लेकिन 2010-2019 की अवधि में वे लगभग 900-1000 किलोग्राम प्रति हे्क्‌टेयर कार्बन प्रति वर्ष उत्सर्जित होने लगी थीं।
  • इस बदलती स्थिति का मुख्य कारण पेड़ों की मृत्यु दर, पुनरुत्थान की कमी, वृक्ष वृद्धि की धीमी गति, तथा चरम जलवायु-प्रभाव (सूखा, तापमान उछाल, सुखी-हवा) बताया गया है।

क्यों हुआ यह बदलाव? मुख्य-कारक

पेड़ मृत्यु व अपघटन बढ़ा

पेड़ जब मर जाते हैं, तो उनका जड़-तना, तना-शाखाएँ, पत्ते कार्बन को जीवित अवस्था में रखा नहीं पाते और अपघटन (डिके) के अनुसार उस कार्बन को वातावरण में छोड़ देते हैं। जब मृत्यु-दर बढ़ जाती है और नए पेड़ पर्याप्त नहीं उग पाते, तो संतुलन टूट जाता है।

प्रतिरूप-वृद्धि कम हुई

कार्बन-डीऑक्साइड का बढ़ना सामान्यतः वृक्ष वृद्धि को बढ़ावा देता है (फर्टिलाइजर-इफेक्ट) लेकिन इस क्षेत्र में देखा गया है कि जलवायु-दबाव, पोषक तत्व-सीमितता तथा अन्य तनावों ने इस प्रभाव को कमजोर कर दिया है।

तापमान व जलवायु चरम घटक

उच्च तापमान, लंबे सूखे, और शुष्क वातावरण वर्षावनों को प्रभावित कर रहे हैं। वर्षावनों की प्राकृतिक सहन-क्षमता सीमित हो रही है। इस प्रकार लंबे समय में सोखने-की क्षमता घट रही है।

प्राकृतिक आपदाओं एवं मानव-दखल

चक्रवात, मध्यम-तूफान, अधिक प्रमुख जंगल कटाई और भूमि-उपयोग संचालन ने इन वर्षावनों को प्रभावित किया है। जब वृक्षचक्र टूटता है, तो कार्बन-अवशेष उत्सर्जित होते हैं।


इसका वैश्विक और पर्यावरण-प्रभाव

  • यदि ट्रॉपिकल वर्षावनें जो पहले कार्बन-सिंक थीं, अब उत्सर्जन-स्रोत बन जाती हैं तो ग्लोबल कार्बन बजट — जिसपर देश-व्यापी उत्सर्जन-लक्ष्य तय किए जाते हैं — प्रभावित होगा।
  • इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में वही वर्षावनें जो उत्सर्जन-रोकने में सहायक थीं, अब सक्रिय रूप से ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा सकती हैं
  • नीति-निर्माताओं को अब इस प्रकार के बदलाव को ध्यान में रखते हुए उत्सर्जन-लक्ष्य, कार्बन क्रेडिट-रूपरेखा और वन-नीति-परिवर्तन पर पुनर्विचार करना होगा।
  • जैव-विविधता पर प्रभाव: जब पेड़ मरेंगे या वर्षावन संरचना बदल जाएगी, तो तमाम प्रजातियों का जीवन-चक्र प्रभावित होगा।

क्या किया जा सकता है? आगे का प्लान

बेहतर मॉनिटरिंग व डेटा-संग्रह

दूरस्थ-सेंसर, लंबी अवधि के वन-डेटासेट्स, उपग्रह-एमेजरी और स्थल-मॉनिटरिंग को बढ़ावा देना होगा ताकि समय-सापेक्ष बदलावों को तुरंत पकड़ा जा सके।

वर्षावन संरक्षण व पुनरुद्धार

मृत पेड़ों को समय पर हटाना, नए वृक्षारोपण करना, प्राकृतिक पुनरुत्थान को प्रोत्साहित करना चाहिए। साथ-ही मानव-प्रभाव को कम करना अतिआवश्यक है।

जलवायु-सहनशील वन-मॉडल अपनाना

वन योजनाओं में उन प्रजातियों को शामिल करें जो उच्च तापमान, कम आर्द्रता और सूखे-विरोधी होती हैं। प्राकृतिक वर्षावन को जलवायु-परिवर्तन के अनुरूप ढालना होगा।

स्थानीय-समुदायों व भूमि-उपयोग नीति

वन-क्षेत्रों के पास रहने वाले समुदायों को संरक्षण-योजनाओं में शामिल करें, और भूमि-उपयोग को इस तरह समायोजित करें कि जंगलों को कटाव-विस्तार से सुरक्षा मिले।

उत्सर्जन-रोकथाम और ऊर्जा-परिवर्तन

जंगल-शोषण के अलावा जीवाश्म-ईंधन-उपयोग, भू-उपयोग-परिवर्तन आदि पर नियंत्रण चाहिए ताकि जंगल-उपादित बदलाव को कम किया जा सके।


ऑस्ट्रेलिया में ट्रॉपिकल वर्षावनों का “सोखने से उत्सर्जन” की ओर जाना सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि पर्यावरण-विज्ञान में एक निदान-रेट है। इसका मतलब है कि हमें वर्षावनों को सिर्फ “प्राकृतिक फिक्सर” नहीं मान सकते — बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से संरक्षित, लागू और अनुकूलित करना होगा। यदि यह बदलती प्रवृत्ति अन्य वर्षावनों में भी देखने को मिली, तो यह ग्लोबल क्लाइमेट रणनीतियों के लिए एक चेतावनी-घंटी है। समय रहते कार्रवाई करना महत्त्वपूर्ण है—नहीं तो हमारे “हरे फेफड़े” स्वयं हमें कार्बन देने लगेंगे।


FAQs

  1. यह बदलाव कब से दिखाई दे रहा है?
    – पिछले कुछ दशकों में यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे उभरी है; हाल-कहा वर्षों में विशेष रूप से प्रति-हेक्‌टेयर उत्सर्जन में वृद्धि देखी गई है।
  2. क्या यह सिर्फ ऑस्ट्रेलिया-तक सीमित है?
    – इस अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया पर फोकस रहा है, लेकिन शोध ये संकेत देते हैं कि अन्य ट्रॉपिकल वर्षावनें भी इसी तरह प्रतिक्रिया दे सकती हैं।
  3. वर्षावनें पहले कितनी कार्बन सोखती थीं?
    – एक अनुमान के अनुसार 1970-80 के दौर में प्रति हे­क्‌टेयर वर्षावनें 600-700 किलोग्राम को लगभग सोखती थीं।
  4. इस बदलाव से ग्लोबल वार्मिंग पर क्या असर होगा?
    – यदि वर्षावनें कार्बन सोखने-की जगह उत्सर्जित करने लगीं, तो उत्सर्जन-लक्ष्य पर दबाव बढ़ेगा और ग्लोबल वार्मिंग नियंत्रण मुश्किल होगा।
  5. आम तौर पर हम क्या कर सकते हैं?
    – वन संरक्षण-उपायों का समर्थन करें, वन-उपयोग नीति पर ध्यान दें, स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा दें और व्यक्तिगत रूप से उत्सर्जन-परिचालन में जिम्मेदारी अपनाएं।
  6. क्या इस स्थिति में पेड़ लगाना मदद करेगा?
    – हाँ, लेकिन सिर्फ पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं; सही प्रजाति, सही स्थान, उचित देखभाल और जलवायु-अनुकूल डिजाइन की आवश्यकता है।

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