ED ने चालू वित्त वर्ष में मनी-लॉन्ड्रिंग मामलों में 500 चार्जशीट/प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट दाखिल करने का लक्ष्य तय किया है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि केस दर्ज होने के बाद, “असाधारण जटिल” मामलों को छोड़कर जांच 1–2 साल में पूरी की जाए और समन/नोटिस सोच-समझकर, निष्पक्षता व जवाबदेही के साथ जारी हों।
ED Director राहुल नवीन की बैठक में फैसला: 500 प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट्स, समन “जुडिशियसली” जारी करने की हिदायत
ED का नया एक्शन प्लान: 500 चार्जशीट का लक्ष्य, मनी-लॉन्ड्रिंग जांच 1–2 साल में पूरी करने का निर्देश
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने चालू वित्त वर्ष में मनी-लॉन्ड्रिंग मामलों में 500 प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट/चार्जशीट दाखिल करने का टारगेट तय किया है। एजेंसी ने अपने जांच अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि एक बार केस दर्ज होने के बाद, “जटिल” मामलों को छोड़कर जांच को 1 से 2 साल के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए। ED का कहना है कि इस दिशा में कदम इसलिए उठाए जा रहे हैं ताकि लंबे समय से लंबित मामलों का निपटारा हो और नई जांचों का “लाइफ-साइकिल” अनावश्यक रूप से लंबा न चले।
यह रोडमैप ED की 34वीं Quarterly Conference of Zonal Officers (QCZO) में चर्चा के बाद तय किया गया, जो 19 से 21 दिसंबर (पिछले साल) असम की राजधानी गुवाहाटी में हुई थी। इस बैठक की अध्यक्षता ED Director राहुल नवीन ने की। ED ने बताया कि यह मौजूदा वित्त वर्ष (31 मार्च) खत्म होने से पहले होने वाली आखिरी तिमाही बैठक थी, इसलिए इसमें टारगेट और डिलीवरी पर खास जोर रखा गया।
क्यों आया “1–2 साल में जांच पूरी” वाला फोकस?
ED के बयान के मुताबिक, अधिकारियों को यह संदेश दिया गया कि टारगेट “meaningful” तरीके से हासिल हों, जांच का “logical conclusion” निकले, समय पर प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट दाखिल की जाए और अटैचमेंट/पेनल्टी कानूनी रूप से टिकाऊ तथा प्रभावी तरीके से “realise” हो। इसी वजह से 500 प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट का टारगेट दोहराया गया और साथ ही संकेत दिया गया कि अगले वित्त वर्ष में लक्ष्य और बढ़ सकता है।
एजेंसी ने साफ कहा कि बढ़े हुए लक्ष्य की जरूरत इसलिए है ताकि पुराने मामलों को प्रो-एक्टिव तरीके से खत्म किया जा सके और नए मामलों की जांच की अवधि 1–2 साल के “reasonable time frame” में लाई जा सके। हालांकि ED ने यह छूट भी रखी है कि “exceptionally complex” मामलों में अधिक समय लग सकता है।
PMLA की शक्तियां और “जिम्मेदारी”: समन/नोटिस पर खास हिदायत
ED ने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि PMLA (Prevention of Money Laundering Act) के क्रिमिनल सेक्शंस के तहत जो शक्तियां मिली हैं, उनके साथ “caution, fairness and accountability” की जिम्मेदारी भी आती है। एजेंसी ने सलाह दी कि समन और अन्य वैधानिक नोटिस “जुडिशियसली” यानी सोच-समझकर जारी किए जाएं—केवल स्पष्ट जरूरत, उचित कारण और “application of mind” के आधार पर।
यह लाइन इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल के वर्षों में ED के समन और पूछताछ की प्रक्रिया पर राजनीतिक बहस और कानूनी बहस तेज रही है। एजेंसी का संदेश है कि कार्रवाई का असर लोगों और संस्थानों पर पड़ता है, इसलिए हर कदम का कानूनी और प्रक्रियात्मक आधार मजबूत होना चाहिए।
ED की “Priority Areas”: किन-किन मोर्चों पर बढ़ेगा फोकस?
QCZO बैठक में ED ने कई प्राथमिक क्षेत्रों को चिन्हित किया। इनमें विदेशों में छिपी अवैध संपत्तियों (illicit assets abroad) को ट्रैक करना, ट्रेड चैनलों के जरिए मनी-लॉन्ड्रिंग की पहचान, और Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के कथित दुरुपयोग जैसे मुद्दे शामिल हैं।
इसके अलावा ED ने कहा कि “digital-arrest” और साइबर-फ्रॉड मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनके मामलों में “sharp rise” देखा जा रहा है। साथ ही, देश में illegal-betting और online-gaming प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते नेटवर्क, शेयर बाजार में मैनिपुलेशन के जरिए मनी-लॉन्ड्रिंग और विदेशी फंडिंग चैनलों के जरिए “unlawful narrative building”, “destabilising activities” या “anti-national purposes” जैसी आशंकाओं पर सतर्क रहने का निर्देश भी दिया गया।
इंटरपोल, BHARATPOL और “Purple Notice” का इस्तेमाल
ED ने अधिकारियों को इंटरनेशनल कोऑपरेशन पर भी स्पष्ट दिशा दी है। एजेंसी ने कहा कि इंटरपोल मैकेनिज्म और भारत के घरेलू प्लेटफॉर्म BHARATPOL के जरिए “colour notices” जारी करने की प्रक्रिया का अधिक इस्तेमाल किया जाए, विशेष रूप से “Purple” नोटिस का। ED के मुताबिक, इंटरपोल का Purple Notice अपराधियों के modus operandi, इस्तेमाल किए गए उपकरण, डिवाइस और concealment methods पर जानकारी मांगने या साझा करने के लिए होता है।
साथ ही अधिकारियों को कहा गया कि विदेशी एजेंसियों के साथ औपचारिक सहयोग के लिए MLAT requests, letters rogatory और extradition प्रक्रियाओं का अधिकतम उपयोग करें। ED ने यह भी कहा कि विदेशी समकक्ष एजेंसियों के साथ “direct professional relationships” बनाने से शुरुआती अनौपचारिक संपर्क जल्दी इंटेलिजेंस शेयरिंग में मदद करता है और बाद में औपचारिक अनुरोधों की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है।
FERA के लंबित मामलों पर डेडलाइन
ED ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अब निरस्त (repealed) हो चुके Foreign Exchange Regulation Act (FERA) के तहत लंबित सभी मामलों की adjudication 31 मार्च तक पूरी की जाए। यह निर्देश इसलिए अहम है क्योंकि पुराने FERA केस वर्षों से लंबित रहे हैं और इनके निपटारे को एजेंसी ने समय-सीमा में बांधने की कोशिश की है।
असली चुनौतियां: देरी, मंजूरी, संसाधन और डिजिटल एसेट्स
ED ने अपनी आंतरिक समीक्षा में कुछ व्यावहारिक समस्याओं को भी स्वीकार किया। बयान के मुताबिक, देरी, prosecution sanction मिलने में समय, कुछ राज्यों में पुलिस का सहयोग न मिलना, सीमित मैनपावर, दूर-दराज क्षेत्रों में लॉजिस्टिकल दिक्कतें, डिजिटाइज्ड लैंड रिकॉर्ड्स की कमी, और volatile digital assets की valuation जैसी चुनौतियां चर्चा में आईं।
यानी एजेंसी का लक्ष्य बड़ा है, लेकिन वह यह भी मान रही है कि सिस्टम में कई “बॉटलनेक्स” हैं, जिन्हें सॉल्व किए बिना 1–2 साल वाली टाइमलाइन हर केस में संभव नहीं होगी। यही कारण है कि “exceptionally complex” मामलों के लिए अलग स्पेस रखा गया है।
दूसरी एजेंसियों के साथ तालमेल
QCZO कॉन्फ्रेंस में IBBI (Insolvency and Bankruptcy Board of India), FIU (Financial Intelligence Unit), I4C (Indian Cyber Crime Coordination Centre) और NCB (Narcotics Control Bureau) जैसी एजेंसियों ने थीमैटिक प्रेजेंटेशन दिए। इससे संकेत मिलता है कि ED अपने केसवर्क में मल्टी-एजेंसी कोऑर्डिनेशन को और मजबूत करना चाहती है, खासकर साइबर और ड्रग-लिंक्ड मनी-लॉन्ड्रिंग जैसे क्षेत्रों में।
आम लोगों और बिजनेस के लिए क्या संकेत?
ED के इस रोडमैप का एक व्यावहारिक असर यह हो सकता है कि आने वाले महीनों में प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट/चार्जशीट दाखिल करने की गति बढ़े और जांचें लंबी लटकने के बजाय समय पर अदालत तक पहुंचें। साथ ही समन जारी करने में “proper application of mind” पर जोर का मतलब यह है कि एजेंसी अपने कदमों को कानूनी रूप से ज्यादा मजबूत बनाने की दिशा में भी काम करना चाहती है।
दूसरी तरफ, illegal-betting, online gaming, शेयर बाजार मैनिपुलेशन, और cyber fraud जैसे सेक्टर में काम करने वाले प्लेटफॉर्म्स/इंटरमीडियरीज के लिए कंप्लायंस और KYC-ट्रांजेक्शन ट्रेसबिलिटी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। विदेश में संपत्ति रखने या क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजेक्शन करने वाले मामलों में भी MLAT/Interpol/BHARATPOL जैसी प्रक्रियाएं तेज होने का संकेत मिलता है।
FAQs (5)
- ED ने 500 चार्जशीट/प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट का लक्ष्य किस अवधि के लिए रखा है?
ED ने चालू वित्त वर्ष में 500 प्रॉसिक्यूशन कम्प्लेंट दाखिल करने का टारगेट तय किया है। - ED ने जांच की समय-सीमा को लेकर क्या निर्देश दिए हैं?
एजेंसी ने निर्देश दिया कि केस दर्ज होने के बाद, “exceptionally complex” मामलों को छोड़कर जांच 1 से 2 साल में पूरी की जाए। - समन/नोटिस जारी करने को लेकर ED ने क्या कहा?
ED ने कहा कि PMLA की शक्तियों के साथ जिम्मेदारी भी आती है, इसलिए समन और नोटिस “जुडिशियसली”, स्पष्ट जरूरत और “proper application of mind” के आधार पर जारी हों। - ED की प्रमुख प्राथमिकताएं किन क्षेत्रों में हैं?
विदेशी अवैध संपत्तियां ट्रैक करना, ट्रेड चैनलों का दुरुपयोग, IBC मिसयूज, डिजिटल अरेस्ट/साइबर फ्रॉड, illegal betting/online gaming, शेयर बाजार मैनिपुलेशन और विदेशी फंडिंग चैनल्स पर सतर्कता शामिल है। - Interpol का “Purple Notice” क्या होता है, जिसे ED ने इस्तेमाल करने को कहा?
ED के मुताबिक, Interpol का Purple Notice अपराधियों के modus operandi, इस्तेमाल किए गए उपकरण/डिवाइस और concealment methods पर जानकारी मांगने या साझा करने के लिए जारी किया जाता है।
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