कानपुर VIP रोड लैंबोर्गिनी हादसे में कोर्ट ने ड्राइवर मोहन लाल की सरेंडर याचिका खारिज कर दी। पुलिस के मुताबिक गाड़ी शिवम मिश्रा चला रहा था। CCTVs, गवाह और कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी।
तंबाकू कारोबारी का बेटा या ‘घोस्ट ड्राइवर’? कानपुर हादसे में CCTVs ने क्या दिखाया?
कानपुर लैंबोर्गिनी हादसा: ड्राइवर स्वैप थ्योरी पर कोर्ट की बड़ी चोट, शिवम मिश्रा की मुश्किलें बढ़ीं
कानपुर की VIP रोड पर 10 करोड़ रुपये की लैंबोर्गिनी रेवुएल्टो ने जिस दिन लोगों पर कहर ढाया, उसी दिन से एक सवाल लगातार चर्चा में है – गाड़ी आखिर चला कौन रहा था? तंबाकू कारोबारी के के मिश्रा का बेटा शिवम मिश्रा या फिर उसका कथित ड्राइवर मोहन् लाल? कुछ दिनों तक सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और अफिडेविट्स के बीच तस्वीर धुंधली रही, लेकिन अब कोर्ट के एक फैसले ने ड्राइवर स्वैप की कहानी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
यह मामला सिर्फ एक रोड एक्सीडेंट नहीं रहा, बल्कि पावर, पैसे और सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश का प्रतीक बन गया है। चलिए, एक-एक पहलू समझते हैं – हादसा कैसे हुआ, ड्राइवर स्वैप की थ्योरी क्या है, कोर्ट ने क्या कहा और आगे शिवम मिश्रा के लिए रास्ता कितना मुश्किल दिख रहा है।
हादसा कब और कैसे हुआ?
रिपोर्ट्स के मुताबिक हादसा 8 फरवरी 2026 को कानपुर की VIP रोड, ग्वाल टोली/रिंग वाला चौराहा के पास हुआ। उस दिन दोपहर/शाम के समय यह महंगी स्पोर्ट्स कार तेज रफ्तार से दौड़ रही थी और अचानक कंट्रोल खोकर पैदल चल रहे लोगों और कुछ वाहनों में जा घुसी। शुरुआती जानकारी के अनुसार, इस घटना में कम से कम तीन लोग घायल हुए, जिनमें एक प्रमुख पीड़ित मोहम्मद तौफीक (या तौसीफ/तौसीफ) हैं, जिनके पैर में गंभीर चोट बताई गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के वीडियो और CCTV फुटेज में दिखा कि टक्कर के बाद कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई और कुछ ही सेकंड में पीछे से आ रही एक SUV से बाउंसर जैसे दिखने वाले सिक्योरिटी गार्ड्स निकले। ये लोग लैंबोर्गिनी की खिड़कियां तोड़ते दिखे और ड्राइवर सीट की ओर बैठे व्यक्ति को बाहर निकालकर तेजी से वहां से ले जाते हुए दिखाई दिए। पुलिस के मुताबिक यही शख्स शिवम मिश्रा था, जो हादसे के बाद मौके से गायब हो गया और कई दिनों तक सामने भी नहीं आया।
कौन था ड्राइवर? दो विपरीत कहानियां
यहीं से शुरू होती है ड्रामे की सबसे अहम लेयर – ड्राइवर कौन था?
पुलिस की कहानी
कानपुर पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल और जांच टीम का साफ दावा है कि हादसे के समय गाड़ी को खुद शिवम मिश्रा चला रहा था। उनका कहना है:
- CCTV फुटेज में साफ दिख रहा है कि कार में सिर्फ एक ही व्यक्ति है और वही ड्राइविंग सीट पर है।
- प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने भी यही बयान दिया कि स्टेयरिंग पर शिवम ही था।
- मोबाइल लोकेशन, इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस और मौके पर उपलब्ध वीडियोज इस वर्जन को सपोर्ट करते हैं।
पुलिस ने गाड़ी को जब्त कर लिया, फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा और FIR में शिवम को मुख्य आरोपी बताया। बाद में, 11 फरवरी के आसपास, कई टीमों ने मिलकर उसे कानपुर से अरेस्ट किया और मेडिकल जांच करवाकर कोर्ट में पेश किया।
डिफेंस की कहानी – ‘ड्राइवर’ का एंट्री
इधर, शिवम मिश्रा की तरफ से एक बिल्कुल अलग कहानी सामने आई। उसके वकीलों ने कोर्ट में दावा किया कि हादसे के समय गाड़ी उसका स्थायी ड्राइवर मोहन् लाल चला रहा था।
- मोहन् लाल खुद कोर्ट में पेश हुआ और एक हलफनामा देकर कहा कि वह लैंबोर्गिनी का ड्राइवर है और हादसे के समय वही स्टेयरिंग पर था।
- उसने मीडिया से कहा कि कार 9-गियर वाली है, वह चला रहा था और शिवम उसके बगल वाली सीट पर बैठा था।
- उसके अनुसार, अचानक शिवम की तबीयत बिगड़ी, हाथ कांपने लगे, वो उस पर गिर गया, तब उसने ब्रेक लगाए और हादसा हो गया।
- उसका दावा है कि वह सबसे पहले कार से उतरा, मौके पर ही रुका रहा और बाद में थाने भी गया।
डिफेंस की कोशिश ये दिखाने की थी कि हादसा हुआ जरूर, लेकिन जिम्मेदारी ड्राइवर की है, मालिक के बेटे की नहीं। इसके साथ-साथ गाड़ी के मालिक की तरफ से कार रिलीज करने की अर्जी भी कोर्ट में डाली गई।
ड्राइवर स्वैप प्लान क्या था और क्यों विवाद में आया?
सोशल मीडिया पर इसे ‘घोस्ट ड्राइवर’ थ्योरी कहा जाने लगा – यानी हादसे के बाद अचानक एक ऐसा ड्राइवर सामने आना, जिसका नाम न FIR में है, न पुलिस जांच में, लेकिन वो खुद को दोष लेने को तैयार है।
कानूनी जानकारों के मुताबिक, भारत में कई हाई-प्रोफाइल एक्सीडेंट केसों में अक्सर यही पैटर्न देखने को मिला है:
- हादसे के दिन मालिक या उसका बेटा कार चला रहा होता है।
- बाद में कोई ड्राइवर या स्टाफ आगे आकर कह देता है कि गाड़ी वह चला रहा था।
- बदले में मोटी रकम, नौकरी की गारंटी या कानूनी सुरक्षा का वादा किया जाता है।
हालांकि, हर केस में ये साबित नहीं होता, लेकिन कानपुर की लैंबोर्गिनी केस में पुलिस शुरुआत से ही ड्राइवर स्वैप थ्योरी को संदिग्ध मान रही थी, क्योंकि उनके पास CCTV और गवाहों की स्टेटमेंट्स पहले से मौजूद थीं।
कोर्ट में क्या हुआ? मोहन् लाल की सरेंडर याचिका क्यों खारिज हुई
कानपुर की एक लोकल कोर्ट (एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन/ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट स्तर) में जब मोहन् लाल सरेंडर करने पहुंचा, तो उसके साथ दो महत्वपूर्ण अर्जी लगी थीं –
- खुद की न्यायिक हिरासत (सरेन्डर) और बेल की याचिका, इस आधार पर कि वही हादसे के समय ड्राइव कर रहा था।
- कार के मालिक की तरफ से लैंबोर्गिनी को रिहा करने की मांग।
सरकारी वकील (डिस्ट्रिक्ट गवर्नमेंट काउंसल) दिलीप अवस्थी ने कोर्ट को बताया कि:
- पुलिस जांच में मोहन् लाल का नाम कहीं नहीं आया।
- FIR और अब तक की पूरी जांच में एक ही नाम इमर्ज हुआ है – शिवम मिश्रा।
- इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने साफ कहा है कि मोहन् न तो वॉन्टेड है, न आरोपी के रूप में नामित।
इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि ‘सरेन्डर’ का कांसेप्ट तभी लागू होता है जब व्यक्ति आरोपी या वॉन्टेड हो। अगर पुलिस ही कह रही है कि इसे हम आरोपी नहीं मानते, तो कोर्ट किसी निर्दोष को ‘सरेन्डर’ के नाम पर कस्टडी में नहीं ले सकती।
न सिर्फ सरेंडर, बल्कि बेल और कार रिलीज की याचिका भी अदालत ने खारिज कर दी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पहले गाड़ी की टेक्निकल और फॉरेंसिक जांच पूरी की जाए और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए, तभी आगे किसी ऐसे आवेदन पर विचार होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का नजरिया
सीनियर क्रिमिनल लॉयर्स का कहना है कि:
- सरेन्डर का मतलब ही यह है कि व्यक्ति पहले से आरोपी हो या उसके खिलाफ लुकआउट/वॉरंट हो।
- यहां स्थिति उलट थी – पुलिस ही कह रही थी कि यह व्यक्ति केस में न तो नामजद है, न वॉन्टेड।
इसलिए कोर्ट का ऑर्डर कानून की टेक्निकल रिक्वायरमेंट के हिसाब से बिल्कुल नॉर्मल माना जा रहा है। लेकिन मैसेज साफ है – सिर्फ अफिडेविट देकर किसी और पर इल्जाम ले लेना आसान नहीं, खासकर जब पुलिस के पास इसके उलट मजबूत सबूत हों।
पीड़ित की ‘समझौते’ वाली अर्जी और नया मोड़
इस केस में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब मुख्य घायल पीड़ित मोहम्मद तौफीक/तौसीफ की तरफ से कोर्ट में ‘कम्प्रोमाइज एप्लिकेशन’ दायर की गई।
- इस अर्जी में कहा गया कि कार मोहन लाल चला रहा था, शिवम नहीं।
- पीड़ित ने यह भी कहा कि वह आगे केस नहीं चलाना चाहता और समझौता हो चुका है, मुआवजा मिल गया है।
लेकिन यहां भी पुलिस अपनी पुरानी लाइन पर कायम रही। उनका कहना है कि चाहे पीड़ित समझौता करे या नहीं, चाहे वह किसे ड्राइवर बताए, जांच एजेंसी को अपने वैज्ञानिक और तथ्यात्मक सबूतों के आधार पर ही तय करना होगा कि हादसे के समय कार किसके कंट्रोल में थी।
कानूनन भी, गंभीर सड़क हादसों में केवल कम्प्रोमाइज़ से हमेशा मामला खत्म नहीं हो जाता, खासकर जब मामला पब्लिक सेफ्टी से जुड़ा हो और सोशल आऊटरेज बहुत ज्यादा हो।
शिवम मिश्रा की गिरफ्तारी: तीन दिन की उलझन के बाद पकड़
हादसे के बाद शुरुआत में आरोप लगा कि पुलिस और प्रशासन उस पर नरमी बरत रहे हैं, क्योंकि वह एक रईस और प्रभावशाली कारोबारी परिवार से आता है। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि इतने गंभीर हादसे के बाद भी न तो तुरंत गिरफ्तारी हुई, न ही उसकी सार्वजनिक मौजूदगी दिखी।
आखिरकार, घटना के चार दिन बाद, 11 फरवरी को खबर आई कि शिवम मिश्रा को कानपुर से गिरफ्तार कर लिया गया।
- पुलिस ने बताया कि उसके मेडिकल टेस्ट कराए गए और फिर उसे लोकल कोर्ट में पेश किया गया।
- DCP (सेंट्रल कानपुर) अतुल कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि जांच में साफ हुआ है कि एक्सीडेंट के समय ड्राइविंग सीट पर शिवम ही था।
- कोर्ट में पुलिस ने उसका कस्टडी/ज्यूडिशियल रिमांड मांगा, आगे की जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स के लिए।
अब परिस्तिथी यह है कि आधिकारिक तौर पर केस का ‘प्राइम फोकस’ मोहन् से हटकर पूरी तरह शिवम पर है और ड्राइवर स्वैप थ्योरी कानूनी तौर पर कमजोर पड़ती दिख रही है।
ड्राइवर स्वैप की कोशिशें क्यों होती हैं?
इस तरह के हाई-प्रोफाइल केसों में अक्सर कुछ कॉमन मोटिव देखे जाते हैं:
- कड़े सेक्शन्स से बचना: अगर अमीर घर का बेटा सीधे तौर पर आरोपी बनता है, तो उसके खिलाफ गैर-जमानती धाराएं लग सकती हैं, लाइसेंस कैंसिल, विदेश यात्रा पर असर, सोशल इमेज डैमेज आदि।
- इंश्योरेंस और सिविल लायबिलिटी: अगर प्रोफेशनल ड्राइवर दोषी माना जाए, तो कई बार मुआवजे की जिम्मेदारी सीधे कार मालिक पर नहीं आती, या कम हो जाती है।
- मीडिया प्रेशर मैनेजमेंट: ‘ड्राइवर चला रहा था’ कहने से सार्वजनिक गुस्सा कुछ हद तक कम करने की कोशिश होती है।
लेकिन यहां CCTV फुटेज, चश्मदीद गवाह और पुलिस की शुरुआती जांच ने इस नैरेटिव को काफी हद तक कमजोर कर दिया।
आगे की जांच: टेक्निकल रिपोर्ट का रोल
कोर्ट ने साफ कहा है कि गाड़ी की टेक्निकल और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कई बड़े फैसले लिए जाएंगे।
इन रिपोर्ट्स में क्या-क्या देखा जाएगा?
- क्रैश के समय कार की स्पीड कितनी थी।
- ब्रेक कब और कितनी देर पहले लगाए गए।
- कार में सीट पोजिशन, एयरबैग डिप्लॉयमेंट, ड्राइवर-साइड डैमेज आदि से कौन सीट पर बैठा था, इसका अनुमान।
- अगर कार के सिस्टम में ड्राइवर आइडेंटिफिकेशन या इवेंट डेटा रिकॉर्डर (ब्लैकबॉक्स जैसा सिस्टम) हो, तो उसके लॉग्स।
ये सारे टेक्निकल पॉइंट्स अदालत में पुलिस के दावों को और मजबूत या कमजोर बना सकते हैं। इसलिए कोर्ट ने पहले ड्राइवर का सरेन्डर लेने या कार छोड़ने से साफ मना किया और रिपोर्ट का इंतजार करने को कहा।
सड़क सुरक्षा, VIP कल्चर और आम लोगों की नाराज़गी
इस पूरे केस ने एक बार फिर सड़क सुरक्षा और VIP कल्चर पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। आम लोगों में गुस्सा स्वाभाविक है, क्योंकि:
- महंगी कारें अक्सर शहरों की सड़कों पर स्पीड लिमिट तोड़ती दिखती हैं।
- जब हादसा होता है, तो कोशिश होती है कि जिम्मेदारी किसी कमजोर कंधे पर डाल दी जाए।
- कई केसों में पीड़ितों पर समझौते का दबाव भी बनता है।
कानपुर के इस केस में भी, पीड़ित द्वारा दी गई कम्प्रोमाइज एप्लिकेशन को लोग शक की नजर से देख रहे हैं, खासकर तब जब पुलिस अपनी पुरानी लाइन से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं है।
अगर इस केस में कोर्ट और पुलिस ड्राइवर स्वैप की कोशिशों को सख्ती से नकारते हुए सच्चे ड्राइवर के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ाते हैं, तो यह आने वाले समय में ऐसे और केसों के लिए एक मजबूत मिसाल बन सकता है।
आगे क्या हो सकता है? संभावित धाराएं और सज़ा
फिलहाल FIR और रिपोर्ट्स के आधार पर देखा जाए, तो इस तरह के केस में आमतौर पर ये धाराएं लग सकती हैं:
- लापरवाही से गाड़ी चलाना (जैसे IPC 279)
- लापरवाही से चोट पहुंचाना (IPC 337/338)
- यदि किसी की मौत हो जाए, तो 304A (कौज़िंग डेथ बाय नेगलिजेंस) आदि।
कई हाई-प्रोफाइल रोड रेज/हादसा केसों में कोर्ट ने बाद में धाराएं और भी कड़ी कर दी हैं, अगर साबित हो कि कार जान-बूझकर बहुत खतरनाक तरीके से चलाई गई थी या शराब/ड्रग्स शामिल थे। अभी तक रिपोर्ट्स में ड्रंक ड्राइविंग कन्फर्म नहीं हुई है, लेकिन मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने के बाद तस्वीर और साफ होगी।
आम लोगों के लिए सीख: हादसा, कानून और अपने अधिकार
इस केस से आम नागरिकों के लिए कुछ जरूरी सीख निकलती हैं:
- अगर आप किसी रोड हादसे के गवाह हैं, तो कोशिश करें कि वीडियो बनाएं, नंबर प्लेट और ड्राइवर का चेहरा साफ रिकॉर्ड हो। बाद में यही सबसे मजबूत सबूत बनता है।
- पीड़ित होने पर जल्दबाजी में किसी समझौते या अफिडेविट पर साइन न करें, पहले स्वतंत्र कानूनी सलाह लें।
- हाई-प्रोफाइल केस में भी, अगर मीडिया और पब्लिक दबाव सही दिशा में हो, तो सिस्टम को भी मजबूर होना पड़ता है कि वह नियमों के हिसाब से काम करे।
FAQs
प्रश्न 1: कानपुर लैंबोर्गिनी हादसा कब हुआ और क्या हुआ था?
उत्तर: हादसा 8 फरवरी 2026 को कानपुर की VIP रोड/ग्वाल टोली इलाके में हुआ, जब एक लैंबोर्गिनी रेवुएल्टो तेज रफ्तार में पैदल चल रहे लोगों और वाहनों से टकरा गई, जिसमें कम से कम तीन लोग घायल हुए।
प्रश्न 2: पुलिस के अनुसार हादसे के समय गाड़ी कौन चला रहा था?
उत्तर: कानपुर पुलिस का दावा है कि हादसे के समय लैंबोर्गिनी खुद शिवम मिश्रा ही चला रहा था। CCTV फुटेज, चश्मदीद गवाह और इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस इसी ओर इशारा करते हैं।
प्रश्न 3: मोहन् लाल कौन है और उसकी सरेंडर अर्जी क्यों खारिज हुई?
उत्तर: मोहन् लाल खुद को कार का ड्राइवर बता रहा है और उसने कोर्ट में सरेंडर तथा बेल की अर्जी दी, लेकिन पुलिस ने बताया कि वह केस में न आरोपी है, न वॉन्टेड, इसलिए कोर्ट ने उसका सरेंडर और बेल दोनों रिजेक्ट कर दिए।
प्रश्न 4: क्या पीड़ित ने किसी तरह का समझौता किया है?
उत्तर: रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्य घायल पीड़ित मोहम्मद तौफीक/तौसीफ ने कोर्ट में एक कम्प्रोमाइज एप्लिकेशन देकर कहा कि कार मोहन् लाल चला रहा था और वह केस आगे नहीं बढ़ाना चाहता, लेकिन पुलिस अब भी शिवम को ही ड्राइवर मानकर जांच कर रही है।
प्रश्न 5: शिवम मिश्रा की वर्तमान स्थिति क्या है?
उत्तर: हादसे के चार दिन बाद उसे कानपुर से गिरफ्तार किया गया, मेडिकल जांच कराई गई और कोर्ट में पेश किया गया। पुलिस कह रही है कि टेक्निकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स मिलने के बाद चार्जशीट दाखिल की जाएगी।
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