US सुप्रीम कोर्ट ने 6–3 फैसले में ट्रंप काल के व्यापक टैरिफ रद्द कर दिए और कहा कि इमरजेंसी प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति को असीमित टैरिफ पावर नहीं मिलती; यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद-1 के तहत कांग्रेस के पास है। जेफ्री सैक्स ने भारत से कहा—“डील फाड़ दें”, 18% टैरिफ समझौते पर अभी आगे न बढ़ें।
ट्रंप के टैरिफ असंवैधानिक! 6-3 फैसले के बाद भारत-अमेरिका 18% टैरिफ डील पर सवाल, सैक्स की बड़ी सलाह
US सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रंप के टैरिफ रद्द, भारत-US डील पर नई बहस
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्रेड एजेंडे को बड़ा झटका लगा है। US सुप्रीम कोर्ट ने 6–3 के फैसले में ट्रंप के कार्यकाल के दौरान लगाए गए व्यापक टैरिफ रद्द कर दिए और कहा कि उन्होंने अपनी कानूनी सीमा से आगे बढ़कर टैरिफ लगाए थे। इस फैसले के बाद हाल में हुए कई ट्रेड अरेंजमेंट्स पर अनिश्चितता बन गई है, जिसमें भारत और अमेरिका के बीच वह समझौता भी शामिल है, जिसके तहत टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत किए गए थे।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रख्यात अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने CNBC-TV18 को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह “काफी बोल्ड और स्पष्ट” राय है और भारत को इस नए कानूनी परिदृश्य में अपनी रणनीति तुरंत री-चेक करनी चाहिए। सैक्स की सबसे चर्चा में रहने वाली सलाह यही रही—“डील फाड़ दीजिए, अब उसका कोई मतलब नहीं।”
कोर्ट ने क्या कहा: टैरिफ पावर राष्ट्रपति के पास ‘अनलिमिटेड’ नहीं
कोर्ट के बहुमत की ओर से चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने लिखा कि कानून राष्ट्रपति को इमरजेंसी प्रावधानों के तहत टैरिफ लगाने की असीमित शक्ति नहीं देता। अदालत ने कहा कि सरकार की आय (revenue) से जुड़े अधिकार—जिसमें टैरिफ भी शामिल है—US संविधान के अनुच्छेद-1 (Article One) के तहत कांग्रेस के पास हैं। यानी टैरिफ तय करने की शक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली कांग्रेस की है, न कि राष्ट्रपति की जो अकेले फैसले कर दे।
फैसले का संकेत साफ है: ट्रेड पॉलिसी में “एक्जीक्यूटिव ओवररीच” (कार्यपालिका का अधिकार-सीमा से बाहर जाना) स्वीकार्य नहीं है। इसीलिए कोर्ट ने इसे सिर्फ “कानूनी भाषा की तकनीकी व्याख्या” नहीं माना, बल्कि अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखा।
जेफ्री सैक्स का तर्क: ‘Taxation without representation’ से जुड़ा मुद्दा
सैक्स ने कहा कि यह फैसला अमेरिकी सिस्टम के उस मूल विचार पर लौटाता है कि टैक्सेशन की शक्ति कांग्रेस के पास है। उन्होंने अमेरिकी क्रांति (American Revolutionary War) का संदर्भ देते हुए कहा कि “taxation without representation” यानी बिना प्रतिनिधित्व के कर लगाने के खिलाफ लड़ाई ही वह वजह थी, जिसके चलते टैरिफ अथॉरिटी को स्पष्ट रूप से कांग्रेस के दायरे में रखा गया।
उनका कहना था कि यह कोई “नैरो रीडिंग” नहीं, बल्कि एक्जीक्यूटिव ब्रांच द्वारा पावर “ग्रैब” करने की कोशिश पर कोर्ट की स्पष्ट रोक है। इसी आधार पर वे मानते हैं कि ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ/पेनल्टी का दबाव बनाना संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं था।
भारत-US 18% टैरिफ डील पर असर: क्यों बढ़ी अनिश्चितता
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने हाल ही में अमेरिका के साथ एक ट्रेड डील साइन की थी, जिसमें टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत किए गए। लेकिन अब जब कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को ही असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया है, तो सवाल उठता है कि वह डील किस आधार पर हुई थी और आगे उसकी कानूनी वैधता/व्यावहारिकता कितनी बचेगी।
यही कारण है कि सैक्स ने भारत को सलाह दी कि अभी किसी भी तरह का “अगला कदम” न उठाया जाए, बल्कि कोर्ट का पूरा फैसला पढ़कर, उसका इम्प्लिकेशन समझकर और दुनिया के बाकी देशों की प्रतिक्रियाएं देखकर आगे बढ़ा जाए।
सैक्स की भारत को सीधी सलाह: “Rip up the deal”, “Take a break”
सैक्स ने स्पष्ट रूप से कहा:
- “डील फाड़ दीजिए, अब उसका कोई मतलब नहीं।”
- “ट्रंप के पास भारत को धमकाने या टैरिफ/पेनल्टी लगाने की अथॉरिटी ही नहीं थी; यह सब असंवैधानिक था।”
- “अभी ब्रेक लीजिए, राय पढ़िए, स्टडी कीजिए, दुनिया की बात सुनिए, फिर ट्रिप कीजिए।”
उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय वार्ताकार (negotiators) अमेरिका जाकर कानूनी फ्रेमवर्क की समीक्षा करने वाले थे, लेकिन अब ऐसे समय में जल्दबाजी ठीक नहीं होगी क्योंकि जिस आधार पर बातचीत हुई थी, वही “वॉइड” हो चुका है।
क्या ट्रंप फिर से टैरिफ लगा सकते हैं?
सैक्स ने माना कि ट्रंप वैकल्पिक कानूनी रास्ते खोजकर फिर से टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने संदेह जताया कि वह रास्ता भी टिकेगा, क्योंकि मुद्दा “लेवरेज” का नहीं बल्कि संविधान द्वारा तय सीमाओं का है। उनका अनुमान था कि कोशिश होगी भी तो “फेल” हो जाएगी।
हालांकि यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि अमेरिका में ट्रेड/टैरिफ नीति कई कानूनों के जरिए प्रभावित हो सकती है, इसलिए आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि व्हाइट हाउस और कांग्रेस क्या कदम उठाते हैं।
एक नजर में: फैसले का मतलब क्या?
टेबल: “पहले” बनाम “अब” – टैरिफ पावर पर मुख्य बदलाव
| पहलू | कोर्ट के फैसले से पहले (ट्रंप की व्याख्या) | कोर्ट के फैसले के बाद (6–3 निर्णय) |
|---|---|---|
| टैरिफ लगाने की शक्ति | राष्ट्रपति इमरजेंसी प्रावधानों में व्यापक टैरिफ लगा सकता है | टैरिफ/रेवेन्यू पावर कांग्रेस के पास; राष्ट्रपति की शक्ति सीमित |
| कानूनी आधार | “इमरजेंसी” के नाम पर एक्जीक्यूटिव एक्शन | संविधान का Article One: राजस्व अधिकार कांग्रेस का |
| भारत-US डील पर असर | टैरिफ धमकी/रियायत को “नेगोशिएशन टूल” माना गया | डील की उपयोगिता/वैधता पर नए सिरे से समीक्षा की जरूरत |
भारत के लिए आगे की रणनीति: व्यावहारिक पॉइंट्स
- कोर्ट के जजमेंट का लीगल विश्लेषण कराना: किन टैरिफ प्रावधानों पर असर पड़ेगा और किन पर नहीं।
- अमेरिका में कांग्रेस की भूमिका पढ़ना: अगर टैरिफ पावर कांग्रेस के पास है, तो भारत को लॉन्ग-टर्म में किससे “नेगोशिएट” करना होगा।
- ट्रेड डील की शर्तों का रिव्यू: 18% टैरिफ अरेंजमेंट का कानूनी आधार और रिवर्सल क्लॉज।
- जल्दबाजी से बचना: सैक्स की सलाह के मुताबिक “टेक अ ब्रेक” करके ही अगला कदम।
FAQs (5)
- US सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ पर क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने 6–3 के फैसले में ट्रंप कार्यकाल के व्यापक टैरिफ रद्द कर दिए और कहा कि उन्होंने कानूनी अधिकार सीमा से आगे बढ़कर टैरिफ लगाए थे। - कोर्ट ने टैरिफ पावर किसके पास बताई?
कोर्ट ने कहा कि टैरिफ/रेवेन्यू से जुड़े अधिकार US संविधान के Article One के तहत कांग्रेस के पास हैं, राष्ट्रपति के पास असीमित शक्ति नहीं है। - जेफ्री सैक्स ने भारत को क्या सलाह दी?
उन्होंने कहा कि भारत को US के साथ हुई ट्रेड डील “rip up” कर दे, अभी “ब्रेक” ले, कोर्ट की राय पढ़े और फिर आगे कदम उठाए। - भारत-US 18% टैरिफ डील पर असर क्यों पड़ रहा है?
क्योंकि कोर्ट के फैसले से ट्रंप द्वारा टैरिफ धमकी/लागू करने की संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं, जिससे उस डील की उपयोगिता और आधार पर नई अनिश्चितता बन गई है। - क्या ट्रंप फिर भी टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकते हैं?
सैक्स के मुताबिक ट्रंप वैकल्पिक कानूनी रास्ते ढूंढने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि संवैधानिक सीमाओं के कारण यह टिकाऊ नहीं होगा।
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