सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले ‘फ्रीबीज’ बांटने पर सभी राज्यों को फटकार लगाई। CJI सूर्य कांत ने कहा कि बिना भेदभाव मुफ्त सुविधाएं देने से आर्थिक विकास और कामकाजी संस्कृति प्रभावित होती है; गरीबों को मदद समझ में आती है, लेकिन सक्षम लोगों तक भी मुफ्त पहुंचना “अपील/अपीजमेंट” जैसा है।
“रेवेन्यू डेफिसिट में भी फ्रीबीज?” सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से पूछा—ये राष्ट्र निर्माण है या वोट पॉलिटिक्स?
चुनाव से पहले ‘फ्रीबीज’ कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: “आप कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं?”
भारत में चुनावों के आसपास “फ्रीबीज” यानी मुफ्त सुविधाओं की घोषणा पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को सभी राज्यों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि यह समय आ गया है कि ऐसी नीतियों पर फिर से विचार किया जाए, क्योंकि यह देश के आर्थिक विकास में बाधा बन सकती हैं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर “हम भारत में कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं?”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि गरीबों और असहाय लोगों को सहारा देना एक बात है, लेकिन बिना भेदभाव के, ऐसे लोगों को भी मुफ्त सुविधाएं देना जो भुगतान करने में सक्षम हैं—यह नीति “अपील/अपीजमेंट” जैसी लगती है। अदालत की चिंता यह है कि जब राज्य खुद राजस्व घाटे (revenue deficit) में हैं, तब भी अगर वे बिना टारगेटिंग के मुफ्त सुविधाएं बांटते रहेंगे, तो विकास से जुड़े खर्च दब जाएंगे।
किस बेंच ने क्या कहा: CJI सूर्य कांत की तीखी टिप्पणी
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने की। बेंच ने राज्यों से सीधे पूछा कि अगर मुफ्त सुविधाएं “उन लोगों तक भी पहुंच रही हैं जो अफोर्ड कर सकते हैं”, तो क्या यह जनता को लुभाने वाली नीति नहीं है।
CJI सूर्य कांत ने कहा कि गरीबों को हैंड-होल्ड करना समझ में आता है, खासकर जब कोई व्यक्ति बिजली का बिल भरने में सक्षम नहीं हो। लेकिन जब राज्य बिना किसी भेद के “सबको” मुफ्त देने लगते हैं—तब नीति का मकसद और असर दोनों बदल जाते हैं।
तमिलनाडु बिजली मामले से जुड़ा संदर्भ: “सबको मुफ्त बिजली” पर सवाल
कोर्ट ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (TANGEDCO) की एक याचिका का संज्ञान लिया, जिसमें प्रस्ताव था कि उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति देखे बिना सभी को मुफ्त बिजली दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर मदद गरीबों तक सीमित रहे तो बात अलग है, लेकिन सार्वभौमिक (universal) फ्रीबीज का मॉडल आर्थिक अनुशासन और विकास दोनों पर असर डाल सकता है।
इसी संदर्भ में अदालत ने स्पष्ट किया कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के राज्यों में चुनावों से पहले इस तरह की घोषणाएं आम हो गई हैं।
“फ्री में सब मिलेगा तो काम कौन करेगा?” – वर्क कल्चर पर कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट की सबसे अहम चिंता “वर्क कल्चर” को लेकर सामने आई। CJI सूर्य कांत ने कहा कि अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली, मुफ्त गैस जैसी चीजें दी जाएं और इसे सीधे कैश ट्रांसफर की तरह सामान्य बना दिया जाए, तो फिर लोग काम क्यों करेंगे और काम की संस्कृति का क्या होगा।
कोर्ट ने इसे “नेशन बिल्डिंग” के नजरिये से देखा और कहा कि सरकारों को रोजगार के अवसर बनाने पर प्राथमिकता देनी चाहिए। बेंच ने संकेत दिया कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाना और रोजगार/स्किल से जोड़ना लंबे समय में ज्यादा टिकाऊ रास्ता है, बजाय इसके कि हर चुनाव में मुफ्त घोषणाओं का पैकेज बड़ा कर दिया जाए।
आर्थिक विकास पर असर: “रेवेन्यू डेफिसिट में भी फ्रीबीज?”
अदालत ने यह भी नोट किया कि देश के अधिकांश राज्य “रेवेन्यू डेफिसिट स्टेट्स” हैं, फिर भी वे विकास को नजरअंदाज करते हुए फ्रीबीज दे रहे हैं। कोर्ट के मुताबिक, जब राज्य की कमाई और खर्च में संतुलन नहीं है, तब “planned expenditure” के तौर पर फ्रीबीज का औचित्य और पारदर्शिता दोनों पर सवाल उठते हैं।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यह सिर्फ एक राज्य का मुद्दा नहीं है; सभी राज्यों को अपने बजट प्रस्तावों में यह स्पष्ट बताना चाहिए कि यह आउटले किस श्रेणी में आता है और बेरोजगारी/रोजगार सृजन पर इसका क्या असर होगा।
वेलफेयर बनाम फ्रीबीज: फर्क क्या है (कोर्ट की लाइन से समझिए)
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का सार यह है कि “वेलफेयर” और “फ्रीबीज” में फर्क टारगेटिंग और जरूरत के आधार पर तय होता है। गरीबों, असहायों और वास्तविक जरूरतमंदों को सहायता देना एक सामाजिक जिम्मेदारी है, लेकिन बिना भेदभाव के सक्षम वर्ग तक भी मुफ्त सुविधाएं पहुंचाना सार्वजनिक वित्त और कामकाजी संस्कृति दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
इसीलिए अदालत ने राज्यों से कहा कि वे नीति बनाते समय “कौन सक्षम है और कौन नहीं” इसका भेद जरूर करें। यह संकेत भी है कि भविष्य में अदालतें फ्रीबीज पर और कड़े मानक या दिशा-निर्देश देखने की तरफ बढ़ सकती हैं।
आगे क्या हो सकता है: राज्यों के लिए संदेश और नीति बहस
इस टिप्पणी से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट चाहती है कि सरकारें चुनावी लाभ के बजाय आर्थिक स्थिरता, रोजगार और विकास को केंद्र में रखें। आने वाले समय में राज्य सरकारों से उम्मीद की जाएगी कि वे फ्रीबीज की घोषणाओं को बजट अनुशासन, टारगेटिंग और जवाबदेही के साथ जोड़ें।
राजनीतिक रूप से यह बहस इसलिए भी अहम है क्योंकि कई राज्यों में बिजली, पानी, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा और राशन जैसी सुविधाओं पर सब्सिडी लंबे समय से चल रही है। अब सवाल यह बनेगा कि कौन-सी सब्सिडी “सामाजिक सुरक्षा” है और कौन-सी “अनियंत्रित फ्रीबीज” बन चुकी है।
FAQs (5)
- सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले फ्रीबीज बांटने की संस्कृति पर सभी राज्यों को फटकार लगाई और कहा कि यह आर्थिक विकास में बाधा बन सकती है; कोर्ट ने पूछा, “हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं?” - क्या कोर्ट ने गरीबों को मुफ्त सुविधा देने का विरोध किया?
नहीं। कोर्ट ने कहा कि गरीबों को हैंड-होल्ड करना समझ में आता है, लेकिन सक्षम और अक्षम लोगों में भेद किए बिना सबको मुफ्त देना चिंता की बात है। - यह टिप्पणी किस मामले में आई?
कोर्ट ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड की याचिका के संदर्भ में यह सवाल उठाया, जिसमें सभी उपभोक्ताओं को उनकी आर्थिक स्थिति देखे बिना मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव था। - कोर्ट को सबसे बड़ी चिंता किस बात की है?
कोर्ट ने कहा कि अगर लगातार मुफ्त खाना, बिजली, गैस जैसी सुविधाएं दी जाती रहीं तो काम करने की संस्कृति पर असर पड़ेगा और रोजगार पैदा करने की प्राथमिकता कमजोर होगी। - कोर्ट ने राज्यों को क्या प्राथमिकता देने की बात कही?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारों को मुफ्त सुविधाओं के बजाय रोजगार के अवसर पैदा करने और विकास-उन्मुख नीतियों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
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