NCLT का बड़ा फैसला : फ़िल्म निर्माता संगठन IMPPA को तगड़ा झटका, संजीव कुमार समेत 4 निर्माताओं की याचिका मंजूर
मुंबई : बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा के प्रमुख फ़िल्म निर्माता संगठन IMPPA (इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन) को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई बेंच से एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। ट्रिब्यूनल ने फ़िल्म निर्माता संजीव कुमार, रत्नाकर कुमार, रोशन सिंह और प्रदीप सिंह के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनकी मुख्य याचिका पर सुनवाई का रास्ता साफ कर दिया है।
इस फैसले के बाद अब IMPPA के कामकाज और उसके प्रबंधन पर लगे गंभीर आरोपों की विस्तृत जांच की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई 2026 को तय की गई है।
क्या हैं IMPPA पर लगे गंभीर आरोप?
याचिकाकर्ता संजीव कुमार, रत्नाकर कुमार, रोशन सिंह और प्रदीप सिंह ने IMPPA के वर्तमान प्रबंधन और कार्यप्रणाली को चुनौती देते हुए ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में संगठन पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
- वित्तीय अनियमितताएं: संगठन के फंड और वित्तीय लेन-देन में कथित गड़बड़ियां।
- नियमों का उल्लंघन: IMPPA के स्थापित बायलॉज (संगठन के नियमों) को ताक पर रखकर काम करना।
- सदस्यों का उत्पीड़न: संघ से जुड़े निर्माताओं का कथित रूप से मानसिक और पेशेवर उत्पीड़न।
- मनमाना निलंबन: बिना किसी ठोस आधार के सदस्यों को संगठन से सस्पेंड (निलंबित) करना।
- फ़िल्म प्रचार पर रोक: पहले से पंजीकृत (Registered) फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार और प्रमोशन की अनुमति देने से मनमाने ढंग से इनकार करना।
IMPPA की दलील जिसे NCLT ने किया खारिज
सुनवाई के दौरान IMPPA की ओर से तकनीकी आधार पर इस याचिका को खारिज करने की पुरजोर वकालत की गई थी। IMPPA का तर्क था कि कंपनी अधिनियम के तहत किसी संगठन के खिलाफ ऐसी याचिका दायर करने के लिए आवश्यक सदस्य संख्या (Minimum Members Percentage) का समर्थन अनिवार्य है। चूंकि इस याचिका के पास वह निर्धारित संख्या बल नहीं था, इसलिए इसे प्रारंभिक स्तर (Initial Stage) पर ही खारिज कर दिया जाना चाहिए।
NCLT का कड़ा रुख : ट्रिब्यूनल ने IMPPA की इस तकनीकी दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि मामले में लगाए गए आरोप ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) बेहद गंभीर प्रकृति के हैं, जिनकी तह तक जाना और विस्तृत जांच करना बेहद आवश्यक है।
याचिकाकर्ताओं को ‘वेवर’ (Waiver) की राहत क्यों मिली?
NCLT ने अपने आदेश में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। ट्रिब्यूनल ने माना कि यदि किसी निर्माता की पहले से पंजीकृत फ़िल्म के प्रचार-प्रसार को रोका जाता है, तो यह सीधे तौर पर उसके मौलिक और व्यावसायिक अधिकारों का हनन है।
बेंच ने इसे एक “असाधारण परिस्थिति” माना और कहा कि ऐसे गंभीर मामलों में कानून के तहत अनिवार्य सदस्य संख्या के नियम में छूट (Waiver) दी जा सकती है। इसी आधार पर कोर्ट ने संजीव कुमार और अन्य की वेवर अर्जी को मंजूर कर लिया।
आगे क्या? फैसला अभी बाकी है
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, NCLT का यह आदेश याचिकाकर्ताओं के लिए एक बड़ी शुरुआती जीत है क्योंकि इससे IMPPA की याचिका को खारिज कराने की कोशिश नाकाम हो गई है।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह आदेश केवल याचिका पर सुनवाई जारी रखने की अनुमति देता है। कोर्ट ने अभी तक आरोपों के गुण-दोष (Merits) पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। इन सभी आरोपों की सत्यता का निर्धारण 24 जुलाई 2026 से शुरू होने वाली विस्तृत सुनवाई के बाद ही होगा। इस मामले के नतीजे आने वाले समय में फ़िल्म निर्माता संगठनों की कार्यप्रणाली को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकते हैं।
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