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सफलता की मिसाल: फेलोशिप के सहारे आर्थिक तंगी को मात दे उत्कल विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बने डॉ. परमानंद नाइक

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भुवनेश्वर : सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और शोध की राह अक्सर आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से बाधित होती है। लेकिन सही समय पर मिली वित्तीय सहायता किस तरह जीवन बदल सकती है, इसकी मिसाल पेश की है 35 वर्षीय डॉ. परमानंद नाइक ने। अनुसूचित जाति (पानो) समुदाय से आने वाले डॉ. नाइक ने तमाम चुनौतियों को पार करते हुए मानवविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में पीएचडी पूरी की और आज भुवनेश्वर स्थित प्रतिष्ठित उत्कल विश्वविद्यालय के मानवविज्ञान विभाग में नियमित सहायक प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

चुनौतियों से भरा शुरुआती सफर

अपने समुदाय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले दूसरी पीढ़ी के छात्र डॉ. नाइक के लिए यह राह आसान नहीं थी। सीमित पारिवारिक संसाधनों के कारण शोध सामग्री, किताबों, आवास, क्षेत्रीय भ्रमण (फील्ड वर्क) और डॉक्टरेट से जुड़े खर्च उठाना उनके लिए बेहद कठिन था। इसके अलावा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शोध के अवसरों तक सीमित पहुंच जैसी सामाजिक व शैक्षणिक बाधाएं भी सामने थीं। हालांकि, व्यक्तिगत संकल्प और परिवार के मजबूत सहयोग के बल पर वह अपने लक्ष्य पर डटे रहे।

राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप बनी टर्निंग पॉइंट

डॉ. नाइक की शैक्षणिक यात्रा में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए दी जाने वाली ‘राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप’ मिली। वर्ष 2016 से 2019 के दौरान उन्हें प्रति माह 16,000 रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई। इस फेलोशिप ने उनके शोध, क्षेत्रीय अध्ययन और अन्य शैक्षणिक खर्चों को संभालकर मानसिक व आर्थिक तनाव को दूर किया, जिससे वह अपना पूरा ध्यान डॉक्टरेट शोध पर केंद्रित कर सके।

सफलता और सामाजिक-आर्थिक उत्थान

फेलोशिप के सहयोग से पीएचडी पूरी करने के बाद डॉ. नाइक उत्कल विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। आज वह अध्यापन, शोध और नए शोधार्थियों के मार्गदर्शन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इस सफलता ने न केवल उनके करियर को एक मजबूत आधार दिया, बल्कि उनके परिवार को भी आर्थिक स्थिरता प्रदान की है।

“फेलोशिप ने बदला जीवन”

अपनी सफलता पर डॉ. परमानंद नाइक ने कहा, “फेलोशिप ने मेरे आर्थिक तनाव को कम किया और मुझे अपने शोध तथा उच्च शिक्षा पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाया। इससे मुझे अपनी पीएचडी पूरी करने और मानवविज्ञान में शिक्षक एवं शोधकर्ता के रूप में अपना करियर बनाने में मदद मिली।”

डॉ. नाइक की यह प्रेरणादायक कहानी दर्शाती है कि यदि वंचित वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों को समय पर उचित वित्तीय और शैक्षणिक प्रोत्साहन मिले, तो वे सभी संरचनात्मक बाधाओं को तोड़कर सफलता के नए आयाम गढ़ सकते हैं।

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Written by
Yudhishthir Mahato

युधिष्ठिर महतो | पत्रकार एवं लेखक युधिष्ठिर महतो वर्ष 2017 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार, लेखक, गीतकार और जनसंपर्क पेशेवर हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रिपोर्टर के रूप में की और समाचार पत्रों, न्यूज़ पोर्टलों तथा टीवी चैनलों में काम करते हुए मीडिया के विभिन्न प्रारूपों में अनुभव हासिल किया। वे झारखंड क्रांति खबर में उप-संपादक के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में वे पत्रकारिता के साथ जनसंपर्क एवं संचार कार्य से जुड़े हैं और धनबाद तथा झारखंड से संबंधित सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक एवं जनसरोकार के मुद्दों पर लगातार लिखते हैं। Aaryaa News पर उनके नाम से प्रकाशित खबरों में स्थानीय घटनाक्रम से लेकर राज्य की महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधियां शामिल हैं। उन्होंने बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। पत्रकारिता के साथ उन्हें साहित्य और रचनात्मक लेखन में भी विशेष रुचि है। वे हिंदी और खोरठा में गीत एवं कविताएं लिखते हैं और उनके लिखे कई गीत विभिन्न ऑडियो प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। पत्रकारिता, जनसंपर्क और रचनात्मक लेखन—इन तीनों क्षेत्रों में सक्रियता युधिष्ठिर महतो की पेशेवर पहचान को अलग आयाम देती है।

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